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माया की महामाया को हर कोई नहीं समझ सकता

: गोनू झा कहिन (दो) : एक दिन भरी दोहपर में ही गोनू झा अपना पोथी-पत्रा का भंडार खोल कर सड़क के बीच में ही बैठ गए. जनता परेशान कि उनको अचानक क्या हो गया. आखिर में गाँव के सरपंच से रहा नहीं गया. उसने जाकर पूछ ही लिया कि पंडित जी ये क्या कर रहे हैं. बस क्या था! गोनू झा भड़क गए और सरपंच को ही दो-चार सुना डाली और साथ ही यह भी कहने से नहीं चूके कि उन्होंने अपनी पत्नी से दस साल पहले जो वादा किया था उसको पूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे. मगर उनकी फरमाइश क्या थी वही एक कागज़ में लिखा था, जिसको वो बेसब्री से तलाश कर रहे थे. कहीं, वो कागज़ मिल गया जिसमे ये लिखा था कि:-

: गोनू झा कहिन (दो) : एक दिन भरी दोहपर में ही गोनू झा अपना पोथी-पत्रा का भंडार खोल कर सड़क के बीच में ही बैठ गए. जनता परेशान कि उनको अचानक क्या हो गया. आखिर में गाँव के सरपंच से रहा नहीं गया. उसने जाकर पूछ ही लिया कि पंडित जी ये क्या कर रहे हैं. बस क्या था! गोनू झा भड़क गए और सरपंच को ही दो-चार सुना डाली और साथ ही यह भी कहने से नहीं चूके कि उन्होंने अपनी पत्नी से दस साल पहले जो वादा किया था उसको पूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे. मगर उनकी फरमाइश क्या थी वही एक कागज़ में लिखा था, जिसको वो बेसब्री से तलाश कर रहे थे. कहीं, वो कागज़ मिल गया जिसमे ये लिखा था कि:-

मरने के बाद मेरे कब्र पर आलू बोना
हर राहगीर समझे, ये चाट का शौक़ीन थी

सरपंच ने फिर पूछा, “क्या महाराज, ये भी कोई ख्वाहिश हुई. अरे उत्तर प्रदेश की मायावती को देखिये. कमाल कर दिया उसने. कांशीराम को मरे पांच साल हो गए, मगर उसकी याद में वो हर साल हज़ार करोड़ की कोई न कोई योजना शुरू कर देती हैं. इस साल भी कई हज़ार करोड़ रुपये की कई योजनायें घोषित कर दीं. आप भी कुछ ऐसा करिए ना की आपकी पत्नी को आपके बच्चे भी प्यार से याद रखें. गोनू झा के चेहरे पर चिंता साफ़ दिख रही थी. मगर उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “भाई सरपंच. तुम भी क्या बच्चों जैसी बातें करने लगते हो? कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली? मैं एक आम आदमी हूँ. मेरी क्या औकात. मगर मेरी पत्नी की बुद्धिमत्ता तो देखो. उसने मुझे ये नहीं कहा की तुम भी मेरे लिए कोई ताजमहल बनवा देना या फिर नोएडा या लखनऊ में पार्क बनवा देना. मुग़ल बादशाह की औकात थी तो उसने मुमताज़ के लिए ताज महल बनवा दिया. भाई जूनून भी तो कोई चीज़ होती है न. एक पंथ और दो काज. शाही खजाने का पैसा पत्थर की कारीगरी में लगा दिया और अपना नाम भी अमर करवा लिया. मगर मेरी बीवी की चिंता ये है कि वो मरने के बाद भी अपनी औलाद को भूखी नहीं देखना चाहती है और कब्र की ज़मीन पर भी आलू का पेड़ लगवाने की बात कर रही है कि कड़की में रोटी पर भले ही टमाटर न मिले, एक आलू तो मिल ही जाएगा. और वैसे भी बिहार, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में बहुत लोगों के लिए आलू ही जीवन है. और खास कर श्री लालू यादव के ज़माने में तो यह बात और भी मशहूर हो गयी थी कि जब तक जंगल में भालू है, समोसा में आलू है तबतक बिहार में लालू है. लालू जी आज भी बिहार में ही हैं भले ही वो सत्ता से बाहर हों.”

