आधी रात का समय रहा होगा, रामलीला मैदान में एक अजीब सी ख़ामोशी छायी हुई थी. मंच हो या मैदान, वहां मौजूद हर शख्स थकान और नींद की खुमारी में डूबा हुआ.. अचानक एक और हलचल सी उठती नज़र आ रही है, मन आशंकित तो था कि कहीं कुछ गड़बड़ न हो जाय. सिब्बल द्वारा शाम को बाबा का पत्र सार्वजनिक करने के बाद से ही वातावरण में तनाव तो पसर ही चुका था. हालांकि जब तीन जून की शाम दिल्ली के लिए रवाना हो रहा था तब तक टीवी पर बाबा राम देव और सरकार के बीच समझौते की खबर चल चुकी थी और कहा जा रहा था कि सत्याग्रह प्रतीकात्मक होगा. मगर जो भी कांग्रेस की कार्यशैली से परिचित रहा है, उसके दिल में धुकपुकी थी कि जो नज़र आ रहा है, दरअसल वैसा है नहीं.
समझौते की खबर से प्रफुल्लित पत्नी को जब मैंने अनहोनी का अंदेशा जताया तो उसकी भावभंगिमा असहज हो गयी. ” आप तो हर बात में शक करते हैं, पत्रकार हैं न. कुछ नहीं होगा.“काश ..! विमला की बात सच निकलती. खैर, मैं सन्नाटे को तोड़ते कदमों की आहट सुन पा रहा था, जो हर पल बढ़ती जा रही थी. और सब समझ में आ गया कि क्या होने वाला है. रामलीला मैदान के चार में तीन दरवाजे बंद किये जा चुके थे और उसके बाद शुरू हुआ वही पुलिसिया तांडव जो हम कांग्रेस के राज में अक्सर देखते रहे हैं. सोयी हुई धर्मप्राण जनता के साथ जो कुछ भी किया गया वो लोकशाही, मानवाधिकार, भारतीय संविधान और उससे प्रदत्त नागरिक अधिकारों का घोर अपमान था.. जब दुधमुंहे बच्चों को गोद में लिए सो रही माताओं को बूट की ठोकरों से उठाया गया. पांच हज़ार से भी ज्यादा रैपिड एक्सन फ़ोर्स के जवानों द्वारा एक लाख की संख्या में मौजूद राष्ट्र प्रेम से ओतप्रोत जनसमूह बाबा से प्रेरित होकर परिवार सहित इस सत्याग्रह में भाग लेने देश के कोने-कोने से खुद आया था, अपना पैसा खर्च कर.वे किसी राजनीतिक दल की रैली में बस या ट्रेनों में भर कर लाई भीड़ का हिस्सा नहीं थे और जो दिल से अपने देश को प्यार करते हैं, साथ ही चाहते हैं लूटतंत्र का सिलसिला समाप्त हो, देश के बाहर जमा काला धन वापस लाया जाय और सड़-गल चुकी व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन हो.
ये रेल की पटरी उखाड़ने, ट्रेनों को रोकने, राष्ट्रीय संपत्ति को आग के हवाले करने वाले आन्दोलनकारी नहीं थे कि जिनके आगे सरकार घुटनों पर नज़र आती रही हो. वे तो बापू के अस्त्र का प्रयोग करने वाले शांतिप्रिय लोग थे, जिनके साथ ऐसा अमानुषिक आचरण हर किसी का मस्तक शर्म से झुका देने के किये काफी है. अस्सी बरस का कोई वृद्ध हो या बालक अथवा माता-बहनें सभी को सरकारी पुलिस ने एक नज़र से देखा. दिनभर की आपाधापी के बाद थक कर चूर मीडिया कर्मियों की झपकी भी तत्काल टूट गयी और हम सभी ने देखा कि लाइट बुझाई जा रही है, ज़नरेटर और उसके तारों पर जल छिडकाव किया जा रहा है और अचानक आंसू गैस के गोले छोड़े जाने लगे मंच पर, जिससे वहाँ आग लग गयी. एक बारगी तो ऐसा लगा कि मैदान को पुलिस कही लाक्षा गृह तो बनाने की फ़िराक में नहीं है. इसे आप आतंकी काररवाई नहीं तो और क्या कहेंगे.
