Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

तेरा-मेरा कोना

भाभी से होलियाना छेड़छाड़

फागुन का महीना, देवरों पर चुनावों के साथ-साथ होली का भी खुमार, सामने प्यारी सी सलोनी सी भाभी- ऐसे माहौल में अगर छेड़छाड़ न होगी, तो क्या भजन-कीर्तन होगा? भाभी आयी थी कुछ वोट कमाने। सोचा होगा कि देवरों की ओर मीठी-सी मुस्कान फेंककर कुछ वोटों-सीटों का जुगाड़ हो जाएगा, जिससे अगले पाँच साल तक दाल-रोटी चलती रहेगी। पर देवर ठहरे देवर। भाड़ में गया वोट, चुनाव तो होते ही रहते हैं, पर भाभी से हँसी-ठिठोली-छेड़छाड़ का मौका बार-बार नहीं मिलता। इसलिए उन्होंने तय कर लिया था कि भाभी से होली खेलनी ही है।

फागुन का महीना, देवरों पर चुनावों के साथ-साथ होली का भी खुमार, सामने प्यारी सी सलोनी सी भाभी- ऐसे माहौल में अगर छेड़छाड़ न होगी, तो क्या भजन-कीर्तन होगा? भाभी आयी थी कुछ वोट कमाने। सोचा होगा कि देवरों की ओर मीठी-सी मुस्कान फेंककर कुछ वोटों-सीटों का जुगाड़ हो जाएगा, जिससे अगले पाँच साल तक दाल-रोटी चलती रहेगी। पर देवर ठहरे देवर। भाड़ में गया वोट, चुनाव तो होते ही रहते हैं, पर भाभी से हँसी-ठिठोली-छेड़छाड़ का मौका बार-बार नहीं मिलता। इसलिए उन्होंने तय कर लिया था कि भाभी से होली खेलनी ही है।

अब जैसे ही भाभी कार से उतरीं कि देवरों ने घेर लिया। ‘भाभी, बस एक बार गाल पर गुलाल लगा लेने दो।’ यह अनपेक्षित माँग सुनकर भाभी परेशान हो गयी। बड़ी मुश्किल से मंच तक पहुँची। सोचा होगा कि मंच के आस-पास बैठे देवर लोग अधिक सभ्य होंगे। पर वे तो और भी अधिक होलियाना मूड में थे। भाभी की बात सुनने को एकदम तैयार नहीं। उल्टे होली के रसिया गा रहे थे। भाभी ने लाख समझाया कि ‘पहले मेरी बात सुन लो, होली बाद में खेल लेना। यह साड़ी होली वाली नहीं है।’ पर देवरों पर इसका कोई असर नहीं। अगर भाभी लाठी लेकर उन पर पिल पड़ती, तो वे ज्यादा खुश होते। वे ब्रज की लठामार होली का स्वाद चख लेते। इसके लिए पूरी तरह तैयार होकर आये थे।

ऐसे दीवाने देवरों को देखकर भाभी डर गयीं। भैया से शिकायत करने की धमकी दी। इस पर देवर और भी अधिक हो-हल्ला करने लगे। ‘भाभी, हम भैया से नहीं डरते। अगर भैया डाँटेंगे, तो उनको भी गुलाल लगा देंगे। पर हम भाभी से होली जरूर खेलेंगे।’ भाभी जानती थी कि ससुर जी से भी शिकायत करने का कोई लाभ नहीं होगा। वे तो ज्यादा से ज्यादा यही कहेंगे कि ‘लड़के हैं, लड़कों से गलतियाँ हो जाती हैं।’

लेकिन भाभी ऐसी गलतियों का मौका बिल्कुल नहीं देना चाहती थीं। भाड़ में जायें वोट। जान है, तो जहान है। सो भाभी ने देवरों से जान-बचाकर निकल लेना ही अच्छा समझा। किसी तरह कार में बैठकर भाग निकलीं। देवर बेचारे दूर से ही होली के रसिया गाते ही रह गये। अब कहीं और जाकर गलतियाँ करेंगे। पर ऐसी भाभी और कहाँ मिलेगी?

इस हास्य-व्यंग्य के लेखक बीजू ब्रजवासी उर्फ विजय कुमार सिंघल से संपर्क मोबाइल नं 9919997596 के जरिेए किया जा सकता है.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You May Also Like

मेरी भी सुनो

अपनी बातें दूसरों तक पहुंचाने के लिए पहले रेडियो, अखबार और टीवी एक बड़ा माध्यम था। फिर इंटरनेट आया और धीरे-धीरे उसने जबर्दस्त लोकप्रियता...

राजनीति-सरकार

मोहनदास करमचंद गांधी यह नाम है उन हजार करोड़ भारतीयों में से एक जो अपने जीवन-यापन के लिए दूसरे लोगों की तरह शिक्षा प्राप्त...

साहित्य जगत

पूरी सभा स्‍तब्‍ध। मामला ही ऐसा था। शास्‍त्रार्थ के इतिहास में कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि किसी प्रश्‍नकर्ता के साथ ऐसा अपमानजनक व्‍यवहार...

मेरी भी सुनो

सीमा पर तैनात बीएसएफ जवान तेज बहादुर यादव ने घटिया खाने और असुविधाओं का मुद्दा तो उठाया ही, मीडिया की अकर्मण्यता पर भी निशाना...