सरपंच जी को बात समझ में आ गयी. मगर वो कहाँ चुप बैठने वाले थे. गोनू झा को फिर कुरेदा, “पंडित जी. सुना है, उत्तर प्रदेश में चुनाव होने वाला है”? ”हाँ चुनाव होगा तो क्या हुआ? अरे, आम आदमी तो एक दिन की गलती फिर दोहराएगा और पांच साल तक झेलेगा.. हमारी जनता बिलकुल गौ सामान है. वो सबको माफ़ कर देती है. लोग एक बार चुनाव जीत कर चले जाते हैं. पांच साल तक सो जाते हैं. कुर्सी की गद्दी मोटी होती हैं न. ज़ल्दी ही नींद आ जाती है. जब भी चुनाव की घंटी बजी. बस अपना तौलिया कम्बल लेकर चले आये नेता लोग फिर नौटंकी करने. जनता को फिर लुभाया, फुसलाया. एक दिन का बादशाह बनाया. पैसा लुटाया, खाना लुटाया और वापस अपनी कुर्सी पर. जनता की लाचारी है.. सत्ता तंत्र की यही बीमारी है और हमारे जनतंत्र कि ये पंचवर्षीय महामारी है. इस बार देखना है कि किस राजनीतिक पार्टी की कैसी तैयारी है?”

“मगर पंडित जी, कांग्रेस पार्टी तो हमेशा ही आम आदमी की बात करती है. वैसे आम का मौसम तो दो-तीन महीना का ही होता है?” “कमाल करते हो तुम भी सरपंच. आम आदमी तो कांग्रेस पार्टी का पिछले चुनाव में एक तकिया कलाम था. भारतीय जनता पार्टी देश को सोने की तरह रथ यात्रा कर चमका रही थी. आडवाणी जी को कश्मीर से कन्याकुमारी तक सब कुछ चमकता दिखाई दे रहा था. अटल जी बेचारे क्या करते? एक तो वैसे भी वो बहुत सम्हल कर धीरे-धीरे बोलते हैं. और वैसे भी भंग के तरंग का रंग ही कुछ और होता है. अक्सर उनका तकिया कलाम होता है कि “ये अच्छी बात नहीं है.” सन २००४ में, जब तक एनडीए कि कच्ची बात उनको समझ में आती तब तक कांग्रेस के भाग्य से छींका टूटा और उसके लिए अच्छी बात हो गयी. तब से लेकर कांग्रेस पार्टी हर जगह वही “आम आदमी” का राग अलापे जा रही है. मगर सच तो ये है कि आम आदमी भी अब कांग्रेस की पहुँच और पकड़ से बाहर होता जा रहा है. या यूँ कहो कि बाहर हो गया है. कभी पेट्रोल का भाव उसको रुला देता है, कभी टमाटर तो कभी प्याज और कभी घासलेट. दरअसल अब आम आदमी कीड़ा-मकौड़ा की तरह बन कर रह गया है.”

“मगर मायावती तो योजना पर योजना धकाधक लिए जा रही है महराज. तो क्या ये कहें कि आम आदमी की सबसे ज्यादा चिंता उन्‍हीं को लग रही है?”

”हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता है.’

”क्या मतलब?”

”ऐसा है भैया, जब चुनाव सर पर होता है तो आसमान से सअ कुछ बरसने लगता है. कभी लाठी बरसती है तो कभी गोली बरसती है. कभी योजनायें बरसती हैं तो कभी आश्‍वासन बरसता है. उत्तर प्रदेश की सरकार के लिए यही मौका था. सो बरसा दिया. मायावती कभी कहती थी कि ‘तिलक, तराजू और तलवार.. इनको मारो जूते चार’. एक चुनाव के बाद नारा बदला और कहा जाने लगा कि ‘ब्रम्हा,विष्णु, महेश हैं, हाथी नहीं गणेश हैं’. पता नहीं इस चुनाव में कुछ और ही अलग नारा बन जाये. मगर एक बात समझ में ये नहीं आई कि भैया, इतने सारे पत्थर के हाथी कुछ गिने चुने पार्क में एक लाइन के लगा कर खड़ा कर दिए.. तो अब क्या बचा शेष है? या फिर यहाँ पर भी कुछ विशेष है? पूरी दुनिया में पर्यावरण के नाम कर कुश्ती-कवायद से लेकर पता नहीं क्या-क्या हो रहा है. जंगल कट रहे हैं, पानी की किल्लत हो रही है. और देखो, नोएडा में तो पत्थर के हाथियों की ही बरसात हो गयी है. एक स्मारक के पास पेड़ पौधे भले ही न हों मगर हाथी ज़रूर है. जब हर जगह पत्थर की पत्थर हों तो बारिस कहाँ ये आये?”

