अगर देश चलाने वाले लोग बेशर्मी का इस हद तक नकाब पहन लें कि आमजन की बेबसी और उनकी परेशानी नजर ही न आये तो किससे क्या शिकवा किया जाए? पिछले कुछ महीनों में एक के बाद एक भ्रष्टाचार के नये कारनामों ने साबित कर दिया कि देश एक नाजुक मोड़ से गुजर रहा है और इसके कर्ता-धर्ताओं को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ रहा कि यह रास्ता कहां खत्म होगा? जब देश के सर्वोच्च न्यायालय ने मुख्य सतर्कता आयुक्त को हटाने को लेकर टिप्पणी की तो वह टिप्पणी सिर्फ एक अधिकारी को हटाने मात्र की नहीं थी। वह टिप्पणी इस बात का प्रतीक थी कि अगर न्यायालय हस्तक्षेप नहीं करेगा तो शासनतंत्र को सिर्फ और सिर्फ भ्रष्टाचार करने और ऐसे लोगों को संरक्षण देने के अलावा कोई काम नहीं रहेगा, जो इस तरह के कारनामों को अंजाम दे सकें। हकीकत यह है कि ऐसा ही होता नजर आ रहा है।
मुख्य सतर्कता आयुक्त का पद बनाया ही इसीलिए गया है कि देशभर के सरकारी दफ्तरों में पनप रहे भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया जा सके। उन लोगों को बेनकाब किया जा सके, जो सरकारी कुर्सी पर बैठकर सिर्फ धन उगाही करते हैं। जाहिर है इस पद पर बैठे व्यक्ति की छवि साफ-सुथरी होनी चाहिए और वह व्यक्ति ऐसा भी होना चाहिए, जिसकी कथनी और करनी में कोई फर्क नजर न आये और उसका जीवन पारदर्शिता भरा रहा हो।
जब थॉमस की नियुक्ति हुई थी तभी देशभर में इस बात को लेकर विरोध हुआ था कि उनका दामन दागदार रहा है। उन पर खुद घोटालों के आरोप रहे हैं। मगर जब देश के सर्वोच्च पदों पर बैठे लोग अपने आंख और कान बंद कर लें तो न्याय की बातें किससे और कैसे की जाये। थॉमस की नियुक्ति को लेकर सरकार ने नाक का सवाल बना लिया और प्रधानमंत्री से लेकर गृह मंत्री तक ने उन्हें क्लीन चिट देने में कोई कसर बाकी नहीं रखी।
हद तो तब हो गई जब सुप्रीम कोर्ट में थॉमस ने अपनी पैरवी में बेशर्मी का परिचय देते हुए कहा कि लोकसभा में दो-तिहाई सांसद दागी हैं। जब उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती तो भला उन्हें विवादों में क्यों घेरा जा रहा है। सांसदों के दागी होने पर पूरा देश शर्मिंदा है। मगर साथ ही एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि सांसदों को लाखों लोग चुनते हैं और थॉमस जैसे भ्रष्ट अधिकारी को इस देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री ने चुना है। उनके चयन में तीन लोगों की कमेटी की तीसरी सदस्य सुषमा स्वराज ने इसका विरोध किया था।
अब जो लोग इस बात का लगातार राग अलाप रहे हैं कि हमारे प्रधानमंत्री बहुत ईमानदार हैं तो सिवाय उनकी बुद्धि पर तरस खाने के अलावा और किया भी क्या जा सकता है? यह निर्विवाद सत्य है कि ईमानदार व्यक्ति कभी बेईमानी का चुनाव नहीं करता। क्या सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद यह साबित नहीं हो गया कि देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री एक दागी व्यक्ति को मुख्य सतर्कता आयुक्त के पद पर सिर्फ इसलिए बिठाना चाहते थे कि उनकी सरकार के भ्रष्ट अधिकारियों की फाइलें हमेशा के लिए दबी रहें और भ्रष्टाचार के नये-नये आयाम स्थापित होता रहे। अगर कोई मामला उछले भी थॉमस जैसे भ्रष्ट लोग बड़ी सफाई से उसको समाप्त कर दें। अब यह देश किस तरह ऐसे प्रधानमंत्री और गृहमंत्री पर भरोसा करे।