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तेरा-मेरा कोना

मेरा आत्‍ममुग्‍ध, अहंकारी, अधूरा नायक

वह युवा था। दिल में जोश। मन में अति उल्लास। उमंगें। तरंगें। कुछ करने की। बहुत कुछ कर गुजरने की। हर एक युवा की तरह। वह साईकिल पर चला करता। अपना गृहनगर गृहराज्य छोड़कर एक दूसरे शहर में बसा। साईकिल चला चलाकर इधर-उधर अपने भविष्य को संवारने के लिए तत्पर रहता। अपने आपको स्थापित करने की धुन। और कुछ समय बाद अचानक उसके बारे में सुना जाने लगा कि उसके योग कार्यक्रम से, उसके कपाल भाति, अनुलोम विलोम आदि प्राणायामों से जनता को बहुत फायदा होने लगा है। उसके कार्यक्रमों में भीड़ जुटने लगी। लोग बताने लगे कि उसके द्वारा प्रचारित व सिखाए जा रहे कार्यक्रमों से उन्हें किस कदर फायदा होने लगा है। वह एक युवा आईकॉन की तरह पनपने लगा। उसने अपनी संस्थाएं खोलीं। हाईटेक सिस्टम के साथ उसका कार्यक्रम आगे बढ़ा।

वह युवा था। दिल में जोश। मन में अति उल्लास। उमंगें। तरंगें। कुछ करने की। बहुत कुछ कर गुजरने की। हर एक युवा की तरह। वह साईकिल पर चला करता। अपना गृहनगर गृहराज्य छोड़कर एक दूसरे शहर में बसा। साईकिल चला चलाकर इधर-उधर अपने भविष्य को संवारने के लिए तत्पर रहता। अपने आपको स्थापित करने की धुन। और कुछ समय बाद अचानक उसके बारे में सुना जाने लगा कि उसके योग कार्यक्रम से, उसके कपाल भाति, अनुलोम विलोम आदि प्राणायामों से जनता को बहुत फायदा होने लगा है। उसके कार्यक्रमों में भीड़ जुटने लगी। लोग बताने लगे कि उसके द्वारा प्रचारित व सिखाए जा रहे कार्यक्रमों से उन्हें किस कदर फायदा होने लगा है। वह एक युवा आईकॉन की तरह पनपने लगा। उसने अपनी संस्थाएं खोलीं। हाईटेक सिस्टम के साथ उसका कार्यक्रम आगे बढ़ा।

वह योग सिखाता और लोकप्रियता पाता। धीरे-धीरे उसे लगा कि वह और भी बहुत कुछ कर सकता है। उसने एलोपैथी भी सीखी जितनी वह सीख सकता था। वह डॉक्टरों से सम्पर्क करता, बहस करता, उनके सवालों के जवाब देता और उन्हें यह भी समझाने में सफल होता कि भारतीय आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति एलोपैथी से कहीं बेहतर है,  क्योंकि एलोपैथी सिम्प्टम्स को ठीक करती है तथा भारतीय पद्धति सिस्टम को ठीक करती है। और जब सिस्टम ठीक रहेगा तो किसी भी बीमारी के सिम्प्टम्स ही पैदा नहीं होंगे। यह सही भी था और सही भी है। भारतीय चिकित्सा पद्धति इसी सिद्धान्त पर आश्रित है। यह परहेज पर आश्रित है। किसी बीमारी के होने पर शरीर में जो कुछ भी तत्व कम या ज्यादा हो जाते हैं,  जिनके कारण यह बीमारी जन्म लेती है उसे परहेज के द्वारा नियंत्रित करके ठीक करना ही आयुर्वेद का सिद्धान्त है। एलोपैथी की तरह इसमें दवा के साथ-साथ सभी कुछ खा लेने की सलाह नहीं दी जाती है। वह समझाता था। सैकड़ों डॉक्टर के बीच बहस करके उन्हें संतुष्ट कर सकने की क्षमता से पूर्ण वह दैनन्दिन अपने व्यक्तित्व का परिष्कार कर रहा था। प्रसन्न था और आत्ममुग्ध भी। हां, आत्ममुग्ध यानि अपनी सफलता पर फूले न समाना। जैसे-जैसे उसके कदम आगे बढ़े वह आत्ममुग्धता का शिकार होता दिख रहा था हालांकि अभी तक उसकी यह आत्ममुग्धता स्पष्टतः सामने नहीं आ पायी थी। उसने अपनी कई और संस्थाओं का और विस्तार किया। वह विस्तार पा रहा था। उसने अपने उत्पाद बनाने और बेचने शुरू किये। उसके उत्पाद लोकप्रियता की सीढ़ी चढ़ने लगे। लोग निरंतर उसके उत्पादों के क्रेता बनने लगे।

