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मरती मानवीय संवेदनाएं और भ्रष्‍टाचार का दंश

रिजवान: अब विरोध नहीं किया तो बहुत देर हो जायेगी : आर्थिक तंगी के चलते अपने मासूम बच्चों को दूध के स्थान पर जहर देने वाली मजबूर मां ने भी जिंदगी से जूझते हुए दम तोड़ दिया। यह एक अकेली घटना नहीं बल्कि प्रदेश व देश के हर कोने में इस तरह की घटनायें आम हो चली हैं, बावजूद इसके सत्तासीन लोगों की आंखें बंद हैं। शायद ही कोई दिन ऐसा गुजरता हो जिस दिन गरीबी के कारण कोई न मरता हो। कहीं बेटियों की शादी का दहेज न जुटा पाने के कारण पिता पुत्रियों को मौत की नींद सुला कर खुद मौत को गले लगा रहा है, तो कहीं भूख से त्रस्त मां अपने लाडलों को दूध की जगह जहर पिला कर खुद जहर पी रही है, कहीं गरीबी की तृष्णा युगल दम्पत्ति को नदी में छलांग लगवा रही है, तो कहीं पढ़ा-लिखा नौजवान ट्रेन के आगे कूदकर आत्महत्या कर रहा है। ये सब कुछ आये दिन हो रहा है, लेकिन मानवीय संवेदनायें शून्य हैं, न तो राजनेताओं का इस ओर ध्यानाकर्षण हो रहा है और न ही समाजसेवी संस्थायें ही इस विकराल एवं हृदय विदारक घटनाओं के प्रति आगे आ रही है। स्वार्थ परता की राजनीति करने वाले खद्दरधारी नेता आये दिन धरना-प्रदर्शन और रैली आदि करने में मशगूल हैं, लेकिन यह अहम मुद्दा उनका विषय नही है विषय तो मात्र हाईलाइट होने वाला है।

रिजवान

रिजवान: अब विरोध नहीं किया तो बहुत देर हो जायेगी : आर्थिक तंगी के चलते अपने मासूम बच्चों को दूध के स्थान पर जहर देने वाली मजबूर मां ने भी जिंदगी से जूझते हुए दम तोड़ दिया। यह एक अकेली घटना नहीं बल्कि प्रदेश व देश के हर कोने में इस तरह की घटनायें आम हो चली हैं, बावजूद इसके सत्तासीन लोगों की आंखें बंद हैं। शायद ही कोई दिन ऐसा गुजरता हो जिस दिन गरीबी के कारण कोई न मरता हो। कहीं बेटियों की शादी का दहेज न जुटा पाने के कारण पिता पुत्रियों को मौत की नींद सुला कर खुद मौत को गले लगा रहा है, तो कहीं भूख से त्रस्त मां अपने लाडलों को दूध की जगह जहर पिला कर खुद जहर पी रही है, कहीं गरीबी की तृष्णा युगल दम्पत्ति को नदी में छलांग लगवा रही है, तो कहीं पढ़ा-लिखा नौजवान ट्रेन के आगे कूदकर आत्महत्या कर रहा है। ये सब कुछ आये दिन हो रहा है, लेकिन मानवीय संवेदनायें शून्य हैं, न तो राजनेताओं का इस ओर ध्यानाकर्षण हो रहा है और न ही समाजसेवी संस्थायें ही इस विकराल एवं हृदय विदारक घटनाओं के प्रति आगे आ रही है। स्वार्थ परता की राजनीति करने वाले खद्दरधारी नेता आये दिन धरना-प्रदर्शन और रैली आदि करने में मशगूल हैं, लेकिन यह अहम मुद्दा उनका विषय नही है विषय तो मात्र हाईलाइट होने वाला है।

