यह सुखद संयोग है। एक तरफ मोहन, दूसरी तरफ माया। यह जगत इन्हीं दोनों की परमलीला का सुघड़ मंच है। युग का तेवर बदल गया है। अब दोनों अपनी-अपनी सत्ता के लिए संघर्षरत है। मोहन वैसे तो महान है, लीलामय हैं पर अहोरूपम् अहोध्वनि: की आकर्षक ध्वनि-प्रतिध्वनि के जाल में घिरे हैं। सभी आत्मरति के, आत्मसम्मोह के शिकार हैं। सबको प्रशंसा चाहिए। गणेश परिक्रमातुर चाटुकार अपने-अपने झाल-मजीरे लेकर प्रशस्तिगायन में जुटे हैं। मोहन मंडली का गुणगान ही परमभक्ति है। चतुर भक्त जानता है किस देवता को कैसे प्रसन्न करना है, वरदान और अभयदान कैसे प्राप्त करना है।
इस तरह बिना मेहनत सब कुछ प्राप्त हो सकता है, इससे आसान रास्ता कहां है। कुछ बिहारी हैं यहां-वहां। श्रृंगार का बाना छोड़ सजगता का झंडा उठाये हुए। वे मोहन के गलियारे तक नहीं पहुंच पा रहे, उन्हें माया की दुनिया में प्रवेश नहीं मिल पा रहा। इसीलिए वे चिल्ला रहे हैं, उन्हें चिल्लाने दो। नहिं पराग नहिं मधुर मधु, नहिं विकास यहि काल।
वे नाकारे हैं, उन्हें कुछ पाने के तौर-तरीके नहीं आते, वे खतरे उठाना नहीं जानते, चाहते भी नहीं। जब सब नींद में हैं तो वे बेकार जागने का पाखंड क्यों रच रहे हैं। उन्हें सोने वालों के सपनों की बात करनी चाहिए। सपने चलते रहें, इसके लिए जरूरी है कि नींद गहरी हो, रात लंबी हो। सुंदर सपने हों तो बाहर कौन आना चाहेगा। सपनों के बाहर कठिन सचाइयां हैं, कंटकाकीर्ण रास्ते हैं, भूख है, संघर्ष है। इन सबसे बचना है तो नींद में गाफिल रहो, खूबसूरत सपनों में डूबे रहो। सपनों में भरपेट भोजन मिल सकता है, सचिन जैसा मकान हासिल हो सकता है। सपनों में ऐश कर सकते हो, गरीब से अमीर बन सकते हो, रंक से राजा बन सकते हो। सपनों के सौदागर सपनों की बात कर रहे हैं। वे सपने रच रहे हैं, सपनों से खेल रहे हैं। सपने उनकी जुबान पर हैं। उनका बड़बड़ाना, उनके खर्राटे सब कुछ सुनाई पड़ रहे हैं। इन लंपटों, दलालों, पाखंडियों का मायाजाल कितना सुंदर है। वे जितना पैसा अपनी दाढ़ी रंगवाने में खर्च कर देते हैं, उतना कमाने वालों को गरीब नहीं मानते।
उनके हिसाब से स्वस्थ और सुखी रहने के लिए एक दिन फलों पर 44 पैसे, सब्जियों पर दो रुपये, चीनी पर 70 पैसे, दाल पर एक रुपया और आटे पर तीन रुपये खर्च पर्याप्त है। अगर कोई इतना कर ले तो वह गरीब नहीं माना जाना चाहिए। इन्हीं लाल बुझक्कड़ों के बूते मोहन का महारास चल रहा है। वे तो सारी दुनिया के गरीब देशों की मदद के लिए आतुर हैं, बगैर किसी शर्त सब पर कृपा बरसाने को तैयार हैं। उनकी पाखंड-नाटिका बेरोक-टोक चल रही है। उनके पास बेहतरीन नक्कारे हैं, आला विदूषक भी। इस नाटिका में मोहक तिलस्म हैं, थर्रा देने वाले रोमांच हैं, परम नाटकीय क्रूर दुखांतिकाएं और अनंत कपट कथाएं हैं। मोहन के फेफड़ों में इतनी ताकत नहीं कि बांसुरी बजा सकें। सो उन्होंने बजने का विकल्प चुन लिया है। कोई सोणिया जब चाहे, उन्हें बजा ले। जैसा चाहे सुर-राग निकाल ले। वे हारमोनियम, गिटार, जलतरंग, तबले की तरह बज सकते हैं, बांसुरी की तरह भी।
