दिनांक 10 नवम्बर 2009, यह वह दिन था जब रेलवे में पहली बार करप्शन की बात वहॉं के कर्मचारियों ने जबर्दस्त ढंग से उठायी। उस दिन पता चला कि किस तरह माफिया, अधिकारी और नेताओं की सांठ-गांठ रेलवे को एक अभेद किला बना दिया है। आश्चर्य की बात है कि फोर्स तक के घोटालों की बात तो बाहर आ जाती है किन्तु रेलवे के किसी भी घोटाले की बात न आज तक पेपर में आयी है और ना ही इलेक्ट्रानिक मीडिया में। आन्दोलन के एक ही दिन बाद सारी यूनियनों ने हाथ खड़ा कर दिया। यहॉं तक कि बनारस के सांसद मुरली मनोहर जोशी भी एक दिन बाद आंदोलनरत कर्मचारियों को उल्टा डांटना और धमकाना शुरू कर दिया। ऑल इण्डिया रेलवे मेन्स फेडरेशन (रेलवे बोर्ड द्वारा मान्यता प्राप्त संगठन) के महामंत्री शिवगोपाल मिश्रा ने आंदोलन में शामिल अपने ही यूनियन के कर्मचारी नेता को यूनियन से निकाल दिया तथा ऐलान कराया कि इस आंदोलन में किसी भी प्रकार से यूनियन शामिल नहीं है।
अमर उजाला के अलावा सभी प्रिंट या फिर इलेक्ट्रानिक मीडिया ने कर्मचारियों की मदद करने से साफ मना कर दिया। अति सम्मानित प्रिंट मीडिया के पत्रकारों ने आंदोलन कर रहे कर्मचारियों का फोटो कवरेज के नाम पर खींच कर अधिकारियों को उपलब्ध कराया और आज उन्हीं फोटोग्राफ्स के आधार पर दस कर्मचारियों के खिलाफ डीरेका के अधिकारियों ने दण्डात्मक कार्रवाई शुरू कर दी है। आन्दोलन के तीसरे दिन सारी यूनियनें तथा कर्मचारी परिषद आन्दोलन में शामिल हुआ और बोला कि आन्दोलन बिल्कुल सही है और हमलोग साथ हैं। इसके बाद कर्मचारियों एवं अधिकारियों में समझौता हुआ, जिसमें पहली ही शर्त थी कि सभी पांच सौ कर्मचारियों को, जो तीन दिन तक नो वर्क नो पे की कार्यवाही हुई थी, वापस लिया जायेगा। जिन107 कर्मचारियों के विरूद्ध एफआईआर दर्ज था, उसे तत्काल वापस लिया जायेगा तथा किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी, किन्तु अगले दिन अखबारों में खबर छपी कि इन पर जो समझौते हुए थे उन पर प्रशासन विचार कर रहा है। जब कर्मचारी यूनियन के नेता तथा कर्मचारी परिषद से मिले तो उन्होंने कहा कि गलती से छप गया है, सारी कार्यवाही वापस हो चुकी है। करीब पन्द्रह दिन बाद पता चला कि कोई कार्यवाही वापस नहीं हुई है, बल्कि सारे नेता प्रशासन से मिल कर दलाली कर गये। इसमें से तीन के विरूद्ध मेजर पेनाल्टी की कार्रवाई हो चुकी है तथा सात लोगों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के साथ कोर्ट में मामला चल रहा है।
जिन मुद्दों पर कर्मचारी जुटे थे वे इस प्रकार थे – आउटसोर्सिंग के द्वारा सस्ते आइटमों को मंहगें दामों पर मंगाया जाता है। कुछ दिन में अधिकारियों के मुंह में जैसे खून लग गया हो, वो पूरे कारखाने को ही आउटसोर्स करने के फिराक में लग गये। जो आइटम यहॉं बनता था उसे भी बाहर से आउटसोर्स किया जाने लगा, जिससे काफी कर्मचारी खाली बैठने को मजबूर हो गये, इससे रेलवे पर बिना काम कराये तनख्वाह देने का बोझ बढ़ गया। कई मशीने मंहगें दामों पर डीरेका में मंगायी गयी, किन्तु बिना उनसे कोई आउटपुट लिए उन्हें स्क्रैप में कौडियों के दाम बेच दिया गया। कर्मचारी बिना वेतन को बढ़ाए काम बढ़ाने की मांग कर रहे थे। कर्मचारियों की यह भी मांग थी कि डीरेका में जितने भी भ्रष्ट अधिकारी हैं, उनके खिलाफ जांच हो तथा उनका स्थानानंतरण अन्यत्र कर दिया जाये। सीएमई संजय कटियार, जो कि डीरेका में भ्रष्टाचार की जड़ हैं, के खिलाफ, भ्रष्टाचार के कई शिकायतों पर जांच नहीं की गयी थी, जिनकी संख्या सैकडों में है। इतने बडे़ आन्दोलन के बावजूद किसी भी अधिकारी के खिलाफ कोई भी जांच तक नहीं की गयी एवं उल्टे कर्मचारियों को दंडित एवं प्रताडि़त किया जा रहा है।
लेखक रमेश कुमार वाराणसी के निवासी हैं.