एक दो नहीं बल्कि दर्जनों ऐसी दर्दनाक घटनायें अकेले उत्तर प्रदेश में ही घटित हो चुकी है जिसे सुनकर हृदय सिहर उठता है। हाल ही में राजधानी कई ऐसी घटनायें घटित हुईं।  पिछले दिनों एक माँ ने अपने तीन पुत्रों को आर्थिक तंगी के चलते जहर दे दिया अपने आंखों के सामने पुत्रों को तड़प कर मरते हुए देखा अंत में उसने भी दम तोड़ दिया। जिस समय वह अपने बच्चे को जहर दे रही थी तो दूध बताकर दे रही थी। बच्चा कह रहा था मैं दूध नहीं पीऊंगा बदबू आ रही है, मां उल्टी हो जाएगी। मां ने कहा- आंख मूंदकर पी लो बेटा देर हो रही है, कल बढ़िया दूध पिलाऊंगी। यह कहकर उसने बारी-बारी से अपने तीनों पुत्रों को दूध के नाम पर जहर पिला दिया। फिर स्वयं भी विष पीकर सोने का प्रयास करने लगी। वह सो तो नहीं सकी किन्तु अपने ही तीनों जिगर के टुकड़ों को तड़प-तड़प कर मरते देखा, वह बेबस थी। चाहते हुए भी उन्हें बचा न सकी। अपने जिगर के टुकड़ों की रक्षा करने के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाली मां की ममता भी ठगी सी सारा मंजर देखती रही।

बताया जाता है कि दवा के लिए रुपए मांगने पर जब उसके पति ने अपनी असमर्थता व्यक्त की तो वह आपा खो बैठी। उसने अपने बच्चों समेत इस दुख भरी दुनिया को अलविदा करने की ठान ली। पति दिनेश ने इस घटना को पति-पत्नी के बीच हुआ मामूली विवाद समझा और जो हुआ सब कुछ भूलकर कमरे के बाहर सो गया। क्रोध का जुनून इस कदर चढ़ा कि मां की ममता जाती रही। उसने बढ़ते बच्चों की आवश्यकताओं, खाने की मुश्किलों, पति की गरीबी से एक साथ निजात पाने का मन बना लिया।  इस तरह की घटनायें केवल उत्‍तर प्रदेश में ही नहीं बल्कि देश के कई कोने में आम हो चली हैं। बावजूद इसके सत्तासीन लोगों की आंखें बंद हैं।

आज भारत की क्या स्थिति है यह किसी से अब छिपा नही है? एक तरफ बढ़ती अमीरी की चमक से कुछ लोगों की आंखें चकाचौंध हो रही हैं तो दूसरी तरफ करोड़ों-करोड़ भरतीयों की आंखों का अपनी गरीबी व मजबूरी पर आंसुओं में डबडबा जाना रोजाना की कहानी है। हकीकत तो ज्यादा बदतर है मगर यदि हम सरकारी आंकड़ों की ही माने तो देश में 37.2 प्रतिशत यानी 40 करोड़ लोगों को दो वक्त का भोजन भी मयस्सर नहीं है। सरकार द्वारा गठित अर्जुन सेन गुप्त कमेटी की रिपोर्ट हमें बताती है कि देश में 77 प्रतिशत लोगों की प्रतिदिन आमदनी 20 रू. से भी कम है। कालाबाजारियों के राज में आसमान छूती महंगाई में 20 रू. में करोड़ों लोग कैसे जिंदगी गुजर कर रहें हैं, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। ऐसे हालात में जी रहे लोग अपने बच्चों को कैसे शिक्षा दे पायेंगे? कैसे उनके स्वास्थ्य की देख-रेख करेगें? उनके भविष्य को कैसे बेहतर बना पायेंगे? यह आप खुद सोच सकते हैं। जिन बच्चों को ये किसान-मजदूर अपने स्वयं नंगे व भूखे रहकर किसी तरह इंटरमीडिएट, स्नातक, परास्नातक की शिक्षा दिला भी देते हैं, फिर भी उनका क्या हश्र है? इन डिग्रीधारी करोड़ों युवक-युवतियों की आधी उम्र रोजगार की तलाश में कार्यालयों के चक्कर लगाने में गुजर जा रही है। नौकरी न मिलने पर थके-हारे कुछ युवा स्वरोजगार की योजनाएं बनाते हैं, जिसके लिए लोन हेतु बैंकों का चक्कर लगाते-2 आधी ऊर्जा खर्च हो जाती है।