यदि इस बर्बरता की तुलना जालियांवाला बाग से की जा रही तो कहीं से गलत भी नहीं, बल्कि यह घटना तो उससे भी ज्यादा इसलिए जघन्य है कि यहाँ कार्रवाई रात के अँधेरे में की गयी और लोकतंत्र की हत्या करने में हमेशा अग्रणी रही कांग्रेस ने ऐसा कुकर्म न तो पहली बार किया और न ही अंतिम बार. याद आ गयी 25 जून 1975 की वो काली रात जब श्रीमती इंदिरा गाँधी ने आपातकाल की घोषणा के लिए भी यही समय चुना था. समस्त विपक्षी राजनेताओं को बिस्तर से उठा कर गिरफ्तार किया गया था और जिस जेपी की गोद में खेली थी इंदु, उसी ने बतौर प्रधान मंत्री अपने कभी सबसे प्रिय रहे अंकल को न सिर्फ उसी रात जेल में ड़ाल दिया था, वरन एक षडयंत्र के तहत उनको मरवाने का कुत्सित प्रयास भी किया. बताने की जरूरत नहीं कि लोक नायक जयप्रकाश नारायण के गुर्दे इसी हिरासत के दौरान ही ख़राब किये गए थे.
इस घटना का उल्लेख हमने आज की युवा पीढ़ी को उस इतिहास से रूबरू कराने और कांग्रस के काले कारनामों के बारे में बताने के उद्देश्य से किया और यह भी कि यह राजनैतिक दल हर धतकरम रात के अँधेरे में चोरों की तरह करता रहा है. अन्ना हजारे हों या बाबा रामदेव दोनों एक ही उद्देश्य के लिए मैदान में उतरे हैं. दोनों ही अहिंसा में विश्वास रखते हैं. बस, दोनों की कार्य शैली में थोड़ा फर्क यह कि अन्ना अपने मंच का इस्तेमाल राजनेताओं को नहीं करने देते वहीं बाबा के मंच पर ऐसी कोई बंदिश नहीं है और दोनों के बीच यही अंतर्विरोध है. यहां अन्ना ज्यादा सही इसलिए हैं कि जो मुद्दे उठाये गए हैं, वे विशुद्ध राजनीतिक तो हैं मगर राजनेताओं की विश्वसनीयता जिस कदर तार-तार हुई है उसने आम लोगों के बीच उनकी साख रसातल में पहुंचा दी है. विशेष रूप से भाजपा का चाल, चेहरा, चरित्र सत्तालोलुपता के चलते जिस कदर बेनकाब हुआ है, उसने देश में अचानक राजनीतिक शून्यता ला दी और इसी शून्यता को भरने के लिए ही सामजिक संगठनों को आगे आना पड़ा.
अन्ना ने गाँधी को अचानक ही और भी ज्यादा प्रासंगिक कर दिया है और यह भी कि आज देश की युवा शक्ति को रामदेवों और अन्नाओं जैसों को ही अपना आदर्श मानने की जरूरत है, ढपोरशंखी नेताओं को नहीं, जिनकी कथनी-करनी में ज़मीन-आसमान का अंतर है और जो दलित कलावती के यहां रात्रि विश्राम करते हैं, किसानों को जिन्दा जला देने के झूठे आरोप गढ़ कर घडियाली आंसू बहाते हैं, मगर भ्रष्टाचार के मुद्दे पर उनकी जुबान सिल जाती है और सबसे अलग राजनीतिक पार्टी का दम भरने वाली भाजपा प्रदेश में अपनी सरकारों के भ्रष्टाचार पर आँख मूंदे रहती है और उनका शीर्षस्थ नेता विदेश में जमा काले धन को लेकर भ्रष्टाचार की गंगोत्री कांग्रेस की राजमाता के आगे गिडगिडाते हुए माफी मांगता है. उस राजमाता के आगे जिसके रिमोट कंट्रोल की बैटरी घोटालों और सरकारी लूट के ज्वलंत मुद्दों को देखते ही ख़तम हो जाती है. यही नहीं राजमाता और युवराज ने एक ऐसा हरकारा भी पाल रखा है जिससे वो कहलवाया जाता है जो माँ-बेटे खुद अपने मुखारविंद से नहीं कह सकते. मजा तो ये कि उसके अनाप-शनाप बयानों से कांग्रेस पल्ला तो झाड़ती है पर उस पर काररवाई की कौन कहे, उसकी हैसियत हर बयान के बाद बढ़ जाती है और वो दीवाने खास का और भी करीबी कारिन्दा हो जाता रहा है.
