: शाहन के शाह : पूरे आदर-सम्मान के साथ आवभगत हुई और जूनागढ के नवाब ने हीरे-जवाहरातों से भरा थाल सामने रखकर उसे कुबूल करने का अनुरोध किया। सामने ऊंचे आसन पर बैठे महात्मा ने थाल में से दो-चार जवाहरात उठाकर अपने मुंह में डाले और फिर अचानक थूक कर बोल उठे – क्यों रे धूर्त, यह क्या दे रहा है, यह ना तो मीठा है और ना ही खट्टा। सख्त भी इतना है कि दांत टूट जाएं। फिर क्या था। नवाब नतमस्त हो गया। बोला, हमें सेवा का कुछ तो मौका दें महाराज। इस पर आदेश हुआ कि ठीक है, आज से ही तू यह नियम बना ले कि कोई भी साधु-फकीर अब से भूखा नहीं रहेगा। हर एक को ढाई पाव आटा दिया जाएगा। गरीब रियाया के साथ भी यही सुलूक होना चाहिए। और इस हुक्म को जूनागढ के नवाब ने फर्शी सलाम बजाकर मंजूर कर लिया।
यह है अघोरेश्वर के नाम से मशहूर संत कीनाराम कथा। दरअसल अपने चेले को जूनागढ़ जेल से छुड़ाने के लिए कीनाराम ने भिक्षाटन का वही तरीका अपनाया, जिसके अपराध में उनके चेले विजयराम को जेल में डाल दिया गया था। कीनाराम भी जेल में डाल दिये गये। काम मिला चक्की पीसने का। लेकिन बजाय चक्की चलाने के, वे चक्की को ही चलने का हुक्म दे बैठे। चक्की नहीं चली तो उन्होंने चक्की पर अपनी छड़ी मार दी। फिर तो जैसे चमत्कार ही हो गया। एक साथ ही जेल की सारी 981 चक्कियां अपनेआप ही चलने लगीं। जाहिर है कि जूनागढ के नवाब को इस चमत्कार के आगे नतमस्तक होना ही था। जूनागढ की जेल में बंद सारे फकीरों को रिहा भी कर दिया गया। यह थे बाबा कीनाराम। कीना यानी खरीदा हुआ।
चंदौली जिले के रामगढ़ गांव के रघुवंशी क्षत्रिय जमींदार परिवार में अकबर सिंह के घर विक्रमी संवत 1685 के भादों में कृष्णपक्ष की अघोर चतुर्दशी को क्षिजित में सूर्य के उदय के साथ ही शिवा का जन्म हुआ। लेकिन बच्चा ना तो रोया और ना ही दूध के लिए चिल्लाया। मां मनसा देवी समेत पूरा कुटुम्ब परेशान। अचानक ही तीन साधु पहुंचे और बच्चे के कान में कुछ मंत्रोच्चार किया। कहा जाता है कि यह तीनों साधु ब्रह़मा, विष्णु और महेश ही थे, जो बच्चे को आशीष देकर चले गये। पुरोहितों की सलाह पर इस बच्चे को पहले बेचा गया फिर खरीदा गया। यह एक टोटका था। लेकिन जिस बच्चे को खरीद कर कीनाराम बनाया गया, तब किसी को क्या पता था कि वही कीनाराम दुनिया के दुखों को खरीद कर अपनी झोली में डाल लेगा, सामाजिक बुराइयों को कदमों तले रौंद डालेगा और इतिहास में एक अमर पुरूष के तौर पर पूजित होगा। यह कीनाराम ही था जिसने राम को अवाम तक पहुंचा कर एक नये सांस्कृतिक आंदोलन का सूत्रपात किया, जिसके परिणामस्वरूप देश को राजनीतिक तौर पर एकजुट किया जा सका।
कीनाराम तो बचपन से ही जिज्ञासु था। विवाह हुआ लेकिन गौना से पहले ही पत्नी की मायके में मौत हो गयी। कुछ समय बाद मां ने भी दम तोड़ दिया। बस यहीं से शुरू हो गया कीनाराम का एक अनोखा वैराग्य जो सीधे शिव के साथ ही राम तक को भी आत्मसात कर गया। सामाजिक जाति-पाति के बंधन और भेदभाव देख मन वित़ष्णा से भर गया तो घर छूट गया और कीनाराम औघड़ हो गया। वैचारिक युद्ध शुरू हो गया। तुलसीदास बोले सियाराम मैं सब जग जानी तो कीनाराम ने जवाब दिया कि आओ फिर मिल एकसाथै भोजन सानी। देखते ही देखते कीनाराम की धूनी का धुआं लोगों को पवित्र करने लगा। लेकिन कीनाराम ने किसी पर कुछ थोपा नहीं। राजसी रूचि के लोगों को वैष्णव ही रहने दिया और सम्पूर्ण समर्पितों को अघोर बना दिया। उनके भक्तों को यकीन था कि कीनाराम में अलौकिक शक्तियां हैं। हिंगलाज देवी से उनका साक्षात्कार तो खूब चर्चित घटना रही। उनके अभिन्न शिष्य बीजाराम को तो बचपन में कीनाराम ने चमत्कार की तरह तब एक जमींदार के मुंह पर एक मोटी रकम मार कर हासिल किया था, जब वह बीजाराम को लगान न चुकाने पर बंधक बनाये हुए था। कांधार में शाहजहां और काशी में राजा तेज सिंह को दिया सर्वनाश का श्राप तो आज भी लोगों का दिल दहला देता है।
कीनाराम ने देश की सांस्क़तिक एकता को राजनीतिक ताकत के तौर पर पहचाना और उसमें विभेदी तत्वों के खिलाफ जेहाद छेड़ा। एक कपाल-खप्पर, एक लंगोटी और मिट़टी का एक बर्तन की अपनी भौतिक सम्पदा के बल पर ही कीनाराम ने पूरे आर्यावर्त को नाप डाला। जरूरत पड़ी तो केवल अक्षत फेंक कर बहते शव को जिंदा कर दिया, तो कभी काशी के शीतलाघाट पर केवल ज्ञान बिखेर रहे लोगों के बीच गदहे पर बैठकर पहुंचे और उन्हें कर्म की शिक्षा दी। यह इस अधनंगे संत का ही दमखम था जो वह अकेले औरंगजेब से जा भिड़ा। 21 सितंबर 1771 को करीब 170 साल की उम्र में कीनाराम ने देह त्यागी। बडे-बडे भण्डारों को अपने खप्पर में खाली कर लोगों के अहंकार धूलधूसरित कर देने की ताकत रखने वाले इस संत ने ठीक ही कहा कि कीनाराम फकीरी सहज नहीं, पग धरते निकले दूध छटी का।
लेखक कुमार सौवीर लखनऊ के जाने-माने पत्रकार हैं. इन दिनों महुआ न्यूज में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्यरत हैं. उनका यह लेख जनसंदेश टाइम्स में प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लिया गया है.

