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मीट-भात-दारू-नोट-वोट बनाम विकास

अफसोस की बात है कि मध्य प्रदेश के नेता यहाँ की जनता को आज भी बेवकूफ समझते हैं, लेकिन ‘पब्लिक सब जानती[caption id="attachment_2119" align="alignright"]सतीश कुमार सिंहसतीश कुमार सिंह[/caption] है’ वाला जुमला यहाँ पूरी तरीके से चरितार्थ होने लगा है। अभी हाल ही में सम्पन्न हुए विधानसभा चुनाव में लटेरी तहसील जो कि विदिशा जिला के अंतगर्त आता है, के एक गाँव ‘सगड़ा’ के सरपंच रामचरण ठाकुर और गाँववालों ने लक्ष्मीकांत शर्मा के समक्ष यह शर्त रखी कि वे उन्हें तभी वोट देंगे, जब वे उनके गाँव तक सड़क का निर्माण करवायेंगे।

सतीश कुमार सिंह

अफसोस की बात है कि मध्य प्रदेश के नेता यहाँ की जनता को आज भी बेवकूफ समझते हैं, लेकिन ‘पब्लिक सब जानतीसतीश कुमार सिंह है’ वाला जुमला यहाँ पूरी तरीके से चरितार्थ होने लगा है। अभी हाल ही में सम्पन्न हुए विधानसभा चुनाव में लटेरी तहसील जो कि विदिशा जिला के अंतगर्त आता है, के एक गाँव ‘सगड़ा’ के सरपंच रामचरण ठाकुर और गाँववालों ने लक्ष्मीकांत शर्मा के समक्ष यह शर्त रखी कि वे उन्हें तभी वोट देंगे, जब वे उनके गाँव तक सड़क का निर्माण करवायेंगे।

यह घटना मतदान होने के लगभग 1 सप्ताह पहले की थी। इसके बावजूद भी दो दिन के अंदर लक्ष्मीकांत शर्मा को एसएच संख्या-23 से गाँव तक सड़क का निर्माण करवाना पड़ा। उस गाँव में कुल 665 वोट थे और उसे खोना किसी भी नेता के लिए खतरनाक हो सकता था और श्री शर्मा कोई भी खतरा उठाने की स्थिति में नहीं थे, क्योंकि उनके मत प्राप्ति का प्रतिशत लगातार कम होता जा रहा था। श्री लक्ष्मीकांत शर्मा चुनाव पूर्व भी मध्य प्रदेश सरकार में काबीना मंत्री थे और वतमार्न में भी वे काबीना मंत्री हैं।

रतलाम जिला में तकरीबन तीन दशकों से नेताओं द्वारा एक ही सब्जबाग दिखाया जा रहा है। वे हर बार माही नदी के पानी को रतलाम तक लाने की बात करते हैं। लेकिन अभी तक इस सपने को मूर्त रुप देने का किसी ने कोई प्रयास नहीं किया है। उल्लेखनीय है कि सन् 1980 से 1998 तक सांसद रहे कांग्रेस के दिलीप सिंह भूरिया ने सबसे पहले इस मुद्दे को रतलाम शहर के निवासियों के समक्ष रखा था। पर उन्होंने स्वयं कभी भी इस मुद्वे को अमलीजामा पहनाने के लिए कोई प्रयास नहीं किया। इस बार सभी दल के प्रत्याशी इसी मुद्वे को लेकर जनता के सामने जा रहे हैं। क्या इस बार भी चौपड़ का यह पासा सही खाने में अपना स्थान बनायेगा या फिर विकास की आँधी में नेताओं का मायाजाल तहस-नहस हो जाएगा? फिलहाल यह तो समय के गर्भ में है। लेकिन इतना तो निश्चित है, अगर सभी ने अपना मतदान गंभीरतापूर्वक किया तो नेताओं का भ्रम जरूर टूट जाएगा।

बस्तर में सालन/माँस (मीट)-भात और महुए के दारू की दावत की तैयारी जोरों पर है। नेताओं के चमचे-बेलचे कसाइयों के पास जाकर बकरे की बुकिंग पहले ही करवा चुके हैं। एक अनुमान के अनुसार यहाँ करीब एक करोड़ रुपयों के बकरे के बिकने की संभावना है। बकरों की कमी होने पर ब्रायलर मुर्गा या मछली का इंतजाम किया जा सकता है। यहाँ एक कहावत प्रचलित है, अगर आपको चुनाव जीतना है तो सालन/माँस (मीट)-भात और महुए के दारू की दावत तो देनी ही होगी। आदिवासी बहुल इलाकों और पिछड़े इलाकों में नेताओं का यह पुराना फार्मूला भले ही काम कर सकता है, लेकिन जो इलाका थोड़ा भी विकसित है या जहाँ की जनता अनपढ़ होने के बावजूद भी अपने मत के महत्व से वाकिफ है, वहाँ नेताओं के इस तरह के फार्मूले कदापि काम नहीं करेंगे।