वह टीवी के विभिन्न चैनलों पर अपने उत्पादों का प्रचार नहीं करता बल्कि उसका नाम ही उसके उत्पादों के प्रचार के लिए पर्याप्त था और अपने चैनल के माध्यम से ही सुबह-सुबह अपनी योग कक्षाओं के साथ साथ अपने उत्पादों का प्रचार भी करता। उसके अपने तथा अन्य सभी उसके उत्पादों की ओर लोग दौड़ पड़े। वह खुश होता रहा। अब वह धीरे-धीरे सिद्ध करता जा रहा था कि आयुर्वेद में बहुत से रोगों का समाधान किया जा सकता है,  जिनका ऐलोपैथी में कोई इलाज नहीं है। कुछ ऐसे भी रोग हैं जिनका ऐलोपैथी में देर से इलाज है या तात्कालिक इलाज है,  लेकिन उस इलाज में नित्यता नहीं है लेकिन आयुर्वेद उन रोगों की चिकित्सा में भी सक्षम है। उसने इसके प्रमाण भी दिये। उस पर धीरे-धीरे आरोप भी लगे लेकिन वे सिरे से नकार दिये गये। आरोप लगाने वाले गलत सिद्ध हुए। इन सब बातों ने उसे और आत्ममुग्ध बना दिया। धीरे-धीरे वह सुबह-सुबह अपने चैनल पर अपने उत्पादों का प्रचार करते हुए अन्य कंपनियों के उत्पादों को कमतर सिद्ध करने लगा। वह अन्य कंपनियों के विभिन्न उत्पादों को कमतर कहने के लिए कभी-कभी तो उन्हें टॉयलेट क्लीनर तक कहने लगा। अण्डों को उसने विष्ठा तक कहा। उद्देश्य यही था कि लोग शाकाहारी बनें। अच्छा था। यह बात अलग है कि कोई अण्डे को शाकाहार में मानता है और कोई मांसाहार। ये सही है कि कंपनियां विशेषकर बाहरी कंपनियां यहां के नियमों को ताक पर रखकर यहां का कमाया हुआ पैसा अक्सर बाहर भेजती,  जिससे देश को नुकसान होता। लेकिन उनको सीधे-सीधे निशाने पर रखकर उसने धीरे हमला करना प्रारंभ किया।

उसके इस तरह के आरोपों का सामान्यतः कोई कुछ भी जवाब नहीं देता। अखबारों में मैने तो कम से कम कहीं नहीं पढ़ा कि इन कंपनियों के उत्पादों में कहीं कोई कमी आई हो। हां, उसके अपने उत्पादों की बिक्री जरूर बढ़ी। उसके इन आरोपों से गुप्त रूप से जरूर उसके कुछ शत्रु भी पनप गये होंगे। मैने उसके इन आरोपों में उसके अनुभव की कमी ढूंढी लेकिन कह नहीं पाया क्योंकि मैं भी उसके इस अभियान से प्रसन्न था। चलो,  कोई तो है जो इन से लोहा लेने के लिए आगे बढ़ा है। वह और आत्ममुग्ध होता चला गया। कहते हैं पैसा कमाना सरल है लेकिन उसे खर्च करना बहुत कठिन है। इसी तरह सफलता पाना सरल हो सकता है लेकिन उसे पचा पाना आसान नहीं। मुझे लगा कि क्या वह अपनी सफलता पचा नहीं पा रहा है? उसने परमतावलंबियों पर, सनातनधर्मियों पर कटाक्ष करने शुरू किये। लोग भड़क गये। कहा, माफी मांगों। उसने खेद व्यक्त कर दिया। उसने शंकराचार्य पर भी टिप्पणी की। जनता व संन्यासी जगत ने उसकी तीखी आलोचना की। उसको उसके अपने शहर के एक चौराहे पर स्थापित शंकराचार्य की मूर्ति पर माला डालनी पड़ी। मुझे दुख हुआ। लगा, क्या वह दिग्भ्रमित हो रहा है। क्या उससे सफलता संभल नहीं रही है? आखिर इस प्रकार क्यों वह खुद से जुड़ते लोगों को खुद ही अलग कर रहा है। जोड़ना ताकत बढ़ाता है और आरोप-प्रत्यारोप ताकत घटाते हैं। निश्चित रूप से आरोप प्रत्यारोप में उलझा आदमी और ऐसा आदमी जो अति महत्वाकांक्षी हो वह इन सब झमेलों में उलझकर अपनी शक्ति का ह्रास ही करता है।

