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मजदूरी की कीमत पर बिखरता बचपन

खेलने-कूदने के दिनों में कोई बच्चा अगर मजदूरी करने को मजबूर हो जाए तो.. और हमारे सामने तो बाल मजदूरी की मजबूरी गांवों से लेकर शहरों और महानगरों में एक मकड़जाल के जैसी फैल रही है. जबकि बाल मजदूरी से परिवारों को आमदनी के स्रोतों का केवल एक रेशा ही मिलता है जिसके लिए गरीब अपने बच्‍चों के भविष्‍य को इस गर्त में झोंक देते है. इसलिए ‘क्राई’ बाल मजदूरी से निपटने के लिए उसकी जड़ों में जाने और बच्‍चों में स्‍वास्‍थ्‍य, सुरक्षा, शिक्षा, पोषण प्रदान करने को लेकर बीते 30 सालों से कोशिशें करता रहा है. जैसा कि आप सब जानते हैं कि बाल मजदूरी मानवाधिकारों का घनघोर हनन है और मानवाधिकारों के तहत शारीरिक, मानसिक से लेकर सामाजिक विकास तक का अवसर पाने का अधिकार हर बच्चे को दिया गया है. मगर यह जानकर और अचरज होता है कि खनन उद्योग, निर्माण उद्योगों के साथ-साथ्‍ा कृषि क्षेत्र भी ऐसा क्षेत्र है, जहां बड़ी संख्या में बच्‍चे मजदूरी करते हुए देखे जाते हैं. इन बच्‍चों को पगार के रूप में मेहनताना भी आधा या उससे भी कम दिया जाता है. ऐसा नहीं है कि बाल मजदूरी के निराकरण के लिए सरकारें चिन्तित न हों, मगर यह चिन्‍ता समाधान में कितनी सहयोगी साबित हुई है, यह मूल्‍याकंन का सवाल बना हुआ है.

खेलने-कूदने के दिनों में कोई बच्चा अगर मजदूरी करने को मजबूर हो जाए तो.. और हमारे सामने तो बाल मजदूरी की मजबूरी गांवों से लेकर शहरों और महानगरों में एक मकड़जाल के जैसी फैल रही है. जबकि बाल मजदूरी से परिवारों को आमदनी के स्रोतों का केवल एक रेशा ही मिलता है जिसके लिए गरीब अपने बच्‍चों के भविष्‍य को इस गर्त में झोंक देते है. इसलिए ‘क्राई’ बाल मजदूरी से निपटने के लिए उसकी जड़ों में जाने और बच्‍चों में स्‍वास्‍थ्‍य, सुरक्षा, शिक्षा, पोषण प्रदान करने को लेकर बीते 30 सालों से कोशिशें करता रहा है. जैसा कि आप सब जानते हैं कि बाल मजदूरी मानवाधिकारों का घनघोर हनन है और मानवाधिकारों के तहत शारीरिक, मानसिक से लेकर सामाजिक विकास तक का अवसर पाने का अधिकार हर बच्चे को दिया गया है. मगर यह जानकर और अचरज होता है कि खनन उद्योग, निर्माण उद्योगों के साथ-साथ्‍ा कृषि क्षेत्र भी ऐसा क्षेत्र है, जहां बड़ी संख्या में बच्‍चे मजदूरी करते हुए देखे जाते हैं. इन बच्‍चों को पगार के रूप में मेहनताना भी आधा या उससे भी कम दिया जाता है. ऐसा नहीं है कि बाल मजदूरी के निराकरण के लिए सरकारें चिन्तित न हों, मगर यह चिन्‍ता समाधान में कितनी सहयोगी साबित हुई है, यह मूल्‍याकंन का सवाल बना हुआ है.

इस समय उत्‍तर प्रदेश में 2001 की जनगणना के आधार पर 1927997 बाल मजदूरों की पहचान हुई है. इसके एबज में सरकार ने 10वीं पंचवर्षीय योजना में 602 करोड़ रूपया आवंटित किया है. जबकि पंचवर्षीय नवीं योजना में 178 करोड़ रूपये खर्च किया गया था. सरकार ने बाल मजदूरी कानून-1986 के अन्‍तर्गत ऐसे क्षेत्रों को चुना है जहां ज्यादा संख्‍या में बाल मजदूर रह रहें हों और जो हानिकारक उद्योगों में काम कर रहें हों. सरकार ने लगभग देश के 250 जिलों में राष्‍ट्रीय बाल मजदूरी परियोजना द्वारा और 21 जिलों में इण्‍डस प्रोजेक्‍ट द्वारा जिलाधिकारियों को आदेश दे रखें है कि वे बाल मजदूरी को दूर करने के लिए हरसम्‍भव प्रयास करें. इसके लिए विशेष स्‍कूल संचालित किये जाएं, बाल श्रमिकों के परिवारों के लिए आर्थिक सहायता उपलब्‍ध करायी जाए और 18 साल के पहले किसी भी दशा में उनसे मजदूरी न करायी जाए. इस सम्‍बन्‍ध में 1996 में सुप्रीम कोर्ट ने भी श्रम विभाग को यह आदेश दिया है कि बच्चों को सामान्‍य कार्यो में 6 घण्‍टे से अधिक न लगाया जाए. उन्‍हें निर्धारित अवकाश के साथ्‍ा कम से कम दो घण्‍टे जरूर पढ़ाया जाए. अगर नियोजक ऐसे आदेशों की लापरवाही करें तो उस पर कम से कम 20000 रूपये का जुर्माना लगाया जाए. इस जुर्माने को बच्‍चे के भविष्‍य के लिए उपयोग में लाया जाए.

