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मीडिया मंथन

मुश्किल है खुद को कटघरे में खड़ा करना

उत्तर प्रदेश में एक मीडिया कर्मी के साथ पुलिस की बदसलूकी ने एक बार फिर ये सवाल खड़ा कर दिया है कि सत्ता और प्रशासन वाले मीडिया के लोगों को आखिर समझते क्या हैं? ये सवाल इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि उसके बाद ही मीडिया वाले अपना बचाव कर सकते हैं. लेकिन इससे भी बड़ा सवाल मेरे नज़दीक ये है कि खुद मीडिया वाले अपने आपको क्या समझते हैं? मेरे दोनों सवालों पर ढेर सारे सवालात उठ सकते हैं. खासतौर से ऐसे समय में जब मीडिया वाले अपने ऊपर हुए हमले की निंदा करने और दोबारा ऐसी हरकत ना हो, उसे सुनिश्चित करने के लिए धरना प्रदर्शन कर रहे हैं. लेकिन इन हालात में भी सवाल उठाने का साहस मुझे मीडिया के दस वर्षों से भी ज्यादा के तजुर्बे ही ने दिया है.

उत्तर प्रदेश में एक मीडिया कर्मी के साथ पुलिस की बदसलूकी ने एक बार फिर ये सवाल खड़ा कर दिया है कि सत्ता और प्रशासन वाले मीडिया के लोगों को आखिर समझते क्या हैं? ये सवाल इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि उसके बाद ही मीडिया वाले अपना बचाव कर सकते हैं. लेकिन इससे भी बड़ा सवाल मेरे नज़दीक ये है कि खुद मीडिया वाले अपने आपको क्या समझते हैं? मेरे दोनों सवालों पर ढेर सारे सवालात उठ सकते हैं. खासतौर से ऐसे समय में जब मीडिया वाले अपने ऊपर हुए हमले की निंदा करने और दोबारा ऐसी हरकत ना हो, उसे सुनिश्चित करने के लिए धरना प्रदर्शन कर रहे हैं. लेकिन इन हालात में भी सवाल उठाने का साहस मुझे मीडिया के दस वर्षों से भी ज्यादा के तजुर्बे ही ने दिया है.

मुझे मालूम है कि मुश्किल वक़्त में खुद को कटघरे में खड़ा करना और भी ज्यादा मुश्किल होता है. इस सब के बावजूद मुझे लगता है कि मीडिया वालों को अपने बारे में विचार करना चाहिए. उन्हें अपने से ये हिसाब माँगना चाहिए कि वो जब दूसरों से सवाल पूछते हैं तो कुछ ऐसे ही कड़वे कसैले सवालों का उनके पास क्या जवाब होगा? मीडिया में कई बरसों से रहते हुए भी मैं तथाकथित मेनस्ट्रीम मीडिया का हिस्सा नहीं बन पाया. इसमें मेरा अपना ही दोष ज्यादा है. अपना दोष इसलिए कि मैंने ख़बरों के लिए कभी सियासी लीडरों और अफसरशाहों का दरवाज़ा नहीं खटखटाया. मुझे लगता रहा कि खबर वो है जिसका जनम अपने आप होता है. वो सड़कों और चौराहों पर बिखरी पड़ी रहती है और उन्हें ही हम समेट कर एक साथ बहुत से लोगों तक पहुंचाते हैं. मुझे लीडरों की प्रेस कांफ्रेंसों का मतलब समझ में नहीं आता. हम वहां क्यों दौड़े चले जाते हैं और ख़ासतौर से प्रेस कांफ्रेंस में कही जाने वाली बातों पर गौर करने से ज्यादा खाने और उससे भी अधिक पीने की तरफ क्यों देखते हैं? क्या मीडिया वालों के लिए सरकार की बात को लोगों तक पहुंचाना ज्यादा ज़रूरी है या फिर लोगों की बात सरकार तक!