”पंडित जी, वो मुख्यमंत्री हैं, जो मर्ज़ी है सो करें. आप क्यों परेशान हो रहे हैं?”

“बात परेशानी की नहीं भाई, चिंता की है. हर साल सौ योजनायें. मगर आज तक किसी ने ये पता किया कि पुरानी योजनायें चल भी रही हैं या नहीं. हर जगह प्लेट लगवा दिया कि अमुक नाम की योजना है. मगर एक साल के बाद जाकर वहां कुछ मिलता है नहीं. जब देवगौडा प्रधानमंत्री बने तो हर शनिवार को कर्नाटक जाकर ४० से ५० योजनायों का उद्घाटन कर आते थे. आज आलम ये है कि ९० फीसदी योजनायें कागज़ पर धरी रह गयीं और जो नेम प्लेट लगा था, वो कहीं टूटा पड़ा कबाड़ में आठ आने में बिक रहा है. मायावती जी को बड़ा बड़ा पुतला बनवाने का बड़ा ही शौक है. एक तरह से वो सही भी हैं कि आने वाली पीढ़ी कम से कम उनका पुतला देख कर नाम तो याद रखेगी.”

“मगर पंडित जी, पुतला तो दिवंगत लोगों की बनायीं जाती है. यहाँ पर तो मायावती और कांशीराम का पुतला हर पार्क, नुक्कड़ और चौराहे पर बनता दिखाई दे रहा है?”

”हाँ, ये बात तो है. मगर कुछ लोग अपनी अपनी अजीबो-गरीब सोच और सत्ता के मद में.. या अपनी सनक में शायद कभी कभी अपना विवेक खो बैठते हैं. संसद भवन के पास से गुज़रते हुए जब कभी किसी बड़े नेता के पुतले पर कौवा या और चिड़िया को बैठकर बीट करते देखता हूँ तो… खैर..”

“पंडित जी, मगर एक बात समझ में नहीं आई. ये कई योजनायें महामाया या मान्यवर कांशीराम के नाम पर ही क्यों? कोई और नाम नहीं मिला क्या?”

”यार, तुम भी चिरकुट की तरह बोलने लगे हो. क्या फर्क पड़ता है? मायावती वही कर रही हैं जो और पार्टियों ने किया है. अब कांग्रेस पार्टी को ही देख लो.. हर दस में से ७ या ८ योजना नेहरु या गाँधी परिवार के किसी न किसी नेता के नाम पर रखा गया है. चाहे वो हवाई अड्डा हो, शिक्षा संस्‍थान हो या फिर कुछ और. फिर मायावती ने मान्यवर, मायावर, यायावर या किसी और नाम से योजनायों का नाम रख दिया तो क्या हुआ? इसी बहाने उत्तर प्रदेश के लोग नारायण गुर, महात्मा फूले, शाहू जी महाराज जैसे कई और लोगों का नाम तो याद रखेंगे. वो ये सब इसलिए कर रही हैं ताकि सनद रहे. अरे भाई, बदनाम भी हुए तो क्या नाम न हुआ? ऐसा तो नहीं कि कांग्रेस पार्टी में और बड़े नेता ही न थे. कई और महान हस्तियाँ थी उस पार्टी में.  उनको कितने लोग याद करते हैं आज कल? वो तो लाल बहादुर शास्त्री का जन्म ही महात्मा गाँधी के साथ आता है, इसलिए साल में लोग एक बार उनको भी मजबूरी में याद कर लेते हैं. वरना तो वो भी नहीं होता. कभी कभार लगता है कि हम लोग सब कुछ नेताओं के नाम पर ही क्यों करने को इतने आतुर हैं? तब तो सार्वजनिक शौचालय और मूत्रालय को भी किसी बड़े नेता के नाम पर होना चाहिए.”

“हाँ, सो तो है. पर सुना है, मायावती ने अपने ६ मंत्रियों को घर का रास्ता दिखा दिया और अब वो नोएडा आकर वहां की भी किस्मत चमका देंगी.”