इतिहास गवाह है कि कांग्रेस पर जब-जब आरएसएस का भूत सवार हुआ है, तब-तब उसे सत्ता से हाथ धोना पड़ा है. एक बार फिर वही भूत उस पर चढ़ा है और उसका अंत भी सन्निकट है. अन्ना और बाबा दोनों को संघ का एजेंट बता कर भ्रष्टाचार के खिलाफ वर्तमान मुहिम को साम्प्रदायिकता का रंग देने की कुत्सित चेष्टा की जा रही है. गांधीवादी अन्ना को जो जानता है, वह ऐसे कुप्रचार पर कभी विश्वास नहीं करेगा. जहाँ तक बाबा का सवाल है तो वो सहर्ष यह स्वीकार करते हैं कि हाँ उन्हें संघ का समर्थन प्राप्त है पर क्यों सिर्फ संघ, और भी न जाने कितने सामाजिक, धार्मिक संघटन बाबा के अभियान से जुड़े हैं. क्यों नहीं उनका भी नाम लिया जाता..? अगर कोई विवादस्पद संघटन यदि देश कल्याण के लिए कोई अभियान छेड़ता या किसी नेक काम के लिए समर्थन देता है तो उस में गलत ही क्या है. आप मुस्लिम, इसाई बौद्ध, जैन और सिख धर्मगुरुओं की बाबा के मंचों पर मौजूदगी की चर्चा क्यों नहीं करते. दुर्दांत आतंकी लादेन को ओसामा बिन लादेनजी के नाम से संबोधित करने, पाकिस्तानी समर्थक जिलानी के देशद्रोही बयानों पर आँख मूँद लेने, आतंकवादियों के घर मातमपुर्सी करने उनके घर जाने और हजारों सिखों की लोमहर्षक हत्या करने वाले दल से भी बड़ा कोई सांप्रदायिक हो सकता है क्या..?
मैं खेल प्रेमी के रूप में एक सवाल पाठकों से पूछना चाहता हूँ कि वो ये बताएं कि क्या मैच फिक्सिंग या पैसे लेकर टीम बेचना और उसकी हार सुनिश्चित करना देशद्रोह नहीं है …? एक शख्स जिसे देश की टीम की बागडोर सौंपी गयी थी मगर जिसने सटोरियों से पैसे खा कर मैच फिक्सिंग जैसी नीच हरक़त की, जिसे आईसीसी ने बिरादरी से हमेशा के लिए प्रतिबंधित कर दिया, जिसे क्रिकेट के मैदान में घुसने तक भी इज़ाज़त नहीं थी, उसे ही वोट की गणित के चलते देश की सबसे बड़ी पंचायत यानी संसद में पंहुचा दिया हो, वो पार्टी क्या साम्प्रदायिक नहीं और क्या उससे भ्रष्टाचार मिटाने की उम्मीद की जा सकती है..? जानते हैं, भारतीय दंड संहिता में यह अपराध देश द्रोह की श्रेणी में नहीं आता. वर्तमान कानून कहता है कि देश के खिलाफ किया गया कोई अपराध देशद्रोह नहीं, मगर सरकार के खिलाफ किया गया कृत्य देशद्रोह के अंतर्गत आता है. कितना क्रूर खिलवाड़ किया गया देश की जनता के साथ कि जो कानून अंग्रेजों ने अपनी सुविधा के लिए बनाया था, कांग्रेस ने सत्ता सँभालने के बाद भी इसे अपनी सुविधा के लिए बरकरार रखा. ऐसे और भी कई कानून हैं जिन्हें अभी तक ख़तम नहीं किया गया. बाबा और अन्ना इसी व्यवस्था को बदलने की ही तो बात कर रहे हैं.
बाबा किस आधार पर देश का चार सौ लाख करोड़ का काला धन विदेशों में जमा होने की बात कर रहे हैं ये तो नहीं पता, मगर तमाम रपट यही बताती हैं कि सबसे ज्यादा पैसे भारतीयों के ही जमा हैं. क्या ये पैसे एक रात में ही जमा हुए हैं..? सच तो ये है कि आज़ादी मिलने के तत्काल बाद से ही यह प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी. एक लोकतांत्रिक देश के कर्णधारों ने बापू के सिद्धांतों के सर्वथा विपरीत एक ऐसी दोगली समाजवादी आर्थिक नीति अपनाई जिसमे था कोटा, जिस में था परमिट और कंट्रोल. खद्यान्न से लेकर वस्त्र तक सभी पर तो राशनिंग थी. ठीक है कि जीवन भर आन्दोलन करने वाले कांग्रेसजनों को परमिट मिले, पर यहीं से शुरू हो गया काले धन का सिलसिला जो आज सुरसा की मानिंद मुंह बाये खड़ा है. पंचवर्षीय योजनाओं का धन जनता की बजाय नौकरशाहों, राजनेताओं और बिचौलियों की जेबों में गया. आवंटित ८५ प्रतिशत धन तो कभी जनता तक पहुंचा ही नहीं. यह मैं नहीं कहता. यह स्वीकारोक्ति तो खुद राजीव गाँधी और उनके चिरंजीव राहुल की है.
