मां मेरी हो या मायावती की, मुफलिस की हो या महाजन की। मां प्रत्येक दशा मे पूज्य, सम्मानित और स्तुत्य है लेकिन उत्तर प्रदेश की परजीवी पुलिस के लिये बिल्कुल नहीं। समझने वाली बात हो सकती है कि प्रत्येक जीव की पैदाइश मां से होती है परन्तु पुलिस की पैदाइश ही शायद गालियों के बीच से गालियों के द्वारा गालियों के लिये ही हुई है। कर्मवीर की कर्मठ पुलिस के द्वारा प्रदेश की कानून-व्यवस्था को पटरी पर रखने संबंधी बृजलाल के दावे महिला मुख्यमंत्री मायावती की सरकार में पानी के बुलबुलों से अधिक नहीं हैं। सडकों पर वाहन दौड़ाने वाले ड्राइवर ठीक ही कहते हैं कि प्रदेश की पुलिस के लिये वे अपनी एक मां साथ ले कर चलते हैं, जो इनकी गालियां ही खाने के लिये होती है और असली मां बची रहती है।
पुलिस में भर्ती होने के साथ ही यह भूल जाने वाले कि उन्हें भी किसी मां ने जन्म दिया है, दूसरों की मांओं के साथ अपमानजनक व्यवहार करने वाले पुलिसकर्मियों पर हजार बार लानत भेजना लाजमी तो है, लेकिन इससे पहले यह भी जरूरी है कि प्रदेश पुलिस प्रमुख और प्रदेश की मुखिया से इस बात का जवाब मांगा जाये कि प्रदेश मे हर प्रकार के कसूर और कसूरवारों के लिये निर्दोष मांये ही क्यों पुलिस द्वारा अपमानित और गालियां खाने को मजबूर होती हैं।
यशवन्त सिंह की मां ही नहीं हर मां को उसकी ममता के कारण ही प्रदेश की मित्र पुलिस द्वारा किसी न किसी रूप में अपमानित होना पड रहा है, कभी नियम विरूद्ध थाने ले जाकर बंधक बनाये रख कर तो कभी परोक्ष रूप से गलती या बिना गलती के ही पुत्रों से अप्रसन्न पुलिस द्वारा परोसी गयी गालियों के द्वारा। कुल मिला कर अंग्रेजों की निष्पक्ष क्रूर पुलिस को अन्यायी, भ्रष्ट और इस मादरजात मित्र पुलिस से बेहतर बताने वाले लोगों को गलत नही कहा जा सकता। यशवंत जी, हर मां के सम्मान को इन मातृहीन कुपुत्रों से बचाने की मुहिम चलाने की जरूरत से मैं भी सहमत हूं।
लेखक सीबी सिंह त्यागी फतेहपुर में पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

