काश!
एक कोरा कैनवास ही रहता
मन… ।
न होती कामनाओं की पौध
न होते रिश्तों के फूल
सिर्फ सफेद कोरा कैनवास होता
मन… ।
न होती भावनाओं के वेग में
ले जाती उन्मुक्त हवा
न होती अनुभूतियों की
गहराईयों में ले जाती निशा।
सोचता हूं,
अगर वाकई ऐसा होता मन
तो मन मन नहीं होता
तन तन नहीं होता
जीवन जीवन नहीं होता… ।
तो सिर्फ पौधा एक पौधा होता
फूल सिर्फ एक फूल होता
फूल पौधों का उपवन नहीं होता… ।
हवा सिर्फ हवा होती
निशा सिर्फ निशा होती
कोई खूशबू नहीं होती
कोई उषा नहीं होती… ।
जीवन की संजीवनी है भाव
रिश्तों का प्राण है प्यार
मन और तन दोनों का
यही तो है
शाश्वत श्रृंगार
एक मात्र मूल आधार… ।
लेखक अंकुर विजयवर्गीय हिन्दुस्तान टाइम्स, दिल्ली में वरिष्ठ कॉपी एडिटर हैं.

