: अपनी आंखों का इलाज क्यों नहीं करवाते कांग्रेसी युवराज : मनमोहन जी और कितने घोटालों की जरुरत है हटने के लिये, आप तो पितामह हो गये हैं घोटालों के। एस बैंड एक और नया घोटाला। आपको देश के लोग नहीं चाहते, उम्र भी संन्यास लेने की हो चुकी है। देश के लोगों से अर्थ है पूरा देश, सिर्फ़ शीला दीक्षित की दिल्ली नहीं। यह दिल्ली तो एक छलावा है, आप पूरी दुनिया को यह दिल्ली दिखाकर धोखा दे रहे हैं। बडी-बडी इमारते, सुंदर फ़्लाई ओवर, एयर कंडीशन मेट्रो, अंतराष्ट्रीय हवाई अड्डा। जहां ऑटो रिक्शा से नहीं जा सकते अपने बाप की कार हो तो कोई बात नहीं या फ़िर एसी बस जिसका किराया 75-100 रुपया है। ऑटो से जाओगे तो बीच रास्ते में जीएमआर की बस पर चढना होगा, ठीक है कि कोई किराया नहीं देना पडे़गा लेकिन किसी को देना पडे़गा न चाहे वह एयरलाइंस ही क्यों न हो। यह सारी कवायद किस लिये? डोमेस्टिक टर्मिनल तक तो ऑटो रिक्शा जाता है, फ़िर अन्तर्राष्ट्रीय टर्मिनल तक क्यों नही? क्या ऑटो पर चढ़कर आनेवालों की औकात बताने के लिये या फ़िर विदेश से आनेवालों को धोखा देने के लिये?
रवीश आजकल एनडीटीवी पर देहाती दिल्ली की सडकों का हाल दिखा रहे हैं, बेहाल सडकें, आधारभूत सुविधाओं से महरूम जनता। हालांकि रवीश को भी नीतीश पसंद आ रहे हैं, बिहार से दिल्ली की सड़कों की तुलना करते हुये बिहार की सड़कों को बेहतरीन बता रहे हैं। शायद बिहार के ग्रामीण इलाके रवीश की नजरों से दूर हो गये हैं। आपकी दिल्ली बहुत खराब है, बलात्कार और भ्रष्टाचार तो अब रोजमर्रा की बात है, हमारा बिहार ठीक है, न सिफ अभी, पहले भी, लालू के समय में भी ठीक था। कम से कम धोखेबाज तो वहां कभी नहीं रहे। दिल्ली ने तो बिहारियों को भी धोखेबाज, काइयां, मक्कार और बलात्कारी बना दिया। दिल्ली देखकर तो लगता हीं नहीं यह उस मुल्क की राजधानी है जहां करोड़ों लोग पीढि़यों से झोपड़ी में निवास करते आ रहे हैं। जहां शाम छह बजने का अर्थ है दिन का समाप्त हो जाना। जहां एक छोटी सी बीमारी जिसका इलाज दो से चार हजार में हो सकता है, उसका इलाज कराये बिना लोग मर जाते हैं। बच्चे पढ़ते है सरकारी स्कूलों में ताकि दिल्ली के सेठों को एक पढ़ने वाला नौकर सस्ते में मिल सके। कहीं कोई कानून नहीं, श्रम का सबसे ज्यादा शोषण करनेवाला शहर है आपकी दिल्ली। शोषण ने बच्चों को भ्रष्ट बना दिया है।
