दुनिया के सारे झूठे, फरेबी, घोटालेबाज, चालाक और मक्कार किस्म के लोग अपना हित साधने से पहले आदर्शवाद और नैतिकता की बातें करते हैं, फिर उसकी आड़ में वो सारा स्वार्थ साधते हैं. किसी शायर ने लिखा है : बहारों के खिलाफ साजिश करने वाले, सारी कलियों के हमदर्द बन बैठे. कुछ यही हाल है मीडिया सेमीनारों का. इस नक्कारखाने में तूती कई पत्रकार और बुद्धिजीवी बजाने आते हैं. अपना ढपोरशंखी व्याख्या और व्याख्यान प्रस्तुत करने के बाद उच्च स्तर का लज़ीज़ खाना खाते हैं, स्टार मार्का होटल की सेवा लेने के बाद अपनी आमदनी जेब में रख के खिसक लेते हैं. इन सेमीनारों के आयोजनकर्ता गैर-सरकारी संगठन या सरकारी एजेंसियां भी इस समाज सेवा के माध्यम से सरकारी पैसा को ठिकाने लगाने के लिए नित नए सेमीनार के आयोजन की योजना बनाती रहती हैं. ऐसे सेमीनार के चार तत्व होते हैं-आयोजक, प्रायोजक, वक्ता और श्रोताओं की भीड़.
ऐसे सेमीनारों के मंच पर अक्सर वैसे पत्रकार वक्ता आते हैं, जो सेमीनार के मंच से मीडिया के उन्हीं बुराइयों की आलोचना करते हैं, जिन बातों को वो मीडिया संस्थानों में रहके खूब बढ़ावा देते हैं. इनके दोनों हाथों में लड्डू रहते हैं. एक तरफ तो ये वही काम करके मीडिया संस्थानों के वफादार बनकर खूब पैसा कमाते हैं और दूसरी और उन्ही कामों की आलोचना ऐसे सेमीनारों में करके, वाहवाही लूटकर नेक महान कहलाते हैं. आजकल ऐसे ब्रांडेड पत्रकारों की इन सेमीनारों में भारी मांग है, जिसे सुनने के लिए भीड़ जुट सकती है.
इन सेमीनारों में वैसे किस्म के बुद्धिजीवी वक्ता आते हैं, जिनका पेशा ही है समस्याओं का पेट भरके आलोचनात्मक विश्लेषण करना. ऐसे बुद्धिजीवी अक्सर चरित्र से पूंजीवादी लेकिन बातों से जनवादी और मार्क्सवादी ढोल पीटते हैं. इनको सुनने आयी भीड़ दोपहर के लजीज भोजन के समय तक तो किसी तरह उंघती और उबती हुयी सुनती रहती है लेकिन भोजन के बाद उनमे वहां बैठकर पाखण्ड पुराण सुनने का साहस नहीं रह जाता और सेमीनार हाल में वही लोग बच जाते हैं जो या तो आयोजनकर्ता होते हैं या वक्ता या किसी मजबूरी के कारण बैठे श्रोता.
इन सेमीनारों में पत्रकारों के शोषण और मीडिया मालिक को जी भर के कोसा जाता है और पत्रकारों के दयनीय हालत पर नाद-नाद भर घडि़याली आंसू बहाए जाते हैं. मोटा-मोटी तीन तरह की बातें हर सेमीनार में की जाती है.
१. पत्रकारिता अब एक मिशन नहीं, सेठ जी का धंधा है- कहने का मतलब है कि अगर कोई सेठ व्यापार करेगा तो वो मुनाफा चाहेगा. इसमें कोई बुराई नहीं. इसलिए अब पत्रकारिता नहीं बची है, टीआरपी और विज्ञापन का खेल बच गया है. पत्रकारों को इस हालात में खुद को ढाल लेना चाहिए क्योंकि आज की स्थिति को बदला नहीं जा सकता.
२. पत्रकारों पर मीडिया मैनेजरों का दबाब बढ़ता जा रहा है. पत्रकारिता के मूल्य खत्म हो गए हैं. पत्रकारिता के शोषण होने का कारण इसका असंगठित रूप है. वगैरह वगैरह. बीच बीच में कई वक्ता फुलझरियाँ छोड़कर उंघते और उबते श्रोता को जगाने का भी प्रयास करते हैं.
३. अंत में हर सेमिनार में समाधान सुझाया जाता है, जो आयोजकों की रिपोर्ट को मोटी करने में बहुत काम आता है, लेकिन जिसका पत्रकारिता जगत के सुधार में दूर दूर तक कोई असर नहीं होता.
ऐसे सेमीनार का आयोजन एक प्रकार का धंधा है, जो आजकल तेजी से पनपा है. इसमें पैसे कमाने की अपार संभावना, नक्कारा और खोखली समाज सेवा, गाल बजाऊ बौद्धिक जुगाली के साथ साथ वातानुकूलित माहौल में लजीज नाश्ते-खाने का मज़ा है. यह आधुनिक मीडिया के इंक और लिंक, दोनों चरित्र को अपने फायदे के लिए उपयोग करता है. इन सेमीनारों के आयोजकों का लिंक ऐसे पत्रकारों और बुद्धिजीवियों से होता है जिसे आप ‘सेमीनारबाज़’ कह सकते हैं, जो आपको अधिकांश सेमीनारों में दिख जाएंगे. यह इस धंधे का लिंक चैनल है. यही चैनल बहुत बड़ा पाखंडी है, जो आदर्शवाद का चोला पहनकर पत्रकारों के पक्ष में गाल बजाता है, जिससे होता जाता कुछ नहीं. हाँ, सरकारी पैसे का जरुर बंदरबांट हो जाता है. ये उसी बन्दरबाँट का पाखंडी धंधा है.
जबसे समाजशास्त्र का जन्म हुआ है, तब से बुद्धिजीवियों को यथास्थिति को बनाये रखने का एक बड़ा हथियार मिला है, जिसका एक ही सिद्धांत है, जो हो रहा है सिर्फ उस यथार्थ स्थिति का तोतारटंत और थोथा विश्लेषण करते चलो. समस्या का समाधान सुझाते चलो. बस अपना धंधा बढ़ाते चलो क्योंकि सबको पता है कि समस्या का समाधान गाल बजाकर और सिर्फ समाधान सुझाने से तो होनेवाला नहीं. क्या ऐसे पाखंडी और धंधेबाज चाहेंगे कि पत्रकारों की समस्याओं का कोई हल निकले, जिन समस्याओं के सहारे इनका सेमीनारी धंधा फलता-फूलता है.
लेखक राजीव सिंह पत्रकारिता के क्षेत्र से जुड़े हुए हैं.