एक और बात हम मीडिया वाले अक्सर भूल जाते हैं. हमें शेख़ चिल्ली की दुनिया में रहने में मज़ा आता है. हम अपने इर्द गिर्द बहुत बड़ा भ्रम पाल लेते हैं. मिसाल के तौर पर हम अपने आपको आज़ाद मीडिया वाला कहते हैं. सच बोलने वाला कहते हैं लेकिन करते वही हैं जो कंपनी का मालिक हम से कहलवाना चाहता है. हम दूसरों से ईमानदारी चाहते हैं, मगर अपने लिए नहीं, क्योंकि ऐसी सूरत में हमें ना अपनी गाड़ी मिल पाएगी और ना ही हम अच्छे और पाश एरिया में मकान खरीद सकते हैं. हम रिश्वत और भ्रष्टाचार के खिलाफ तो बहुत लिखते हैं, लेकिन उसके दायरे में खुद को नहीं लाते. मीडिया वाले हक की बात भी बहुत करते हैं, लेकिन उस जगह के लिए नहीं जहाँ वो खुद काम करते हैं. यदि ऐसा नहीं होता तो हमें कभी ये खबर ज़रूर पढ़ने या देखने को मिल जाती कि फलां मीडिया हाउस की कैंटीन से बाल मजदूर आज़ाद कराए गए और फलां मीडिया हाउस के ड्राइवर केवल आठ घंटे की ही डयूटी करते हैं. हमें ये भी सुनने का मौक़ा मिलता कि मीडिया हाउसों में काम करने वालों को कभी प्रताड़ित नहीं किया जाता.

उत्तर प्रदेश की राजधानी में आईबीएन 7  के पत्रकार के साथ पुलिस ने जो दुर्व्यवहार किया वो निंदनीय तो है मगर कोई पहला वाक़या नहीं है. आजकल इसी चैनल में ऊँची पोस्ट पर विराजमान एक और पत्रकार के साथ इससे भी ज्यादा बुरा सलूक किया गया था. मैं दोनों घटनाओं से आहत हूँ. मुझे तब भी लगा था और आज भी लगता है कि मीडिया वालों के साथ इस सलूक में दूसरों की ग़लती के साथ साथ अपनी भी ग़लती कम नहीं होती. लड़कियों के साथ छेड़छाड़ और उनकी इज्ज़त लूटने की जो घटनाएं उत्तर प्रदेश में हो रही हैं, उन्हें किसी भी स्तर पर और किसी भी समाज में ठीक करार नहीं दिया जा सकता. इसलिए मीडिया अगर ऐसे सवालों को उठाता है तो ये अच्छी बात है. लेकिन, ज़रा ठहरिये! और सोचिये कि उत्तरप्रदेश में ये सब बस पिछले कुछ ही महीनों से हो रहा है, या इसका सिलसिला बहुत दिनों से चला आ रहा है. ये क़ानून व्यवस्था की बात है या समाज के गिरते स्तर की. इसके साथ ही ये भी जानना होगा कि मीडिया जागा है या उसे जगाया गया है क्योंकि उत्तरप्रदेश में अगले कुछ ही महीनों में इलेक्शन होने वाले हैं.

कहते हैं सच्ची बात कड़वी होती है, मेरी बात भी सच्ची और कड़वी है. कम से कम मैं मीडिया और ख़ासतौर से मीडियाकर्मियों को जितना जान पाया हूँ उसका सार यही है कि भारत के सभी नहीं तो बहुत से मीडियाकर्मी आज भी अपने हक से वंचित हैं और वो दुनिया जहान की बातों को जानने और उन्हें लोगों तक पहुंचाने के बावजूद खुद अपनी तथा अपने ही घर की खबर नहीं होती. उन्हें अपने मौजूदा भ्रम से खुद को और अपने साथियों को निकालना होगा तभी शायद देश में मीडिया और मीडिया वालों की हालत बदलेगी वरना हम केवल प्रेस कांफ्रेंस में खाने पीने और मार खाने वाले बन कर रह जाएंगे. सियासत वाले बड़ी मोटी चमड़ी के होते हैं, उन्हें किसी बात से कोई फर्क नहीं पड़ता.

लेखक अफसर फरीदी ब्‍लॉगर हैं तथा दिल्‍ली में पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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