इस बार भाजपा की दिग्गज नेत्री सुषमा स्वराज ने अपना नामांकन विदिशा रायसेन क्षेत्र से दाखिल किया है। वैसे यह तो भाजपा के आलाकमान का फैसला है, लेकिन विकास के मुद्दे के बरक्स इस संसदीय क्षेत्र की जनता को यह निर्णय लेना होगा कि श्रीमती स्वराज इस क्षेत्र की समस्याओं का किस हद तक निवारण कर पायेंगी, क्योंकि श्रीमती स्वराज इस संसदीय क्षेत्र के लिए अनजान हैं। स्वभाविक रूप से उनका चुनाव जीतने के बाद इस क्षेत्र के प्रति कोई खास लगाव नहीं होगा। इसके अलावा इस संबंध में देश की जनता को यह भी निर्णय लेना होगा कि बाहर से आकर चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों (चाहे वे फिल्मी हस्तियाँ हों) को वे अपने सिर आँखों पर बैठायें या फिर एक सिरे से उनकी उम्मीदवारी को अपने मत की शक्ति के द्वारा हमेशा के लिए खारिज कर दें। इस तरह के उम्मीदवार जिनका चुनाव जीतने के बाद क्षेत्र में कोई आना-जाना नहीं होता है या होगा को, आज जनता द्वारा सीख देने की जरूरत है।

करिश्माई व्यक्तित्व के करिश्मे का क्षरण आहिस्ता- आहिस्ता हो रहा है। ग्वालियर संसदीय क्षेत्र में सिंधिया परिवार का करिश्मा भी धीरे-धीरे उतार पर है। सन् 1989 में माधव राव सिंधिया ने 57.89 फीसदी से चुनाव जीता था जो कि 1991 की मध्यावधि चुनाव में, घटकर 53.37 फीसदी हो गया था। माधव राव सिंधिया के बाद उनके बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने पिता की जगह ली किन्तु वे अपना पिछला चुनाव बमुश्किल जीत पाये थे। इस बार तो पनघट की डगर उनके लिए और भी कठिन है। इस संसदीय क्षेत्र में भी जनता विकास की बाट एक अरसे से जोह रही है।

बैतुल में भी भाजपा की डगर आसान नहीं है। इस संसदीय क्षेत्र में भाजपा 5 बार अपनी जीत का परचम लहरा चुकी है, लेकिन इस बार फल की प्राप्ति के लिए भाजपा को काफी पापड़ बेलने पर सकते हैं। फिलहाल तो तीन जिलों में बँटे बैतूल-हरदा-हरसूद संसदीय सीट के लिए दावेदारों में ही घमासान मचा हुआ है। हालाँकि लोकसभा चुनाव के प्रभारी और सांसद हेमंत खंडेलवाल सभी के साथ होने का दावा कर रहे हैं, पर हकीकत में उनके दावे में कोई दम नहीं है। इस संसदीय क्षेत्र के उम्मीदवार के लिए सबसे प्रमुख दावा संघ पृष्ठभूमि वाले डी.डी उइके का है।

ध्यातव्य है कि पूर्व में यह सीट आरक्षित नहीं था, परन्तु अब यह आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित है। इस संसदीय क्षेत्र से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यहाँ विकास की धारा का बहना अभी भी शेष है और इसी कारण इस बार भाजपा की स्थिति यहाँ खस्ताहाल है। दूसरे शब्दों में उसकी वापसी की संभावना आसान नहीं है। वैसे तो मध्य प्रदेश में पानी की किल्लत शुरु से रही है, विगत वर्षों में हालत बद से बदतर हुए हैं। इस साल तो हालत बहुत ही खराब हैं। अल्प वर्षा और जल के कुप्रबंधन के गठजोड़ ने प्रदेश में त्राहिमाम्-त्राहिमाम् वाली स्थिति उत्पन्न कर दी है। भोपाल शहर में नर्मदा नदी का पानी आये, यह वहाँ के रहवासियों की प्रथम प्राथमिकता है। उज्जैन और देवास में पीने के पानी के संकट के स्थायी निदान के बारे में भी सोचने की जरुरत है। इस मुद्वे पर यहाँ की जनता नेताओं से बात कर सकती है।