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि ऐसे संवेदनशील पदों पर आईएएस अफसर बैठें यह कोई जरूरी नहीं है। वैसे भी इस देश का जितना बेड़ा गर्क नेताओं ने किया है, उससे कम इन अफसरों ने भी नहीं किया है। इन दोनों ने मिलकर जिस तरह से इस देश को लूटा है, वो बेशर्मी की पराकाष्ठा है। दोनों ने मिलकर चोर-चोर मौसेरे भाई की तरह काम किया है। इनका भ्रष्ट गठजोड़ किसी भी कारनामें को किसी भी तरह करने के लिए तत्पर रहता है। जाहिर है भ्रष्ट अफसर भ्रष्ट नेताओं के लिए मील के पत्थर साबित होते हैं।
आखिर कोई सरकार यह क्यों नहीं सोचती कि मुख्य सतर्कता आयुक्त या मुख्य सूचना आयुक्त के पद पर अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल जैसे लोग बैठें और इनके बैठने से पद की भी गरिमा बढ़े। मगर कोई भी सरकार और कोई भी नौकरशाही ऐसा नहीं चाहेगी। अगर यह लोग पद पर बैठे तो स्वभाविक रूप से तंत्र में पारदर्शिता आयेगी और बेईमानी खत्म होगी। ऐसा कोई भी भ्रष्ट व्यक्ति नहीं चाहेगा। ऐसी सूरत में थॉमस जैसे लोग ही इन कुर्सियों पर सुशोभित होंगे और भ्रष्टाचार की गंगा बहती रहेगी।
इस देश के लोग शांत हैं, शरीफ हैं और धैर्यवान हैं। मगर धैर्य की भी एक सीमा होती है। इस देश के शासक अब इस सीमा को लांघने लगे हैं। जिस देश में 80 करोड़ लोगों को दो वक्त की रोटी नहीं मिलती हो, जहां आम आदमी को अपने परिवार के साथ इसलिए आत्महत्या करनी पड़ती हो क्योंकि वह अपने परिवार का पेट नहीं पाल सकता, वहां सरकार के कारिंदे दो हजार करोड़ का घोटाला करते हैं और शुरुआती दौर में पूरी सरकार उन्हें बचाती नजर आती है।
देश के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन सरकार और उसके इशारे पर चंद घराने करते हैं और जो उनका विरोध करता है उसे नक्सलवादी ठहरा दिया जाता है। मगर जिस देश में सारी पूंजी सिर्फ दो प्रतिशत लोगों के हाथ में हो। जहां आदमी को अपने बच्चों को सिर्फ इसलिए मरते हुए देखना पड़ता हो कि उसके पास इलाज के लिए पैसे नहीं होता। जहां बच्चे बचपन से सीधे बुढ़ापे में कदम रखते हों, ऐसे पावन देश में भ्रष्टाचार की नई-नई धाराएं बहती हैं और देश चलाने वाले कहते हैं कि वह सबसे ईमानदार प्रधानमंत्री हैं। इस ईमानदारी को कौन बिछाये और कौन ओढ़े। पता नहीं क्यों शासनतंत्र को अब भी जनता के गुस्से की आवाज सुनाई नहीं पड़ रही।
पूरी दुनिया में बदलाव का दौर शुरू हो चुका है। स्वभाविक है कि भारत भी इससे अछूता नहीं रहेगा। अगर यहां शासन कर रहे लोग इस मुगालते में हैं कि वह लगातार गरीबों का हक मारते जायेंगे और गरीब बेबसी और लाचारी के चलते खामोशी से उनके जुल्म सहन करता रहेगा, तो यह उनकी विकृत मानसिकता ही कही जायेगी। अगर व्यवस्थाए ऐसी ही चलती रही तो किसी को भी इस बात पर हैरानी नहीं होनी चाहिए कि नक्सलवाद आखिर क्यों बढ़ रहा है। यह देश सोने की चिडिय़ा कहा जाता था। हर हालत में इसे फिर सोने की चिडिय़ा बनाना ही होगा। मगर इन बेशर्म नेताओं के भरोसे रहना बेकार है। हम सबको अपने स्तर से ही परिवर्तन की शुरुआत करनी होगी। आज से… अभी से…।
लेखक संजय शर्मा वीकेंड टाइम्स के संपादक हैं. आप इस लेख पर अपनी राय 9452095094 पर एसएमएस कर सकते हैं.