यह कैसी दिल्ली है, किस देश की राजधानी है, मूल्यों का इतना पतन! आपका श्रम विभाग कहां रहता है किसी को नहीं पता। 60 रूपये प्रतिदिन पर होटल में काम करते हैं, अधिकांश बिहारी हैं। 60 रुपया खाने में खर्च हो जाता है। अब या तो ठहरनेवाले यात्रियों से मिले टिप या सामान लाने के नाम पर मिले पैसे से गुजारा होता है उनका। आप तो समझ ही रहे होंगे न्यूनतम मजदूरी भी उनको नहीं मिलती। यात्रियों से ठगी भी करने लगे हैं। आठ घंटे की जगह 15-18 घंटे काम। जब आप अपने नाम के नीचे फ़ैले अत्याचार, शोषण और भ्रष्टाचार को नहीं रोक सकते तो क्या खाक दूर करेंगे बिहार से यह सब। दिल्ली देखकर लगता है हिंदुस्तान सिर्फ़ दिल्ली है, बाकी सभी राज्य दिल्ली की सरकार की जमींदारी है, जहां से लगान वसूलकर दिल्लीवालों का पेट भरा जाता है। आपके युवराज पूरे देश में घूम-घूमकर गरीबों से मिलते हैं, अन्याय और शोषण के खिलाफ़ बोलते हैं, उनको भी शायद दिल्ली के ओवरब्रिज और मेट्रो तथा हवाई अड्डा से दूर और कुछ नहीं दिखता। आंखों का इलाज क्यों नहीं करवाते युवराज।
दिल्ली का ताजिया : परसो बस से पहाडगंज आ रहा था अपने होटल। पुलिस ने रास्ता रोक दिया बस का, कारण था ताजिया का जुलूस। ऑटो से स्टेशन आया फ़िर पैदल पहाडगंज होटल की तरफ़ चल पड़ा। इसी दरम्यान नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के पहाडगंज वाले साइड से ताजिया का जुलूस गुजर रहा था। वह पुराने वाले ओवरब्रिज जिसके उपर से होकर अजमेरी गेट की तरफ़ गाडि़यां जाती हैं, उसके नीचे से जुलूस गुजर रहा था, मैं भी रूक गया, वहीं ओवरब्रिज के नीचे ताजिया का जुलूस देखने के लिये। पहली बार किसी धार्मिक जुलूस में इतना रोमांटिक दृश्य देखा। महिलाओं से लदी हुई गाडि़यां और पैदल हाथ में हाथ डालकर चलते मुस्लिम युवा-युवतियां, हालांकि महिलायें पूरी तरह बुर्के में थीं लेकिन चेहरा नहीं ढंका था। खुबसूरत चेहरे जैसे काले आसमान के बीच चांद। अपने दोस्त या पति, जो भी हो उसका हाथ पकड़कर जुलूस में जा रही महिलाओं और युवतियों ने तो एक नया अर्थ दे दिया ताजिया को, बल्कि यह कहें कि तजिया के जुलूस में रोमांस का रंग भर दिया। शायद दिल्ली का असर मुस्लिम समाज पर भी पड़ा है। आने वाले समय में कठमुल्लों के हाथ से आजाद हो जायेगा मुस्लिम सामाज। मैं तो भाई उन मस्त जोड़ों को निहारता रहा तब तक, जब तक जुलूस नहीं गुजर गया। फ़िर एक सिगरेट सुलगाया और और सोचा यार मदन तू क्यों नहीं एक बार अपनी बीबी के हाथ में हाथ डालकर इसी तरह घूमता है दिल्ली में, अभी तू बुड्ढा तो हुआ नहीं है। खैर बेटे घुमूंगा कभी लेकिन बस पर नहीं चढूंगा कहीं मैं चढ़ गया और वह छूट गई तो क्या होगा?
लेखक मदन कुमार तिवारी बिहार के गया जिले के निवासी हैं. पेशे से अधिवक्ता हैं. 1997 से वे वकालत कर रहे हैं. अखबारों में लिखते रहते हैं. ब्लागिंग का शौक है. अपने आसपास के परिवेश पर संवेदनशील और सतर्क निगाह रखने वाले मदन अक्सर मीडिया और समाज से जुड़े घटनाओं-विषयों पर बेबाक टिप्पणी करते रहते हैं.