”इसमें कौन सी नयी बात है? पांच साल तक सब मंत्रियों को दादागिरी करने दी और जब चुनाव का समय आया तो अपने दामन पर लगा दाग-धब्बा हर नेता छुड़ाने की हिमाकत करता है. मायावती को ये सब पहले पता नहीं था क्या? अब अपनी छवि सुधरने के लिए ये सब किया जा रहा है. बिहार में लालू प्रसाद ने यही कहा था कि बिहार की सड़क हेमामालिनी के गाल की तरह चिकनी बना देंगे.. बाद में हुआ क्या? पूरे राज्य ही ऐसा गढ्ढा बन गया कि उगांडा भी उस से बेहतर लगने लगा. मायावती चार घंटे के लिए नोएडा आएंगी, करोड़ों रुपये खर्च होगा साफ़ सफाई पर, भाषण होगा, लोकार्पण होगा और उसके बाद.. चार दिन की चांदनी फिर अँधेरी रात. फिर हमारी और तुम्हारी क्या बिसात?”

”मगर पूरे प्रान्त की हालत तो देखो, कहीं भूमि अधिग्रहण के नाम पर किसानों पर अत्याचार हो रहा है, चोरी-डकैती, खून-खराबा बदस्तूर जारी है. राज्य में हर कुछ जाति, धर्म और वाद के नाम पर होता है. कभी फॉरवर्ड तो कभी बैकवर्ड मगर ‘विकास’ का आज तक कोई “वर्ड” ही नहीं बना. उत्तर प्रदेश पिछड़ापन में शीर्ष पर है. कभी कभी ऐसा लगता है कि इसका नाम उत्तर प्रदेश से बदल कर “उल्टा प्रदेश” कर देना चाहिए क्यों कि देश के और राज्यों के मुकाबले में यहाँ पर बहुत कुछ उलटे-तरीके से ही होता है. जिसकी लाठी उसकी भैंस.”

”अरे हाँ, सुना है, मायावती जी अपने गाँव बादलपुर में एक बड़ा बंगला बना रही हैं?”

”एक क्या, वो एक सौ बनवा सकती हैं. वैसे भी उत्तर प्रदेश में किसानों के खेत के लिये ‘खाद” भले न हो. मगर कोई न कोई “बाद” ज़रूर बन जाता है. मिसाल के तौर पर देख लो. इलाहाबाद से लेकर ग़ाज़ियाबाद के बीच में कम से कम ७२ और वाद है. कभी पूंजीवाद, साम्यवाद, माओवाद होता था. क्या पता मायावती बादलपुर को बदल कर उसका नाम “मायावाद” भी कर दें.”

“अरे पंडित जी, एक बात नहीं सुनी क्या? आडवाणी जी फिर एक रथ यात्रा निकाल दिए, सिताब दियारा से. मगर अब की बार वो अयोध्या नहीं जा रहे हैं.”

“चलो बढ़िया है, यात्रा तो इस देश की पहचान हो गयी है, कोई रथ यात्रा करता है, कोई मठ यात्रा करता है, कोई पंडित के पास जाता है तो कोई आदिवासी के घर में जाता है. मगर यात्राओं से देश की तरक्की कितनी होती है. जनता ये भी तो पूछे? गनीमत है, अबकी कोई इस चुनाव में अयोध्या वाला मसला नहीं उठा रहा है. नहीं तो विगत २० सालों से ये मसला एक नासूर सा बना हुआ है और जब दिल में आता है, हर राजनीतिक पार्टी उसको बारिश के समय सहेजे हुए घर में एक कोने में कूडे़ की ढेर से बहार निकाल कर सियासी रोटी सेंकने लगती है. मेरी अक्ल की आलमारी में एक बड़ा ही बढ़िया नुस्खा है इस समस्या से हमेशा के निजात के लिए. मेरा बस चले तो अयोध्या में मंदिर मस्जिद की जगह एक अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय खोल दूं या फिर वहां पर एक अस्पताल ही बनवा डालूँ क्यों कि आज कल एक आम आदमी को “धर्म” से ज्यादा “‘इलाज़ की” ज़रुरत होती है.” इतने में एक नेताजी की कारों का काफिला गोनू झा के बगल से गुज़रा और उनकी सारी पोथी-किताबों को अपने साथ उड़ा ले गया.

लेखक अजय झा वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. ये हिंदुस्‍तान टाइम्‍स, आजतक, डीडी न्‍यूज, बीबीसी, एनडीटीवी एवं लोकसभा टीवी के साथ वरिष्‍ठ पदों पर काम किया है. अजय से संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

पहला पार्ट पढ़े – अजीब आदमी हो, हमारे देश में कुल पागलखाना कितने हैं?

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