: टीवी वाले पहले सिखाते हैं फिर चिल्लाते हैं : चोर को कहते हैं चोरी करो और पुलिस को कहते हैं होशियार रहो : आप किसी भी समय कोई भी चैनल लगा लीजिये कहीं न कही आप को लूट, बलात्कार, खून, चैन स्नेचिंग की घटना पर जोर जोर से चिल्लाते या मिमियाते न्यूज़ एंकर दिख ही जायेंगे। कोई भी अख़बार उठा लीजिए, आप को फ्रंट पेज पर लूट, बलात्कार, हत्या से भरे हुए कॉलम मिल ही जायेंगे। क्या आप ने कभी सोचा है कि इसके पीछे क्या वजह है और कौन जिमेदार है ? मैं सिर्फ सतही तौर पर सोचने के लिए नहीं कह रहा हूं, बल्कि गंभीरता से सोचने की बात कर रहा हूं. एक ऐसी सोच, जिससे समाज में और उसकी परेशानी में कुछ सुधार आ सके।
आप Mtv ही लगा लीजिए, तो इस पर कभी ना कभी आपको स्टंट मेनिया का प्रोमो या प्रोग्राम दिख ही जायेगा, जिसमें नव युवा लड़के-लड़कियां जान जोखिम मे डाल कर स्टंट करते दिख जायेंगे। और उन जोखिमों का प्रमोशन भी खूब प्रभावी ढंग से किया जाता है। फिर बारी आती है हमारे न्यूज़ चैनलों की, हर रोज एक पैकेज बन जाता है- दिल्ली की सड़क पर छाया बाइकर्स का आतंक, फलां फलां जगह पर हुआ ‘हिट एन्ड रन केस’. अब मैं पूछना चाहता हूं कि एक तरफ आप स्टंट मेनिया कर के नौजवानों को उकसा रहे हो, दूसरी तरफ जब वो आप के उकसावे पर पूरी तरह तैयार हो जाते हैं, तब आप उन्हीं पर खबर बना देते हो। वाह रे हमारा मीडिया।
सिगरट और तम्बाकू का आविष्कार किसने किया? हमने, फिर उस पर बड़े बड़े चित्र भी हमने ही लगाये कि सिगरेट पीना स्वास्थ के लिए हानिकारक है। कैंसर भी हमने पैदा किया और उससे बचने की दवा भी हमने ही बनाई है। मेरा प्रश्न सिर्फ इतना है कि जिस गढ्ढे को आप ने खोदा है अगर उस मे आप गिर जाते हो तो फिर इतना शोर-शराबा क्यूँ मचाते हो? ये तो वो ही बात हुई कि चोर को कहिये की चोरी कर और फिर चिल्लाइये- चोर चोर…!
आज कल हर जगह एम टीवी और वीटीवी के कार्यक्रम ‘सप्लिट्स-विला’ और ‘ट्रुथ लव केस’ की चर्चा है। दूसरी तरफ चर्चा ये भी है कि आजकल भारतीय समाज में शादियां जल्दी टूट रही है। लोगों के विवाहोत्तर संबध मे दिनों-दिन बढ़ावा हो रहा है। एक तरफ तो आप “सप्लिट्स-विला” और “ट्रुथ लव केस” में प्यार में गद्दारी करना सिखाते हो और जब वो ही चीज समाज पर हावी होने लगती है, तब चिल्लाते हो। ऐसी परिस्थिति का निर्माण ही क्यूँ किया जाय जो समाज के लिए खतरा बन जाए। लेकिन शायद ये न किया जाय तो आधे घंटे के शो को टीआरपी और ऐड नहीं मिलेंगे.
हम ही स्टोरी चलाते है कि क्रिकेट को ज्यादा अहमियत दी जाती है, भारत के अन्य खेलों को नहीं। फिर प्राइम टाइम में क्रिकेट पर आधा घंटा, क्रिकेटरों की लाइफ स्टाइल पर घंटो के प्रोग्राम कौन चलता है? और किसी खले पर कोई स्पेशल प्रोग्राम नहीं बन सकता क्या…! क्राइम पर सनसनी और न जाने क्या क्या बनाते है हम-आप और हमारे मीडिया के मित्र, और फिर चिल्लाने वालों में भी हम आप और वो ही है कि देश मे क्राइम बढ़ रहा है। हमारे भूतपूर्व राष्ट्रपति कब से कह रहे है कि ‘पॉजिटिव पत्रकारिता’ करो, खेती पर कार्यक्रम बनाओ। उन्हीं के शब्दों की दुहाई देते न्यूज़ चैनलों से मेरा प्रश्न है कि आप ने कब उनकी बात मानी और ऐसे न्यूज़ चलाये!
क्या पॉजिटिव पत्रकारिता नहीं हो सकती है? बिल्कुल हो सकती है लेकिन टीआरपी जो नहीं आती ऐसे प्रोग्रामों की, टीआरपी मापने के मीटर जो नहीं लगे होते ऐसे क्षेत्रो में। बात यहीं पर आकर नहीं अटकती। आज कल सभी पानी मथ कर दही निकाल रहे है। लेकिन लोगो को पता नहीं चलने देना चाहते की वो पानी मथ रहे हैं। सब को दिखा भी रहे है और दिलासा भी दे रहे है कि धैर्य बनाये रखिये हम लोग दही मथ रहे है, इसमें से जो माखन निकलेगा वो आप सब को ही देंगे।
मेरा ये सवाल उन सभी लोगो से है, जो हमेशा ये प्रश्न उठाते रहते है कि पॉलिटिक्स से अच्छे लोग दूर रहते है। वोट नहीं करते आदि आदि…। मेरा सवाल ऐसे सभी लोगों से है कि आखिर उनको वोटिंग बूथ तक खींच लाने के लिए आपने क्या और हमने क्या किया?
लेखक दिलीप सिंह पेशे से पत्रकार हैं. प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में काम करने बाद इन दिनों अहमदाबाद में डाक्यूमेंटरी फिल्म बनाने में व्यस्त हैं.

