जानी मानी पत्रकार मृणाल पांडे भारतीय मीडिया जगत की एक बड़ी शख्सियत हैं, लेकिन उनका एक और परिचय है, वह है अपने दौर की मशहूर साहित्यकार रहीं शिवानी की बेटी के रूप में। पर इधर मृणाल पांडे, अपनी मां शिवानी को अपने कुछ अनुभवों को लेकर उन्हें ज्योतिषी घोषित करने पर तुली हुई हैं। राष्ट्रीय सहारा के रविवासरीय उमंग नाम के परिशिष्ट में मृणाल के हवाले से उनके कुछ अनुभवों को आलेख की शक्ल में दर्ज किया गया है। मां के साथ अपने अनुभवों के आधार पर मृणाल, शिवानी की दिव्य दृष्टि का हवाला देते हुए उन्हें भविष्यवक्ता बता रहीं हैं। आलेख में मृणाल कहतीं, ‘आह! देखने में कितना सुन्दर और स्वस्थ लड़का है, कौन कह सकता है, लेकिन विधाता की लेखनी को कौन बदल सकता है?’ यह शब्द बोलकर मां शिवानी चुप हो गई। मैंने उनसे पूछा, ‘आप इस तरह क्यों कह रही हैं, इस प्रश्न पर मां ने अपनी जीभ काटी और बोली कि मुझे तो इसके स्वास्थ्य में कुछ गड़बड़ नजर आती है।’ मैं सहम कर बोली, ‘मां ऐसा मत कहो’, लेकिन मै अपनी मां की दिव्य दृष्टि से परिचित थी। ऐसे अनके वाकये हुए, जब उन्होंने किसी व्यक्ति से पहली बार मिलते ही कुछ महसूस किया, देखा और भविष्यवाणी कर दी। उनकी लेखनी पर जहां सरस्वती विराजती थी, वहीं उनकी वाणी पर भी भगवान की कृपा थी।
जैसा कि मैंने पहले भी अनुभव किया था, वैसा ही अब घटित हुआ। कुछ समय बाद उस लड़के की तबीयत खराब हुई। जांच में रक्त कैंसर निकला तथा कुछ ही समय बाद वह भगवान को प्यारा हो गया। इसी प्रकार की एक और घटना मुझे याद आ रही है। हमारे एक रिश्तेदार थे। काफी बड़ी उम्र तक वह अविवाहित रहे। एक दिन अचानक खबर मिली कि वह विवाह कर रहे हैं। लड़की उनसे उम्र में काफी छोटी थी। शादी के बाद वह अपनी पत्नी को लेकर मां के पास आये। मां ने उन्हें शुभकामनाएं दीं। कुछ देर बैठकर वह चले गए। मां के चेहरे में उदासी देखकर मैं पूछ बैठी, ‘क्या बात है आप उदास क्यों हैं? आपको तो खुश होना चाहिए। आखिर इनका घर बस गया।’ मां बोली, ‘घर तो बस गया लेकिन इसके कपाल पर दुःख ही दुःख नजर आता है। बहुत कष्ट का जीवन है।’ आखिर हुआ भी कुछ वैसा ही, कुछ दिनों बाद हमारे उन रिश्तेदारों की तबीयत बिगड़ गई। विवाह के बाद सुख के चार पल भी वह लड़की नहीं जी पायी।’
अगर मृणाल पांडे के मां शिवानी के साथ कुछ इस तरह के अनुभव रहे हैं तो क्या उन्हें किसी दिव्य दृष्टि प्राप्त साहित्यकार माना जाना चाहिए? इस तरह के अनुभव हर एक गली-मोहल्ले और नुक्कड़ों पर दुकान खोलकर भविष्य बांचने वालों के पास भी ढेर सारे हो सकते हैं। इन्हें छोड़ भी दिया जाय तो हर एक व्यक्ति के जीवन में ऐसे अनुभव सुनने को मिल जाएंगे, जो चाहे-अनचाहे जन्म कुंडली बांचने वालों के ही दर्शनीय कर्मकांडी पाखंड को मजबूती देते दिख जाते हैं। लेकिन जब मृणाल जैसा कोई चेहरा इस पाखंड को वैधता देता दिखता है तो वह एक बहस को जन्म देता है। इसका एक सिरा भारतीय समाज की दरिद्रता और उसके एक बड़े तबके के ईश्वरीय सत्ता के धार्मिक आधारों से सामाजिक स्तर पर सबसे निचले पायदन पर अटके होने के रूप में है, तो दूसरा इससे बाहर निकलकर वैज्ञानिक दृष्टि के रास्ते पर आगे बढ़ने का। सवाल यह भी क्या इस तरह के अनुभव ऐसे समय में मायने रखते हैं, जब हमारे दौर के जाने माने वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग इस तरह के किसी ईश्वरीय सत्ता या दिव्य दृष्टि को खारिज करते हुए उसकी कल्पना से ही इनकार करते हैं।
लेखक दीपक आजाद हाल-फिलहाल तक दैनिक जागरण, देहरादून में कार्यरत थे. इन दिनों स्वतंत्र पत्रकार के रूप में सक्रिय हैं.

