आजकल भड़ास4मीडिया पर पत्रकारों की नैतिकता पर कुछ टिप्पणियां पढ़ीं। मैं भी मानता हूं कि पत्रकारों में नैतिकता होनी चाहिए। धन लेकर खबर को तोड़ना- मरोड़ना नहीं चाहिए, किसी की झूठी तारीफ नहीं करनी चाहिए, किसी की चापलूसी नहीं करनी चाहिए और किसी से डरना नहीं चाहिए। लाभ- लोभ से दूर जनहित में काम करना चाहिए। लेकिन आप इसका क्या करेंगे कि आजकल अनेक नए लड़के (सभी नहीं) पत्रकारिता में कैरियर बनाने आते हैं। और आजकल कैरियर का अर्थ हो गया है नैतिक रूप से या अनैतिक रूप से ऊपर जाने वाली सीढ़ी को फलांगते जाना। सारी बाधाओं को खत्म करते जाना।
वहां लोकहित, मूल्य और ईमानदारी जैसे शब्द अपनी गरिमा खो देते हैं। ऐसे पत्रकार इस चक्कर में रहते हैं कि कहां गिफ्ट बटोरने वाला प्रोग्राम हो रहा है। कहां भारी- भरकम गिफ्ट मिलेगा। कौन सी कंपनी फ्लाइट से कहां ले जा रही है। कौन की कंपनी फाइव स्टार में खाना खिला रही है। तो फिर नैतिकता कहां रहेगी? कुछ कंपनियां कुछ पत्रकारों के घर आकर्षक गिफ्ट भी भिजवा देती हैं। शर्ट और टी शर्ट दे देती हैं। गिफ्ट वाउचर दे देती हैं। आप अघाए रहिए और हमारे पक्ष में लिखते रहिए। कुछ भी सोचने की जरूरत नहीं है। वही सोचिए जैसा हम कहते हैं। अपना दिमाग हमारे पास गिरवी रखिए।
पत्रकार को भय रहित होना चाहिए। लेकिन उस पर अगर हमला होता है और वह अगर किसी छोटे या मझोले अखबार का पत्रकार है तो उसे कौन बचाएगा? हमलावर अगर अखबार मालिक से भी बड़े कद का हो तो उस पत्रकार की क्या गति होगी? किसी ईमानदार पत्रकार को कौन आगे बढ़ कर बचाता है? उसकी आजीवन सुरक्षा का जिम्मा कौन लेगा? कई सवाल हैं। सैद्धांतिक तौर पर कहना ठीक है कि पत्रकार अपनी जिम्मेदारी निभाएं।
लेकिन ईमानदारी की राह में कितने मगरमच्छ हैं, इसे भी देखिए। ईमानदार पत्रकार अनेक जगहों पर चुप हो जाता है। क्या करे? वह चाहता है कि वह दहाड़े लेकिन परिस्थितियां देख कर वह चुप हो जाता है। है कोई संगठन जो ईमानदार पत्रकार को पहचाने और उसकी सुरक्षा का बंदोबस्त करे? अभी तो पत्रकारों के वेतनबोर्ड के लिए मजीठिया आयोग की सिफारिशों पर नोटिफिकेशन में इतनी देर लग रही है। मानो केंद्र सरकार सो रही हो। सांसदों का अपना वेतन बढ़ाना होता है तो वे एक दिन में संसद में पास करवा लेते हैं। लेकिन जब पत्रकारों के वेतन का मामला उनके पास है तो उस पर वे सो जाते हैं।
ऐसे सिस्टम को आप क्या कहेंगे? क्या महंगाई सांसदों के लिए ही है? पत्रकार हवा पीकर रहते हैं क्या? क्या उन्हें दूध, सब्जी और अनाज नहीं चाहिए? कौन सुनता है पत्रकारों की बात? क्या पत्रकारों के इलाज के लिए कोई बड़ा अस्पताल है? किसी पत्रकार को मुफ्त में इलाज की छूट है? फिर मैं चाहता हूं कि पत्रकार नैतिक हो।
लेखक विनय बिहारी सिंह कोलकाता के वरिष्ठ पत्रकार हैं और हिंदी ब्लाग दिव्य प्रकाश के माडरेटर भी। उनसे संपर्क करने के लिए [email protected] का सहारा ले सकते हैं।