सरकार अन्ना और बाबा दोनों के पीछे हाथ धो कर पड़ चुकी है. अन्ना ने जन लोकपाल के लिए गठित कमेटी का बहिष्कार कर दिया है. सात जून को राजघाट पर रामलीला मैदान में हुई रावण लीला के विरोध में अन्ना के एक दिनी उपवास और धरने में स्वस्फूर्त जुटी जनता ने सरकार की पेशानी पर पड़े बल और भी घने कर दिए हैं और निकट भविष्य में यदि हम बाबा को तरह-तरह के आरोपों में घिरे देखें तो चौंकने की जरूरत नहीं है. सहला के फंसाना और फिर नंगा कर देने की कांग्रेस की पुरानी आदत रही है. अन्ना होशियार हैं पर बाबा के लिए ऐसा नहीं कहा जा सकता. सरकार उनको फंसाने की पुरजोर कोशिशें करेगी. पर इस बार मामला कुछ अलग है. बाबा के सलाहकारों, विशेष रूप से आधुनिक भारतीय राजनीति के चाणक्य गोविन्दाचार्य को कुछ ज्यादा सजग रहने की जरूरत है. बाबा को अनावश्यक बयानबाजी से वे रोकें. बाबा से कुछ गलतियाँ हुई हैं और गोविन्दजी कमान संभाले. बतौर प्रवक्ता सामने आयें तो वो इस अभियान को मुकाम तक पहुँचाने के लिए उसी तरह से सूत्रधार बनेंगे जैसे कि समग्र क्रांति के दौरान बने थे.
भ्रष्टाचार के खिलाफ देश में यह तीसरी जंग है, यह मुद्दा ही इतना संवेदनशील है कि आम जन स्वयं को इससे जुड़ा पाता रहा है. चाहे वो १९७७ रहा हो या १९८९, दोनों बार भ्रष्टाचार ने ही इसी कांग्रेस को सत्ताच्युत किया था पर चूंकि सत्ता बदलने वालों के पास व्यवस्था बदलने का कोई ब्लू प्रिंट नहीं था इसलिए दोनों बार जनता ने खुद को छला और ठगा महसूस किया. भ्रष्टाचार लूट तंत्र के स्तर तक जा पंहुचा है. मतदाताओं के वोट पैसे से खरीद कर संसद पहुंचे और फिर गृहमंत्री की अहम जिम्मेदारी संभाल रहे चिदंबरम हों या कपिल सिब्बल जैसे भ्रष्टाचारियों के पोषक, जो राजा के जेल जाने तक यही दावा करते रहे थे कि टूजी स्पेक्ट्रम में कोई भ्रष्टाचार नहीं हुआ है, बाबा को ठग और अन्ना को संघ का दलाल कहने वाले दिग्विजय जैसे लोगों के चेहरे सामने आ चुके हैं. देश की सबसे भ्रष्टतम सरकार के तथाकथित ईमानदार प्रधानमंत्री की हताशा समझी जा सकती है. लेकिन उनको भी ये समझ लेना चाहिए की इस बार लड़ाई आर-पार की है. अन्ना हो या बाबा, दोनों सिस्टम में बदलाव का पूरा खाका तैयार करके ही रणक्षेत्र में उतरे हैं. दोनों के पास काबिल और देशभक्त विशेषज्ञों की लम्बी चौड़ी फ़ौज हैं. बस जरूरत दोनों के बीच समन्वय और पूरे तालमेल के साथ देश में साझा जंग लड़ने की है. सरकार ने रावणलीला के माध्यम से दोनों को फिर से जोड़ने का सकारात्मक काम भी किया है. देखने वाली बात तो यह है कि अन्ना एंड कंपनी और बाबा का स्वाभिमान ट्रस्ट मिले इस मौके का कितना लाभ उठाने में सफल होता है. दोनों साथ जुड़ कर लडें, समय की यही पुकार भी है.
लेखक पदमपति शर्मा वरिष्ठ पत्रकार हैं. इनकी गिनती देश के जाने-माने हिंदी खेल पत्रकारों में होती है.

