
संजय
भविष्य में होने वाले चुनाव के मद्देनजर अपने आपको तैयार करते दिख रहे हैं। क्योंकि हमारे देश के नेता इतने भ्रष्ट हो चुके हैं कि उनकी वादाखिलाफी की अगर सूची बनायी जाये तो पन्ने कम पड़ जायेंगे, कलम की स्याही खत्म हो जायेगी। हमारे नेता ऐसे मुद्दों को ढूंढते रहते हैं जिन पर वो अपरी रोटियां सेंक सकें। क्या आपने कभी सोचा कि अचानक सभी विपक्षी दलों को जनता की सुध कैसे आ गयी कि इस मंहगाई के कारण जनता को परेशानी हो रही होगी। जनता भाड़ में जाये या कमरतोड़ मंहगाई के कारण मर जाये नेताओं की बला से।
चोर तो सभी दल के नेता हैं, मगर कोई कम कोई ज्यादा। आज तक के इतिहास को उठाकर अगर देखा जाये तो जब-जब कांग्रेस की सरकार सत्ता में आयी है तब-तब मंहगाई बढ़ी है, आखिर ऐसा क्यूं है, क्या कभी हमारे देश के नेताओं ने सोचा है या आज तक हमारे विपक्षी दलों को दिखायी नही दिया? एक तरफ भाजपा ने मंहगाई के खिलाफ अपना मोर्चा खोल दिया है तो दूसरी तरफ सभी विपक्षी दल इस समय चोर-चोर मौसेरे भाई बन बैठे हैं। जो दल एक दूसरे को देखना तक पसंद नही करते थे, आज वही दल एक साथ मिलकर कांग्रेस के खिलाफ अवाज बुलंद कर रहे हैं। देखा जाये तो किसी भी दल के पास ऐसा कोई कारण नहीं है, जो आज आम जनता के बीच जाकर कह सकें कि हमारे दल ने आप सभी के लिए कोई काम किया है और हमे वोट दें। और इस समय सिर्फ यही एक मुद्दा सभी दलों को दिख रहा है, जिसके माध्यम से जनता के बीच अपनी छवि को सुधारा जा सकता है।
आज आम जनता को क्या मिल रहा है, 60 रूपये किलो टमाटर, गरीबों की सब्जी कहा जाने वाला आलू 10 रूपये किलो मिल रहा है। कोई भी सब्जी 30 रूपये किलो से कम नहीं है। टनो गेहूं सरकारी गोदामों में पड़ा सड़ रहा है। चीनी विदेश से आयात की गयी तो वो बन्दरगाह पर ही सड़ रही थी। दाल आयात किया गया तो वो भी सरकारी मकहमे की कारगुजारी से बन्दरगाह पर सड़ रहा था। क्या इन सब जानकारियों से सभी दल अनजान थे या वे जानना नहीं चाहते थे। नेताओं और राजनीतिक दलों को सिर्फ अपनी सियासत की चिंता है, अपनी चिंता है। नेताओं को अपना वेतन बढ़ाना हुआ तो बिल पास करा लिया। विकास के नाम पर सांसदों को दिया जाने वाला धन बढ़वा लिया। आखिर जनता के खून पसीने की कमाई को उड़ाने का अधिकार इन नेताओं को किसने दिया। अगर सरकारी खजाने में धन की कमी हो गयी तो कोई भी राजनीतिक दल हो ये सोचती है कि जनता को अबकैसे चूसा जाये। आखिर जनता तो है काठ का उल्लू।
क्या आप जानते है, जनता को परेशान कर उन्हें और परेशानी में डालने के पीछे राजनीतिक दलों की सोच क्या है? सोच ये है कि जनता को उनकी परेशानियों में इतना उलझा कर रखो ताकि वो किसी बारे में ना सोच सकें। जनता सिर्फ अपने नमक रोटी के बारे में ही सोच सके। अगर जनता को ज्यादा सहूलियतें मिल गयी फिर इन राजनीतिक दलों का सिंहासन खतरे में पड़ जायेगा। मगर हम पत्रकारों का ये दायित्व बनता है कि भारतीय लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाने वाला प्रेस लोगों को बताये कि इस देश के राजनीतिक दल इस देश को किस अंधेरी गुफा की ओर ले जा रहे हैं। वैसे भी आज संसद और विधान सभाओं में जूते चप्पल चलना आम बात है।
यह लोकतंत्र का कैसा मजाक है कि जिन हाथों में पुलिस की हथकड़ियां होनी चाहिए उन्हें ब्लैक कैट कमांडो की सुरक्षा मिल रही है। जिस देश की ससंद में डाकू, गुण्डे और कत्ल करने वाले पहुंच रहे हों, उस संसद से और क्या उम्मीद की जा सकती है कि जनता के प्रति उनका उत्तरदायित्व क्या होगा? और ये हमारी बदनसीबी ही है कि इन जैसे नेताओं को हम ही चुनकर इन्हे संसद में भेजते हैं, हम इनका आकलन नहीं करते कि आखिर चुना जाने वाला हमारा ये नेता हमारे भविष्य की उम्मीद है या ना उम्मीद। अगर यही हाल चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब लोकतंत्र, व प्रशासन से जनता का विश्वास पूरी तरह से उठ जाएगा (जो अभी ही बहुत कुछ उठ चुका है) और सम्पूर्ण व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह पनपने लगेगा।
लेखक संजय कुमार श्रीवास्तव आईएमएस नोएडा में कार्यरत हैं.

