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भारतीय भाषा समूह का गठन

राजधानी दिल्ली में विभिन्न भारतीय भाषाओं के प्रतिनिधियों ने अपनी भाषाओं के हितों में सामूहिक आवाज उठाने के लिए भारतीय भाषा समूह ( बी बी एस)  का गठन किया है। भारतीय भाषा समूह ने सरकार से भारतीय भाषाओं के हितों के लिए भाषा आयोग बनाने की मांग की है जिसे संवैधानिक दर्जा प्राप्त हो। भारतीय भाषा समूह ने प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित अपनी इस बैठक में यह आकलन प्रस्तुत  किया कि 1947 के बाद सत्ता के केन्द्र  दिल्ली में भारतीय भाषाओं की जो उपस्थिति सुनिश्चित की गई थी वे बेदखल की जा रही है। सत्ता के कई प्रतिष्ठानों से कई भारतीय भाषाएं विस्थापित कर दी गई है।इनमें आकाशवाणी ले कर भारतीय संसद जैसी संस्थाएं भी शामिल है।

राजधानी दिल्ली में विभिन्न भारतीय भाषाओं के प्रतिनिधियों ने अपनी भाषाओं के हितों में सामूहिक आवाज उठाने के लिए भारतीय भाषा समूह ( बी बी एस)  का गठन किया है। भारतीय भाषा समूह ने सरकार से भारतीय भाषाओं के हितों के लिए भाषा आयोग बनाने की मांग की है जिसे संवैधानिक दर्जा प्राप्त हो। भारतीय भाषा समूह ने प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित अपनी इस बैठक में यह आकलन प्रस्तुत  किया कि 1947 के बाद सत्ता के केन्द्र  दिल्ली में भारतीय भाषाओं की जो उपस्थिति सुनिश्चित की गई थी वे बेदखल की जा रही है। सत्ता के कई प्रतिष्ठानों से कई भारतीय भाषाएं विस्थापित कर दी गई है।इनमें आकाशवाणी ले कर भारतीय संसद जैसी संस्थाएं भी शामिल है।

आकाशवाणी व संसद में भाषाओं के अनुवादकों की नियुक्तियां बंदी की तरफ बढ़ी है। स्थायी नियुक्ति की जगह ठेकेदारी प्रथा से इस साजिश को अंजाम दिया गया है। दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी में भारतीय भाषाओं की पुस्तक की उपस्थिति भी लगातार कम होती चली गई है। यहां तक की विश्व पुस्तक मेले में भी भारतीय भाषाओं के बुक स्टॉलों की संख्या लगातार कम हो रही है या वे अनुपस्थित हो गई है।

दिल्ली में उर्दू , पंजाबी व संस्कृत को छठवें पर्चे के रूप में पढ़ाए जाने के बजाय सातवें वैकल्पिक पर्चे के रूप में पढ़ाने के सरकारी फैसले ने इन भाषाओं के लिए दिल्ली सरकार की संस्थाओं में खतरा पैदा कर दिया है। मेडिकल के लिए प्रवेश परीक्षाएं छह भाषाओं की बजाय सभी 22 भाषाओं में करने की भी मांग की गई। भारतीय भाषा समूह के अनुसार पहले ही न्यायालयों में केवल अंग्रेजी का वर्चस्व है और भारतीय भाषाएं बेहद लचर स्थिति में पहुंच गई है। यूपीएससी ( लोल सेवा आयोग) जैसी संस्थाओं में विभिन्न भाषाओं की पृष्ठभूमि वाले प्रतिभागियों के साक्षात्कार के दौरान अनुवादक की उपस्थिति अनिवार्य है लेकिन उस संस्था में प्रतिभागियों को उनकी भाषाओं के अनुवादकों की मौजूदगी की सूचना तक नहीं दी जाती है। त्रिभाषी फार्मूले की नीति का कतई पालन नहीं किया जा रहा है।

सरकारी संस्थाओं में अंग्रेजी का वर्चस्व भारतीय भाषाओं की कीमत पर विस्तारित हो रहा है। जब से बड़े पैमाने पर  निजी कंपनियां देश में सक्रिय हुई है वे खुलेआम भाषा नीति का उल्लंघन कर रही है। भारतीय भाषा समूह के एक सदस्य ने एचडीएफसी बैंक को भेजे गए एक ईमेल में कहा कि बैंक अपने उपभोक्ताओं को अंग्रेजी का इस्तेमाल करने के लिए दबाव डाल रहा है। उक्त बैंक ने उस शिकायत का महीनों बाद भी जबाव नहीं दिया है जबकि अंग्रेजी के इस्तेमाल के लिए दबाव बनाने की बात उस बैंक के चेक बुक में स्पष्ट तौर पर देखने को मिलती है। समूह के एक सदस्य ने बताया कि पटियाला स्थित पंजाबी विश्वविद्यालय से उन्हें पंजाबी में एक चेक मिला था लेकिन आई सी आई सी आई बैंक ने उन्हें चेक लौटा दिया और बताया कि चेक के पंजाबी में होने के कारण लौटाया गया है। बाद में वह चेक उन्हें सार्वजनिक क्षेत्र के पंजाब एंड सिंध बैंक में जमा कराना पड़ा।

भारतीय भाषा समूह ने निर्णय किया है कि भाषाओं के हितों के मद्देनजर वे समय समय भाषाओं का सामाजिक अंकेक्षण प्रस्तुत करेंगे। सरकार से समूह ने मांग की है कि वह तत्काल भारतीय भाषा आयोग का गठन करें और उन्हें संवैधानिक दर्जा प्रदान करें ताकि भाषा संबंधी जो हमले हो रहे है उनसे सुरक्षा पाने के उपाय हासिल किए जा सकें।पुरानी दुनिया में उसी देश की अर्थ व्यवस्था मजबूत हुई है जहां कि उन्होने अपनी भाषाओं की सुरक्षा की है। इनमें चीन का नाम प्रमुख रूप से लिया जा सकता है। भारतीय भाषा समूह का यह स्पष्ट मानना है कि भारतीय भाषाएं अपने हितों को साझी लड़ाई से ही सुरक्षित रख सकती हैं।

संयोजक- भारतीय भाषा समूह
दीपक धोलकिया -9818848753
अनिल चमड़िया -9868456745

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