मध्य प्रदेश में सपा और तीसरे मोर्चे का कोई खास वजूद नहीं है। उमा भारती के कस-बल विगत चुनावों में निकल चुके हैं। स्थानीय नेताओं का चुनाव के सर पर पहुँचने के बाद भी मातृ दल से मोहभंग होने का सिलसिला बदस्तूर चल रहा है। अभी हाल ही में कटनी के महापौर संदीप जायसवाल, छतरपुर के शंकर सिंह बुंदेला ने भाजपा का दामन थाम लिया है। वहीं टीकमगढ़ के नेता और पूर्व मंत्री अखंड प्रताप सिंह ने भाजपा से अपना नाता तोड़ लिया है। अपने कुनबे में बढ़ोतरी से भाजपा के आलाकमान तो खुश है, लेकिन भाजपा के उन नेताओं के लिए यह दु:ख का सवब है, जिन्होंने नर्सरी से लेकर प्रतिष्ठा तक की पढ़ाई भाजपा की पाठशाला में पूरी की है। उन्हें अपने हक से महरुम होने का डर सता रहा है। कहने का तात्पर्य यह है कि वर्तमान परिवेश में किसी भी दल या उम्मीदवार को जनता की कतई चिंता नहीं है। वे किसी भी तरीके से चुनाव जीतना चाहते हैं। पर जनता में बढ़ती जागरुकता शायद ही नेताओं के गलत मनसूबों को कामयाब होने दे। इस संबंध में एक अनजान कवि ने वैसे तो पर्यावरण के बारे में लिखा है, परन्तु उनकी कविता की पंक्तियाँ, नेताओं की जनता के बारे उनकी क्या सोच है और उस सोच के बरक्स में किस तरह के नकारात्मक परिणाम निकल सकते हैं, उसको समीचीन तरीके से उकेरती है-

  मैंने सारे दरख्तों को, काटकर टांग दिया

खिड़कियों और दरवाजों में, सोचकर

निर्बल, असहाय, क्या बिगाड़ेंगे मेरा

  पर मेरी सोच, टिक न सकी अधिक देर

जब मैंने देखा, सैलाब, सूखा

और पीले-मुरझाये चेहरे।

जो भी हो अब नेताओं को शायद इस कविता का मर्म समझ में आ गया है और उन्होंने कम-से-कम विकास की बात करनी तो शुरू कर ही दी है। अभी हाल ही में भाजपा के संसदीय क्षेत्रों के कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि सभी चुनाव एक साथ होना चाहिए ताकि चुनावों में लगने वाला समय और पैसा दोनों बच सके और साथ ही विकास भी हो सके। वे अपने भाषण में एक नया मध्य प्रदेश बनाने की बात कर रहे थे। श्री चौहान चाहते हैं कि मध्य प्रदेश में ऐसी विकास की बयार बहे, जिसमें बहकर सभी समस्याओं का निदान हो जाए। बदलते परिवेश में नेता इस मुगालते में न रहें कि वे चुनाव जीत रहे हैं तो उनको जनता का समर्थन हासिल है। दरअसल वे इस लिए जीत रहे हैं क्योंकि आज का पढा-लिखा वर्ग आज भी लोकतंत्र के महापर्व के दिन नेताओं को गाली देते हुए चाय की चुस्की ले रहा होता है। वह लोकतंत्र के महापर्व के दिन को महज अवकाश का दिन मानता है।

मध्यम वर्ग द्वारा मतदान नहीं करने का ही नतीजा है कि आज नेतागण मात्र 19-20 फीसदी मत पाकर सांसद बन जाते हैं और कई बार काबीना मंत्री भी। क्या ऐसे नेता हमारे जन प्रतिनिधि हो सकते हैं, जिनको हमने चुना ही नहीं है? लिहाजा कौन वर्तमान व्यवस्था के लिए जिम्मेदार है- नेता या हम? इस प्रश्न के बारे में जरूरत है आज आत्मावलोकन करने की। विकास नहीं हो रहा है तो भी इसके लिए हम ही जिम्मेदार हैं। वस्तुत: हम चाहते ही नहीं कि विकास हो। गरीबी में जीना हमें रास आता है। पर अगर हमें अपनी आने वाली पीढ़ी के भविष्य को सुरक्षित करना है तो हमें लोकतंत्र के इस महापर्व में हिस्सा लेकर अपनी किस्मत को अपनी मुट्ठी में करना ही होगा। ‘स्लमडॉग मिलेनियर’ की तरह गरीबी से हमें वाहवाही लूटने की चाहत को तिलाजंलि देनी ही होगी। हमें यदि विकास और आत्मनिर्भरता पर बनी किसी सिनेमा पर कोई आस्कर मिलता तो वह दिन निश्चित रूप से हमारे लिए गौरवशाली होगा।


लेखक सतीश कुमार सिंह भारतीय स्टेट बैंक में वरिष्ठ प्रबंधक हैं। इन दिनों वे मध्य प्रदेश के विदिशा जिले में कार्यरत हैं। पिछले एक वर्ष से स्वतंत्र लेखन कर रहे सतीश कई वर्षों तक मुख्यधारा की पत्रकारिता में भी सक्रिय रहे हैं। सन् 1995 में भारतीय जनसंचार संस्थान, दिल्ली से हिन्दी पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के बाद 1999 तक प्रिंट मीडिया से जुड़े रहे। इस दौरान दैनिक हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, प्रभात खबर, हिन्दुस्तान टाइम्स इत्यादि अखबारों के लिए काम किया। सन् 2000 में परीवीक्षाधीन अधिकारी के रूप में भारतीय स्टेट बैंक समूह से जुड़ गए। सतीश से संपर्क [email protected] या फिर 09993035479 के जरिए किया जा सकता है।

 

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