उनके पास आधुनिक सुदामा हैं, उद्धव भी। सुदामाओं को अब मुट्ठी भर चावल छिपाने का संकोच नहीं पालना है, वे हस्तिनापुर के लोकमहल में निर्धनों के श्रम स्वेद से रची मणियां चुराकर, छिपाकर ले जा सकते हैं, रातों-रात रंक से राजा हो सकते हैं। उनके उद्धव भूख, गरीबी, निरुपायता से मुक्त होने का सरल ज्ञान बांटने में जुटे हैं, उन्हें खुशी होगी अगर लोग ज्यादा से ज्यादा उपवास रखें, भूख हड़ताल करें, अनशन करें। अमीर-गरीब सभी बिना किसी भेदभाव के आमंत्रित हैं। उनकी सलाह है, मोह छोड़ो, लालच त्यागो और माया से सावधान रहो। मोहन के इस राग-रंग से माया प्रसन्न नहीं हैं। वे सबको नचाती रहती हैं। वे जिसे चाहें, सबके सिर पर चढ़ा दें, ऋद्धि-सिद्धि प्रदान कर दें, जिसे चाहें, पराभव और अपमान की दुनिया में ढकेल दें। शास्त्रकारों ने भी सचेत किया है कि माया के अंधकार लोक की छद्म दीप्ति को समझ सको तो मुक्ति कठिन नहीं है। पर इस कलियुग में मुक्ति किसे चाहिए। सबको माया से राग है।
माया लक्ष्मीरुपा हैं। वह सहज प्रसन्न नहीं होतीं। समर्पण मांगती हैं। पहले सब कुछ चरणों में डाल दो, धन-संपदा, अहंकार-अस्मिता, सब मिटा दो फिर कुछ भी पाने का, कुछ भी करने का अधिकार हासिल होगा। जगत मायावी है, पर यही सत्य है और जो सत्य है, वही ब्रह्म है। इसलिए अमूर्त ब्रह्म की आस छोड़ो, मूर्त माया की शरण गहो। एकनिष्ठ भाव से ऐसा कर सको तो कर्म के बंधन से मुक्ति है। फिर तुम्हारे पापाचरण, अपराध भी तुम्हारे लिए दंड के कारण नहीं बनेंगे। मोहन और माया, दोनों ही अपने भक्तों को मुक्त करते हैं। कुछ अड़चनें हैं, अदैवीय ताकतों से, जो अपनी सीमाओं का ख्याल नहीं करतीं, इसलिए इनसे सावधान रहना, अपने अपराधों के निशान मत छोड़ना, फिर तुम न्याय-अन्याय की परिधि से बाहर हो जाओगे। हस्तिनापुर से लेकर लखननगरी तक एक ही तरह के नाटक चल रहे हैं। जीवन एक नाटक है, इससे क्या घबराना। नाटक आप भी खेल सकते हैं। कोई बेहतर पटकथा हो, कोई वैकल्पिक मंच हो तो आप अपना रिहर्सल जारी रखिये। पर्दा उठने की देर है, जो नेपथ्य में हैं, उन्हें मंच की ओर बढ़ने के लिए ललकारिये। शायद मौका मिल जाये, नया नायक रचने का।
लेखक डा. सुभाष राय अमर उजाला और डीएलए के संपादक रह चुके हैं. इन दिनों जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ के संपादक हैं. साहित्य, अध्यात्म, आंदोलन से गहरा जुड़ाव रखने वाले डा. सुभाष के लिखे इस लेख को जनसंदेश टाइम्स से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. उनसे संपर्क 07376666664 के जरिए किया जा सकता है.