मुझे दुख हुआ और लगा कि इस तरह से उसका कार्य कैसे चलेगा। धीरे धीरे सब सामान्य होता गया। कि फिर मैने कई बार उसे को आत्ममुग्ध होते देखा। वह भारतीय सनातन पद्धतियों का उपहास करता लेकिन धीरे-धीरे समझता गया कि इस देश में आस्था की जड़ें इतनी मजबूत हैं कि वह कभी भी लोगों  को उनकी आस्थाओं से दूर और अपने समाज की आस्थाओं के समीप नहीं ला पायेगा। धीरे-धीरे उसने यह सब बंद कर दिया और वह मंच पर बैठा अपना काम करता रहा। यह बहस का मुद्दा हो सकता है कि उस वेश में उसका क्या काम होना चाहिये था और क्या काम नहीं होना चाहिये था। खैर, समय बीतता गया और मैंने एक दिन देखा कि अपने प्रति लोगों का इस प्रकार प्यार उमड़ता देख और अपने व्यापार को इस तरह फैलता देख उसने महसूस किया कि वह इस देश में एक क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकता है। और उसने कुछ योजनाएं बनायी। उसे लगा कि इस देश में भ्रष्टाचार बहुत है। उसे लगा कि देश के बाहर काला धन बेहिसाब मात्रा में है। उसे लगा कि सिस्टम चरमरा गया है। उसने सोचा कि क्यों न मनुष्यों के शरीरों के सिस्टम को ठीक करने के साथ-साथ वह देश के भी सिस्टम को ठीक कर दे। वह आत्ममुग्धता का शिकार था। उसने सत्ता के खिलाफ बोलना शुरू किया। उसने भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलना प्रारंभ किया व सत्ता में बैठे लोग धीरे-धीरे उसके निशाने पर आते गये। उसके वाक्बाणों से आहत सत्तासीन लोग चुपचाप भला कैसे बैठते और वे भी धीरे-धीरे उसके कार्पोरेट व्यक्तित्व के खिलाफ खड़े हो गये।

वह योग शिक्षक था लेकिन कारपोरेट जगत का एक जाना माना नाम बनता जा रहा था। उसके सहयोगी भी इसमें पूर्ण रूप से उसके साथ थे। वह आदरणीय माना जाता। देश में उसकी कहीं भी उपस्थिति उस स्थान विशेष को चर्चा में ला खड़ा कर देती। लेकिन अब यह शुरुआत थी उसके निर्विवादित से विवादग्रस्त होने की। उसने सत्तासीनों को खुले आम चुनौती दी। उसने ललकारा तथा घोषणा की कि अगले चुनावों में वह सभी पांच सौ तैंतालीस सीटों पर अपने प्रत्याशी खड़े करेगा। उसके यह घोषणा करते ही मीडिया में वह एक दूसरे व्यक्तित्व के साथ छा गया। वह अब योगगुरू और कारपोरेट होने के साथ साथ राजनैतिक व्यक्तित्व का भी स्वामी होता दिखा। उसने आरटीआई के सहारे तथ्यों का अंबार लगाया। देश की जनता को बताया कि किस प्रकार देश को खोखला किया जा रहा है। उसने बताया कि देश के बाहर कितना काला धन पड़ा है जो कि वापस आना चाहिये। यह बात दूसरी है कि वास्तव में यह जानने लायक बात है कि बाहर कितना धन है। इस बारे में तथ्य अलग-अलग थे। उसने बताया कि देश में कितनी संपदा भूगर्भ में है और इसका आर्थिक मूल्य क्या व कितना है। उसे लगा कि यह सारी संपदा लूट कर इससे प्राप्त धन बाहर भेजा जा सकता है। उसकी आशंकाओं को निराधार कहना मूर्खता होगी क्योंकि यह देश वास्तव में अतुलित संपदा का स्वामी रहा है और लंबे समय से लुटता आ रहा है। सोने की चिड़िया जैसे देश में आज अस्सी प्रतिशत लोगों के प्रतिदिन बीस रूपये पर गुजारा किये जाने की बातों से हम अक्सर रूबरू होते हैं। उसने सोचा कि वह सब कुछ बदल देगा। यह खुशी की बात थी। कोई सामने आ रहा था कुछ परिवर्तन करने को। उसने इसे एक आंदोलन का स्वरूप देना शुरू किया।

