कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और कश्मीर भारत का अभिन्न अंग रहेगा भी, पर तकनीकी दृष्टि से देखा जाये, तो कश्मीर भारत का अभिन्न अंग सिर्फ कहने को ही है, क्यों कि विधान के अनुसार कागजों में जो दर्ज है, उसका ऐसा ही कुछ अर्थ निकलता है, जिसके बारे में देश के बाकी भागों में रहने वाले अधिकांश आम नागरिकों को जानकारी ही नहीं है। सरकार सब कुछ जानते हुए भी कुछ कर नहीं पा रही है, जिससे समस्या कम या समाप्त होने की बजाये हमेशा मुंह फैलाये निगलने को आतुर ही बनी रहती है।
प्राचीन गाथाओं व ग्रंथों या शास्त्रों में वर्णित बातों को नजर अंदाज कर दिया जाये, तो भी भारत का विभाजन होने के बाद जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह व पाकिस्तान के बीच एक स्टैंडस्टिल ऐग्रीमेंट हुआ था, लेकिन ऐग्रीमेंट को तोड़ते हुए पाकिस्तान ने 22 अक्टूबर 1947 को घाटी पर आक्रमण कर दिया। हमले के दौरान ही महाराजा हरि सिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को पूरे जम्मू-कश्मीर को भारत में बगैर शर्त विलय कर दिया। विलय के बाद भारत की सेना ने पाकिस्तानी सेना को रौंदना शुरू कर दिया, लेकिन उस समय के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने एकतरफा युद्ध विराम की घोषणा कर दी और विवाद यूएनओ की सुरक्षा परिषद में भेज दिया, जिससे भारत या कश्मीर का एक हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में ही रह गया और वह आज तक पाकिस्तान के ही कब्जे में है। जिसे पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के रूप में जाना जाता है, जब कि विलय के अनुसार वह हिस्सा भी भारत का ही होना चाहिए, पर कब्जा छोडऩे की बजाय पाकिस्तान इस जमीन के टुकड़े का भारत के विरुद्ध शुरू से ही इस्तेमाल करता आ रहा है, क्यों कि यह इलाका आतंकवादी गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र है और एक तरह से आतंकी ट्रेनिंग सेंटर बन कर रह गया है।
आजादी के बाद भारतीय स्वाधीनता अधिनियम 1947 के तहत कुल 659 रियासतों का विलय हुआ था, जिनमें से एक जम्मू-कश्मीर भी है। इस नियम के तहत विलय होने के पश्चात आपित्त करने का अधिकार रियासतदारों के साथ निवासियों को भी नहीं होता है। इसके बाद वर्ष 1951 में जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा का निर्वाचन हुआ, तो उसने भी 6 फरवरी 1954 को विलय की पुष्टि कर दी। इस संविधान सभा ने 1956 में अलग संविधान बनाने की प्रक्रिया पूर्ण की और जम्मू-कश्मीर की विधान सभा की स्वीकृति के बाद यह संविधान अनुच्छेद 37 के तहत 26 जनवरी 1957 को विधिवत लागू हो गया। इसी संविधान की धारा 3 में लिखा है कि जम्मू-कश्मीर राज्य भारत का अभिन्न अंग है और रहेगा, साथ ही धारा 4 में उल्लेख है कि 15 अगस्त 1947 तक महाराजा के आधिपत्य में जितना भाग था, वह पूरा भाग जम्मू-कश्मीर और भारत का हिस्सा है। धारा 147 में स्पष्ट रूप से यह भी लिखा है कि धारा 3 व 4 को बदला ही नहीं जा सकता।
इससे यह सिद्ध होता है कि महाराजा हरि सिंह के साथ वहां की पूरी जनता व बाद में चुनी गयी सरकार ने भी जम्मू-कश्मीर के विलय की विधिवत व खुशी-खुशी स्वीकृति दी, पर कुछ राजनेताओं की गलती के कारण वह स्वीकृति आज तक व्यवहार या यथार्थ में परवर्तित नहीं हो पा रही है। जम्मू-कश्मीर भारत का ही एक राज्य है, पर भारत के करीब सौ ऐसे कानून हैं, जिन्हें वहां की सरकार ने आज तक लागू नहीं किया है। कश्मीर के मुख्यमंत्री को आज भी वजीर-ए-आजम व राज्यपाल को सदर-ए-रियासत कहा जाता है। इसके अलावा जम्मू-कश्मीर का नागरिक भारत का नागरिक है, लेकिन भारत के नागरिक जम्मू-कश्मीर के नागरिक नहीं हो सकते। आम नागरिकों की तो बात ही छोडि़ये, भारत के राष्ट्रपति के पास भी यह अधिकार नहीं है, फिर भी जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और रहेगा।
भारत के संविधान की मूल विशेषता यही है कि यहां इकहरी नागरिकता के साथ सभी के पास मूल अधिकार हैं व सबसे खास समानता का अधिकार है। हमारा संविधान धर्मनिरपेक्ष भी है, लेकिन जम्मू-कश्मीर को ध्यान में रख कर देखा जाये, तो स्पष्ट लगता है कि यह सब भी कहने की ही बातें हैं। इससे भी बड़ी आश्चर्य की बात यह है कि इन मुददों के बारे में देश के विभिन्न भागों में बसे आम नागरिक कुछ नहीं जानते हैं और बुद्धिजीवी चर्चा तक करना नहीं चाहते। सरकार की बात की जाये, तो वह स्वयं इन मुददों को धर्म से जोड़ कर देखती है, जब कि यह मुददे किसी धर्म के नहीं, बल्कि देशभक्ति से जुड़े हैं, जिनका हल होना भारत की एकता व अखंडता के लिए बेहद जरूरी है, वरना कश्मीर अलगाववादियों या पाकिस्तान के निशाने पर हमेशा रहेगा, क्यों कि ऐसा करने की छूट एक तरह से हमने ही दे रखी है।
राजनीतिक दलों को कश्मीर के मुददे पर राजनीति करने की बजाये, कश्मीर को व्यवहार में भी भारत का अभिन्न अंग बनाने की दिशा में सोचना चाहिए। यह मुददा धार्मिक नहीं, बल्कि देश भक्ति का है। कश्मीरी नागरिकों की भी भारत में गहरी आस्था है। बमुश्किल बारामूला, पुलवामा, अनंतनाग व शोपियां में ही अलगाववादी ताकतें आये दिन दहशत का माहौल कायम करते रहते हैं, बाकी जनपदों में राष्ट्रभक्तों का ही बहुमत है। इस लिए इस मुददे पर समस्त राजनीतिक दलों को आम सहमति से समस्या का समाधान निकालना ही चाहिए। कुछ गंभीर मामलों को पीछे हटा कर एक कदम तो कम से कम आगे बढ़ाना ही चाहिए। सबसे पहले सरकार को सिखों के साथ समस्त ऐसे नागरिकों को भय मुक्त वातावरण बनाने की दिशा में कार्य करना चाहिए, जिससे वहां अलगाववादियों की दहशत पूरी तरह खत्म हो जाये, इसके लिए सरकार को अलगाववादियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई करनी ही होगी। वापस लिये गये सुरक्षा बलों के विशेषाधिकार बहाल किये जायें। ऐसा करने से अलगावादियों पर मनोवैज्ञानिक दबाव बढ़ जायेगा, अन्यथा कश्मीर भारत का अभिन्न अंग सिर्फ कागजों में ही रहेगा और पाकिस्तान की गिद्ध दृष्टि भी हमेशा जमी रहेगी।
लेखक बीपी गौतम मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं.

