कांग्रेस के लिए इससे अच्छी खबर शायद कुछ और नहीं हो सकती थी. संघ के प्रचारक इन्द्रेश कुमार का नाम अजमेर धमाके में आने के बाद से राहुल गाँधी के उस बयान को बल मिल गया है जिसमे संघ की तुलना सिमी से की गई थी. इस बयान के बाद संघ खेमे में बैचेनी फ़ैल गई थी. संघ के बड़े पुरोधा राहुल को जबाब देने की योजना बनाने में जुटे थे कि अजमेर विस्फोट की खबर आ गई. इसके बाद संघ और बीजेपी के नेता बचाव की मुद्रा में आ गए. कांग्रेस का एक बड़ा तबका अब संघ पर प्रतिबन्ध लगाने की वकालत करने लगा है. इन लोगों को लग रहा है कि मुलायम सिंह ने मुसलमानों को लुभाने के लिए जो चाल चली थी, राहुल ने एक झटके से उसका जबाब दे दिया है. अब अगर संघ पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया तो मुसलमान एक झटके से कांग्रेस से जुड़ जायेगा.
दरअसल, अयोध्या फैसले के आने से पहले से ही कांग्रेस बेहद परेशान थी. कांग्रेस को लग रहा था कि अगर इस फैसले के बाद देश में सांप्रदायिक तनाव की स्थिति पैदा हुई तो इसका ठीकरा कांग्रेस के सर पर ही फोड़ा जायेगा. उधर बीजेपी को लग रहा था कि सत्ता पाने का यह आखिरी दांव है. उसको लग रहा था कि अगर राम मंदिर निर्माण के नाम पर देश भर में पहले जैसा माहोल बन गया तो उसकी बल्ले बल्ले हो जाएगी. मगर अयोध्या फैसले ने इस उम्मीद पर पानी फेर दिया. पूरे देश ने इस फैसले के बाद जिस तरह का सन्देश दिया उससे कट्टरपंथी नेताओं के माथे पर पसीना ला दिया. इन लोगों को लगने लगा कि अगर देश में ऐसे ही माहौल रहने लगा तो इन लोगों की दुकान ही बंद हो जाएगी. तब सबने अपने अपने तरीकों से इससे निपटने की तरकीबें सोची.
शुरुआत मुलायम सिंह ने की. उन्होंने कहा कि इस फैसले से मुसलमान मायूस है. अदालत का फैसला संविधान से नहीं बल्कि आस्था के आधार पर दिया गया है. यह बयान एक बहुत बड़े खतरे की शुरुआत था. मुलायम सिंह को लग रहा था कि इस बयान के बाद आम मुसलमान में उत्तेजना फैलेगी. सडकों पर संघर्ष होगा. इसके बदले में संघ और विहिप जैसे लोग भी सामने आयेंगे और सांप्रदायिक धुव्रीकरण के चलते उनकी राजनीति चलने लगेगी. मुलायम को यह भी लग रहा था कि इस बयान के बाद वह मुसलमान जो कल्याण सिंह के साथ की वजह से उनसे दूर चला गया था वह वापस लौट आएगा. मगर मुलायम सिंह का यह दांव उल्टा पड़ गया. यह तो हकीकत थी कि यह फैसला आस्था पर ही आधारित था. पर मुसलमानों को अब हकीकत भी समझ आ गई थी. वह देख चुके थे कि जिस व्यक्ति के कहने पर उन्होंने सालो तक एकमुश्त वोट दिया उसने सत्ता पाने के लिए उस आदमी से समझौता कर लिया जो बाबरी मस्जिद गिराने का सबसे बड़ा दोषी था. वह यह भी समझ गए थे कि इस विवाद का इससे बेहतर इलाज नहीं हो सकता था कि सारी जगह को तीन हिस्सों में बांट दिया जाये.
मुस्लिम समाज भी अब इन सब बातों को समझ गया था. आम मुसलमान भी नहीं चाहता था कि इस मुद्दे पर विवाद हो. लिहाजा उसने मुलायम सिंह की अपील से ज्यादा तवज्जो हाशिम अंसारी की कोशिशों को दी. यह इस देश में परिवर्तन की लहर थी. इसने सभी राजनैतिक दलों के अरमानों पर पानी फेर दिया. इसी बीच बीजेपी को लगा कि अगर यह मुद्दा इसी तरह शांत हो गया तो उनकी सत्ता में आने की चाहत हमेशा के लिए अधूरी रह जाएगी. लिहाजा विहिप को आगे किया गया. अशोक सिंघल और तोगड़िया को संत समाज को जोड़ने की जिम्मेदारी दी गयी. मगर निर्मोही अखाड़े और संत ज्ञानदास ने इन लोगों को घास भी नहीं डाली. तब इन लोगों ने संत सम्मलेन करने का फैसला किया.
इस बीच विहिप की बढ़ती सक्रियता ने कांग्रेस को परेशान कर दिया. उसको लगा कि अगर बीजेपी ने विहिप और संघ के बहाने देश भर में उत्तेजना का माहौल बना दिया तो कांग्रेस को परेशानी हो जाएगी. तब कांग्रेस ने इसका जबाब देने की सोची. इसके बाद ही राहुल ने संघ की तुलना सिमी से कर डाली. इस बयान के बाद संघ में खलबली मच गई. गाँधी परिवार का कोई व्यक्ति इस तरह संघ पर हमला कर सकता है यह संघ सोच भी नहीं सकता था. सोच विचार के बाद संघ इस निष्कर्ष पर पंहुचा कि इस मामले को ज्यादा तूल न दिया जाये. मगर संघ के नेता भविष्य को ले कर चिंतित हो गए कि कहीं ऐसा हो न जाये. कांग्रेस को लग रहा था कि यह बयान आने के बाद मुलायम सिंह को भी करार जबाब मिल जायेगा और अगर कुछ मुसलमान उधर जा भी रहे होंगे तो वो रुक जायेंगे. मगर मुलायम सिंह के बयान पर तटस्थ रहने वाले मुसलमान इस बयान पर भी खामोश रहे. अलबत्ता उन्होंने कांग्रेस से जो सवाल पूछे उसने कांग्रेस को पसीने छुड़ा दिए. उन्होंने पूछा कि अयोध्या में ताला खुलवाने से लेकर शिलायान्यास करवाने तक केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी. तब कांग्रेस ने कोई सार्थक प्रयास क्यों नहीं किये? और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि अगर संघ और सिमी दोनों एक जैसे हैं तो प्रतिबन्ध सिर्फ सिमी पर ही क्यों? और अब अजमेर धमाके में संघ प्रचारक इन्द्रेश का नाम सामने आने के बाद यह सवाल और महत्व रखता है.
लेखक संजय शर्मा वीकेंड टाइम्स के संपादक हैं.