क्या किसी ने सोचा था? ऐसा दौर भी आयेगा कि ‘‘सोने की चिड़िया’’ कहे जाने वाले देश में भ्रष्टाचार का बोलबाला इस हद तक होगा कि गरीबी मिटाने का राग अलापने वाले ही गरीबों का हक लील जायेंगे और गरीब भूखों मरेंगे, अन्नदाता कृषक फटेहाल जीवन यापन को विवश हो आत्मदाह व आत्महत्या को विवश होंगे। मां-बहनों की आबरू गुण्डे माफिया घरों में घुसकर तार-तार करेंगे, घोटालों पर घोटाला करने वालों की पौ बारह होगी।  मंहगाई सुरसा की भंति ऐसा मुंह फैलायेगी कि देश का आम नागरिक त्राहि-त्राहि करेगा और लोग भूखों मरने को विवश होंगे। उपरोक्त ऐसे तमाम सवाल केवल मेरे मन मस्तिस्क में ही नहीं बल्कि देश के सभी जागरूक नागरिकों के दिलों-दिमाग में हलचल मचाते है। बावजूद इसके हम मौन हैं चुपचाप बैठे हैं आखिर क्यों? यह एक यक्ष प्रश्न है! क्या यह सोचकर कि समृद्ध हो चुके भ्रष्टाचार पर अब नियंत्रण नहीं किया जा सकता, भूख से मरने वालें गरीबों को खाद्यान्‍न मुहैया नहीं कराया जा सकता, चरित्र से गिर चुके राजनेताओं द्वारा संचालित सरकारों का तख्ता पलट नहीं किया जा सकता, आस्तीन में पलते विषधर नागों का फन नहीं कुचला जा सकता। आज देश के जो भी हालात है उसमें काफी हद तक हम और आप भी दोषी हैं। जरूरत तो आत्म अवलोकन की है, जरा सोचें क्या हम गांव स्तर पर वर्तमान बदले परिवेश में स्वच्छ छवि व ईमानदार व्यक्ति को प्रधान बनवा पाते हैं, शायद नही! क्योंकि उस समय हमारे दिलों-दिमाग में राष्ट्र निर्माण व सामाजिक संमानता का उद्देश्य गायब हो चुका होता है।

यही कारण है कि आज लोकतंत्र के लिये भ्रष्टाचार मुक्त सरकार मात्र एक सपना बनकर रह गई है। विश्व में अनोखी पहचान रखने वाले भारत की लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था को संचालित करने वाले जनप्रतिनिधि, राजनेता, जातिवाद, परिवारवाद, स्वार्थवाद और क्षेत्रवाद का चोला पहनकर अवसरवादी राजनीति की दूषित चाल चल रहे हैं। ऐसे नेता देश के आम नागरिकों को गुमराह करके खुले मन से भ्रष्टाचार में लिप्त होकर अनैतिक धन उगाही करते हुये देश की जड़ों को खोखला करने में जुटे हुये हैं। इनकी इन करतूतों से देश का आम नागरिक भली-भांति वाकिफ भी है, यही वजह है कि आज देश के हर कोने में बुद्धिजीवी, समाजसेवी, जागरूक वर्ग में आस्तीन में पल रहे इन विषधर नागों के फन की चर्चा बड़े पैमाने पर हो रही है और ये विषधर नाग लगातार देश की आम जनता को डंसने में मशगूल हैं।

वर्तमान में देश की स्थिति किसी भारतीय से छिपी नहीं है। आज देश में व्याप्त भ्रष्टाचार के चलते गरीबों की संख्या में निरंतर इजाफा हो रहा है।  किसानों, बुनकरों मजदूरों की हालात दिन-ब-दिन जर्जर होती जा रही है। ग्राम सभा से लेकर संसद तक देश की आम जनता का शोषण करने वाले राजनेताओं एवं अफसरशाहों की भ्रष्टाचारी नीतियां पूरी तरह हावी हैं। ऐसे लोग जनता की जेबें खाली कर अपनी-अपनी तिजोरियॉ भरने में जुटे हुए हैं। ऐसे में सुनिश्चित है कि यदि इन विषधर नागों के फैलते फन को कुचलने के लिए हम और आप संगठित ना हुये या यूं कहें कि देश का आम नागरिक जागरूक ना हुआ तो वह खुद तो शोषित होते हुये अनचाही-अनजानी पीड़ा का शिकार बनेगा ही, आने वाली पीढ़ी को भी नारकीय जीवन देकर जायेगा।

लेखक रिजवान चंचल रेड फाइल के संपादक और जनजागरण मीडिया मंच के महासचिव हैं.

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