अब आप जरा देखिये कि सरकार, सुप्रीम कोर्ट, जागरूक जनता के प्रयासों के बावजूद पूरे देश में 58962 नियोजकों के विरूद्ध बालश्रम कराने के लिए मुकदमे दायर किये गये हैं और उत्‍तर प्रदेश में ऐसे अभियोग 6885 हैं. अगर यह सोचा जाए कि सब कुछ कानूनों और सजा से सुधर जाएगा तो यह मुमकिन नहीं है. कानूनों और सजा के प्रावधानों के बावजूद हमें घरों में, ढ़ाबों में, होटलों में असंख्य बाल मजदूर मिल जाते हैं, जो कड़ाके की ठण्‍ड या तपती धूप की परवाह किये बगैर काम करते हैं. मजदूर कार्यालय या रेलवे स्‍टेशन के बाहर चाय पहुंचाने का काम यह छोटे-छोटे हाथ ही करते हैं और मालिक की गालियां भी खाते हैं. सभ्‍य कहे जाने वाले समाज में यह अभिशाप बरकरार है और जिसे हम नजरअंदाज बनाए हुए हैं. दरअसल तथाकथित अच्‍छे परिवारों में नौकरों के रूप में छोटे बच्‍चों को पसन्‍द किया जाता है और आर्थिक रूप से सशक्‍त होते परिवारों को अपने बच्चे, खिलाने और घर के कामकाज के लिए गरीबों के बच्चे ही पसन्‍द आते हैं.

इन छोटे मजदूरों के छोटे-छोटे कंधों पर बिखरे हुए परिवारों के बड़े बोझ हैं. असल में ऐसे कई समुदाय हैं जिन्होंने अपने आजीविका के साधन खोए हैं, जैसे कि जंगलों पर निर्भर रहने वाले आदिवासी, भूमिहीन, छोटे किसान वगैरह. जबकि देश में गरीबी का आंकलन वास्तविकता से बहुत कम किया गया है. देशभर में काम करने के दौरान हमने पाया है कि बच्चों के लिए पोषित भोजन का संकट बढ़ रहा है, उनके लिए स्कूल और आवास की स्थितियां भी बिगड़ रही हैं. फिर भी तकनीकी तौर पर बहुत सारे बच्चे ऐसे हैं जो वंचित होते हुए भी गरीबी रेखा के ऊपर हैं. जब हम गरीबी को ही वास्तविकता से कम आंक रहे हैं, तो सरकारी योजनाओं और बजट में खामियां तो होगी ही. ऐसे में हालात पहले से ज्यादा मुश्किल होते जा रहे हैं. ऐसे लोगों के लिए लोक कल्याण की योजनाएं जीने का आधार देती हैं. हम इस बात पर ध्यान खींचना चाहते हैं कि बच्चों की गरीबी सिर्फ उनका आज ही खराब नहीं करता, बल्कि ऐसे बच्चे बड़े होकर भी हाशिये पर ही रह जाते हैं. सरकार को चाहिए कि वह देश में बच्चों की संख्या के हिसाब से, सार्वजनिक सेवाओं जैसे प्राथमिक उपचार केन्द्र, आंगनबाड़ी, स्कूल, राशन की दुकानों के लिए और अधिक पैसा खर्च करे.

लेखक शिरीष खरे सामाजिक सरोकारों से जुड़े हुए पत्रकार हैं। पत्रकारिता की डिग्री लेने के बाद चार साल तक डाक्यूमेंट्री फिल्म संगठन में शोध और लेखन का कार्य किया। उसके बाद दो साल तक ‘नर्मदा बचाओ आन्दोलन’ से जुड़े रहे। इन दिनों ‘चाइल्ड राईट्स एंड यू, मुंबई’ के ‘संचार विभाग’ से जुड़े हुए हैं।

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