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मीडिया मंथन

मीडिया का साम्प्रदायिक ‘चरित्र’

संतोष2008 में जब मुंबई पर हमला हुआ तो सवाल उठा कि आखिर खुफिया एजेंसियों को इसकी भनक तक क्यों नहीं लगी? कुछ जानकारों ने इसका एक जवाब भी ढूंढ़ा कि खुफिया एजेंसियों में मुस्लिम चेहरे तो हैं ही नहीं। अर्थात इन एजेंसियों में किसी बड़े पद पर कोई मुस्लिम अफसर नहीं है। कहने का तात्पर्य यही था कि हम जिस धर्म या जाति से सम्बंधित होते हैं उसके बारे में बाकी के मुकाबले ज्यादा जानते हैं। हम कार्रवाई करना चाहें तो कर सकते हैं, बचाना चाहें तो बचा सकते हैं। बहुत कुछ यही भाव था मालेगांव और समझौता एक्सप्रेस में धमाकों के बाद। जो भी आतंकवादी घटना होती- मुस्लिम युवक को पकड़ कर खानापूर्ति कर दी जाती। असीमानंद के स्वीकारने के बाद तस्वीर एकदम बदल गई। मीडिया में भी ये साम्प्रदायिक भाव बहुत गहरे है…एक वाक्या याद आ रहा है.

संतोष

संतोष2008 में जब मुंबई पर हमला हुआ तो सवाल उठा कि आखिर खुफिया एजेंसियों को इसकी भनक तक क्यों नहीं लगी? कुछ जानकारों ने इसका एक जवाब भी ढूंढ़ा कि खुफिया एजेंसियों में मुस्लिम चेहरे तो हैं ही नहीं। अर्थात इन एजेंसियों में किसी बड़े पद पर कोई मुस्लिम अफसर नहीं है। कहने का तात्पर्य यही था कि हम जिस धर्म या जाति से सम्बंधित होते हैं उसके बारे में बाकी के मुकाबले ज्यादा जानते हैं। हम कार्रवाई करना चाहें तो कर सकते हैं, बचाना चाहें तो बचा सकते हैं। बहुत कुछ यही भाव था मालेगांव और समझौता एक्सप्रेस में धमाकों के बाद। जो भी आतंकवादी घटना होती- मुस्लिम युवक को पकड़ कर खानापूर्ति कर दी जाती। असीमानंद के स्वीकारने के बाद तस्वीर एकदम बदल गई। मीडिया में भी ये साम्प्रदायिक भाव बहुत गहरे है…एक वाक्या याद आ रहा है.

आउटपुट हेड ने कहा- सुदर्शन जी की प्रेस कॉन्फ्रेंस चल रही है सीधे लाइव काटिये।

सर अभी तो कार्यक्रम चल रहा है- अन्य सीनियर ने जवाब दिया।

कार्यक्रम रोकिए सीधे लाइव काटिए- आउटपुट हेड फिर बोले

सर सुदर्शन जी का डेजिगनेशन क्या लिखें? क्योंकि वो आरएसएस के प्रमुख तो है नहीं।

आपको बताना पड़ेगा। लिखिए ना अध्यक्ष आऱएसएस अरे नहीं पूर्व सरसंघचालक लिखिए।

ठीक है सर। लेकिन सर हेडर क्या दूं। सुदर्शन की प्रेस कॉन्फ्रेंस या आरएसएस की प्रेस कॉन्फ्रेंस

अरे सुदर्शन आरएसएस की ओर से ही प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे होंगे।

निश्चय हुआ कि आरएसएस की प्रेस कॉन्फ्रेंस लिखेंगे और उनका डेजिगनेशन आरएसएस के पूर्व सरसंघचालक।

लाइव कटा। केसी सुदर्शन का चक्र चला।

सुदर्शन के आधे घंटे की प्रेस कॉन्फ्रेंस का निहितार्थ यही था कि भाजपा, आरएसएस और वीएचपी के बड़े नेता और हजारों समर्थकों के साथ उस वक्त अयोध्या में थे, लेकिन विवादित ढांचा गिराने का मकसद नहीं था। यदि विवादित ढांचा गिरा तो इसमें केंद्र की सरकार के अहम योगदान को नकारा नहीं जा सकता।

लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट पर सुदर्शन जी बोले- रिपोर्ट में अटल बिहारी वाजपेयी का नाम आना दुखद है।

मिश्रा जी ने थोड़ा उत्साह दिखाते हुए सुदर्शन की प्रेस कॉन्फ्रेंस की जगह बाबरी मस्जिद लिख दिया।

एक सीनियर मनोरंजन जी चीखते हुए बोले- आपने बाबरी मस्जिद क्यों लिख दिया। जब आप ही बाबरी मस्जिद लिख देंगे तो लोग तो समझेंगे ना कि वहां बाबरी मस्जिद थी। फिर चीखे… हेडर हटाइए। लिखिए- विवादित ढांचा।

पीछे से आउटपुट हेड ने भी डांटा- आगे से बाबरी मस्जिद कभी नहीं लिखेंगे। सर बाकी चैनलों ने भी लिखा था सो….। बाकी को लिखने दीजिए- उनका कोई चरित्र है क्या?

एक सीनियर ने कहा- सर हम लोग कितने बायस हैं।

मनोरंजन जी फिर बोले- बायस नहीं हैं। आप सोचिए अगर मंदिर गिराया गया लिख दें तो सड़क से संसद तक हंगामा बरप जाएगा। मंदिर कैसे लिख दिया। जबकि राम मंदिर वहीं था। वही गिरा था और वहां मंदिर ही बनना चाहिए।

मंदिर वहीं बनना चाहिए पर आउटपुड हेड की कातिल मुस्कान साफ-साफ झलक रही थी।

मनोरंजन एक कट्टर हिंदुवादी हैं। समय-समय पर अपना चारित्रिक परिचय देते रहते हैं।

सुदर्शन की प्रेस कॉन्फ्रेंस खत्म होने वाली थी। बुलेटिन में थोड़ा समय बचा था। शिफ्ट इंचार्ज ने कहा कि प्रेस कॉन्फ्रेंस जैसे ही खत्म हो। कल्याण सिंह की बाइट कट गई है उसे चलाइए। तीन चार बाइट है। अच्छा बोले हैं।

सुदर्शन की प्रेस कॉन्फ्रेंस खत्म। कल्याण की बाइट- “ढांचा गिर गया तो गिर गया। हमें ढांचा गिरने का गम नहीं। लेकिन अब वहां मंदिर ही बनेगा, मंदिर ही बनेगा, मंदिर ही बनेगा। वहां मंदिर बनने से दुनिया की कोई ताकत रोक नहीं सकती।“

आउटपुट हेड ने कहा- अच्छा तो बोल रहे हैं एक दो बाइट और हो तो चलाओ।

करीब एक घंटे के टेलीविजन बुलेटिन में सुदर्शन और कल्याण सिंह की भड़ास चलती रही।

राष्ट्रीय चरित्र का चोंगा ओढ़े ज्यादातर न्यूज चैनलों का यही असली चरित्र है। इनके मौकापरस्ती की दाद देनी होगी। संतुलित और निष्पक्ष खबरों की उम्मीद करने की स्थिति नहीं है। हां इतना कहना ज्यादा जरूरी है कि इन्हें देखकर अपना व्यू कत्तई न बनाएं। अपने ज्ञान और सामयिक परिप्रेक्ष्य में इन्हें परखते जरूर रहें।

लेखक संतोष कुमार राय पिछले पांच वर्षों से दिल्‍ली में पत्रकारिता कर रहे हैं.

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