हिंदुस्तानी समझते थे कि उन्हें अंग्रेजों ने गुलाम बना रखा है और इसी भ्रम में दो सौ साल तक गुलाम बने रहे, लेकिन पढऩे-लिखने के बाद महात्मा गांधी को यह ज्ञान पैदा हुआ कि उन्हें गुलाम बना नहीं रखा है, बल्कि गुलाम बने हुए हैं। यही बात उन्होंने सब को समझायी और सबकी समझ में जैसे ही आ गयी, वैसे ही अंग्रेजों के पैर उखड़ गये। आशय यही है कि गुलामी और आजादी के बीच सिर्फ सोच का अंतर था, तभी लोकपाल विधेयक को लेकर हुए अनशन पर इस लिए हंसी आ रही है, क्यों कि यह सब चुटकुला जैसा ही प्रतीत हो रहा है। लोकपाल विधेयक के मुद्दे पर अचानक होने वाले इस बवाल को लेकर कई सवाल ऐसे खड़े हैं, जो स्थिति को स्वत: ही हास्यासपद बना रहे हैं।
सबसे पहला सवाल तो यही है कि अन्ना हजारे और उनके समर्थक अचानक कहां से प्रकट हो गये, क्यों कि भ्रष्टाचार अचानक वर्तमान में ही पैदा थोड़े ही हुआ है। यह निरंतर प्रक्रिया में चल कर यहां तक पहुंचा है और जब प्रक्रिया शुरू हो रही थी या चरम पर थी, तब वह मुखर क्यों थे? खैर, इस सवाल पर कहा जा सकता है कि जब जागो, तब ही सवेरा, लेकिन सवाल यह भी है कि यह क्या गारंटी है कि लोकपाल का महत्वपूर्ण दायित्व निभाने वाला शख्स ईमानदारी का पुतला ही होगा, क्यों कि वह व्यक्ति भी एक अरब इक्कीस करोड़ लोगों के बीच से ही चुना जायेगा और जब एक अरब इक्कीस करोड़ लोगों के बीच से ईमानदार प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, मंत्री, अधिकारी, कर्मचारी, जज, वकील, पत्रकार और लेखक नहीं निकल सकते, तो लोकपाल ही क्यूं निकल आयेगा।
और जब एक लोकपाल ईमानदार हो सकता है, तो फिर देश को चलाने वाले ईमानदार क्यूं नहीं हो सकते और जब देश को चलाने वाले ईमानदार हो सकते हैं, तो फिर लोकपाल की जरूरत ही क्या है, क्यों कि बेईमान लोकपाल के होने का मतलब है कि एक और भ्रष्टाचारी को जन्म दे देना और जब लोकपाल भी बेईमान हो सकता है, तो फिर बाद में एक और महापाल बनाने के लिए संघर्ष करना पड़ेगा और फिर उसके ऊपर भी एक और कोई … बस, यही सिलसिला चलता रहेगा, पर बदलेगा कुछ नहीं, क्यों कि भ्रष्टाचार किसी एक व्यक्ति का नाम नहीं है। भ्रष्टाचार मानसिक विकृति है, जो सिस्टम के साथ समाज में घर कर चुकी है, जिसे निकालने के लिए वातावरण तैयार करना होगा।
शिक्षा से लेकर टीवी व अखबार वैसे ही बनाने होंगे, तभी देशहित की भावना जागृत हो सकती है और ऐसी भावना जागृत हो गयी, तो सकारात्मक परिणाम दिखाई देने लगेंगे और अगर ऐसा नहीं हुआ, तो फिर इस अनशन से भी कुछ नहीं बदलने वाला, क्यों कि आज अन्ना हजारे हैं और कल अन्ना हजारे जाकर सो जायेंगे, तो फिर यह जनता किसके साथ होगी? इसी लिए समाज में यह सोच पैदा करने की जरूरत है कि उन्हें किसी नेता की जरूरत नहीं है, वह स्वयं नेता हैं और स्वयं ही बिगुल फूंक सकते हैं, नेतृत्व करने की यह सोच पैदा होते ही देश से भ्रष्टाचार स्वत: ही भाग जायेगा, वरना मुद्दों को लेकर अचानक माहौल गरमा देने वाले नेता आते रहे हैं और आते रहेंगे, उसी तरह मुखर होते रहे हैं और मुखर होते भी रहेंगे, लेकिन जनता उठ खड़ी हुई, तो वह कभी मुखर नहीं होगी।
भ्रष्टाचार के मुद्दे पर किसी एक व्यक्ति, दल या प्रणाली को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। यह सब बदली सोच का दुष्परिणाम है और सोच का कोई दायरा नहीं होता, वह हर जगह नजर आ रही है, हर रंग में नजर आ रही है, हर धर्म, हर जाति और हर वर्ग में नजर आ रही है, इसलिए एक-दूसरे पर या किसी पर भी आरोप मढऩे से भी बाज आना चाहिए और संकल्प लेना चाहिए कि आज से व्यक्तिगत ही नहीं, बल्कि देश व समाज हित के मुद्दों पर भी कर्तव्य परायण बनेंगे। निर्धारित समय से पूर्व या बाद में पहुंचने पर अधिकारी-कर्मचारी पर किसी तरह का दबाव नहीं डालेंगे और अगले दिन आकर नियमानुसार कार्य करायेंगे और अगर दबाव बनायेंगे, तो वह रिश्वत लेना भी अपना अधिकार समझेगा और आपको भी अपनी सुविधानुसार कुछ रुपये देते बुरे नजर नहीं आयेंगे। इसी तरह प्रधान से लेकर सांसद तक से खुलेआम सवाल करिये कि उसने निधि का क्या किया?
अधिकारी-कर्मचारी से नि:संकोच सवाल-जवाब करिये और यह तब ही कर सकते हैं, जब आप स्वयं ईमानादार होंगे। बस, भष्टाचार को खत्म करने के लिए इतना भर करने की जरूरत है, वरना ऐसे आंदोलन भी स्वार्थ सिद्धी का जरिया बन कर जायेंगे और कुछ बचे ईमानदार भी थकहार बैठ जायेंगे, तब सुधार की गुंजाइश भी नहीं बचेगी, जिसका खामियाजा आने वाली पीढिय़ों को भुगतना पड़ेगा, जो आक्रोश में कुछ भी करने को उतावली हो उठेगी। याद रखने की बात यह भी है कि सुधार न होने पर जब भी भ्रष्टाचार की चर्चा होगी, तो इतिहास में हर उस आदमी का लिखा नजर आयेगा, जो स्वयं के प्रति ईमानदार नहीं है, इस लिए जरूरत सबसे पहले स्वयं के प्रति ईमानदार होने की है, क्यों कि खुद भला, तो जग भला। सामने वाले को सुधारने की मानसिकता से सबको बाहर आना ही होगा।
लेखक बीपी गौतम मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं.