आंदोलन से धीरे-धीरे ऐसा लगा कि देश वास्तव में आंदोलित होने लगा है। लोगों के बीच चर्चा होनी शुरू हुई। अचानक उसने एक बात कही कि उसकी अपनी कर्मभूमि की सरकार के एक मंत्री ने उससे दो करोड़ रूपये मांगे। राजनैतिक हलचल तेज हो गई। जनता की इच्छा हुई कि वह जाने कि आखिर ऐसी हिम्मत किसने की कि वह उसके जैसी बड़ी हस्ती से घूस मांगे। विपक्ष भी सक्रिय हुआ। नाम बाहर आना चाहिये कि अचानक एक दिन उसने बयान बदला कि उसकी बात का गलत मतलब निकाला गया। उसने यह नहीं कहा कि किसी मंत्री ने उससे घूस मांगी। अखबारों ने उसकी इस बात को पलटासन नाम दिया। वह अपने बयान से पलट गया था। मुझे दुख हुआ। मेरा एक नायक, जी हां, मैं उसमें अपने एक नायक को ढूंढ रहा था, मेरा वह नायक जिससे मुझे उम्मीद बंधी थी कि वह एक दिन परिवर्तन लाएगा, पलटासन कर बैठा। जनता ने आलोचना की। मैने भी मन ही मन आलोचना की। लोग हंसे। मैं भी मन ही मन हंसा। बाहर आलोचना की भी लेकिन दबे स्वर में। मुझे लगा मेरे नायक का व्यक्तित्व कमजोर पड़ रहा है। वह जिस आंदोलन को खड़ा कर रहा है उसकी नींव की ईंटें स्वयं ही निकाल रहा है। मैंने सोचा चलो कोई नहीं, अभी ज्यादा कुछ नहीं बिगड़ा है। कुछ दिनों बाद देश के एक प्रान्त में योग शिविर के समय एक पार्टी के एक भूतपूर्व सांसद ने उसे गाली दी। कहा कि आप इस प्रकार भ्रष्टाचार के खिलाफ नहीं बोल सकते। मैं तुम्हारा माईक छीन लूंगा। यू ब्लडी इंडियन। मैं यह कार्यक्रम देख रहा था। आस्था चैनल पर। उस स्थान पर बवाल हो गया। जनता उस सांसद को पीटने को तैयार हो गई। उसने मना किया तथा उस सांसद को बाहर कर दिया गया। अब मेरे नायक का क्रोध अपने चरम पर था और मन ही मन मेरा गुस्सा भी। क्या इस देश में वाकई भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलना जुर्म है। क्या वाकई हम ब्लडी इंडियन हैं। देश का ही एक भूतपूर्व सांसद देश के ही एक नागरिक को ब्लडी इंडियन कह रहा था।

मैं स्वयं हैरान था। ऐसा तो अंग्रेजों के समय में होता था। इस घटना के बाद मेरे नायक ने अपने अभियान को और गति दी। वह अब और संकल्पवान हो रहा था। मैं हैरान था कि इस विषय में मीडिया में भी ज्यादा चर्चा नहीं हुई। मीडिया ने भी इस घटना को ज्यादा तवज्जो नहीं दी। मुझे लगा कि क्या हम किसी विदेशी स्थान पर रहे हैं। बाहर इस देश के लोगों को रैड इंडियन, स्लम डॉग जैसे उपनाम दिये जाते हैं। हमें बुरा लगता है। क्या इस देश में भी ऐसा ही है। यह स्पष्टतः एक गाली थी। इस गाली ने मुझे जितना हैरान किया उससे ज्यादा हैरान मैं लोगों के अप्रतिक्रियाशील स्वभाव पर था। कोई खास प्रतिक्रिया न देख मुझे लगा कि क्या मेरे नायक के प्रति लोगों का विश्वास कमतर हो रहा है? आखिर ऐसा क्यों? लोग प्रतिक्रिया क्यों नहीं दे रहे। मैं थोड़ा डरा। लेकिन सोचा। कोई बात नहीं। सब ठीक हो जाएगा। क्रम फिर चल निकला। आंदोलन तेज होने लगा। योजनाएं बनायी जाने लगीं। योजना बनी कि देश जिलों में, राज्यों में क्रमशः प्रदर्शन होंगे। सरकार को ज्ञापन दिये जाएंगे और एक दिन सुनिश्चित किया जाएगा कि देश की राजधानी में एक रैली हो। कार्यक्रम हुए। सफलता से हुए। रैली हुई देश की राजधानी में। बेहिसाब भीड़ जमा हुई। बड़े-बडे़ व्यक्तित्व मंच पर आये। उद्घोषणाएं हुईं। सरकार के खिलाफ बिगुल बजाया गया। भाषण दिये गये। लगा कि अब बस क्रांति आने ही वाली है। वह कार्यक्रम संपन्न हो गया। अब मेरे नायक ने शंख फूंक दिया था। लगा कि धर्म और अधर्म के बीच लड़ाई प्रारंभ होने को है। अब मेरे नायक ने सत्तापक्ष में पदों पर बैठे लोगों को सीधे स्पष्ट शब्दों में नाम लिए बगैर चोर जैसे अपशब्दों से संबोधित करना शुरू कर दिया था। मैं सोच में पड़ गया। ऐसा क्यों। क्या यह उनके व्यक्तित्व को गिराने का प्रयास है या इससे मेरे नायक के व्यक्तित्व पर चोट पड़ रही है। मुझे घबराहट हो गई। मैं पेशोपश में पड़ गया। क्या मेरे नायक को ऐसा करना चाहिये? वे चाहे चोर हों लेकिन उन्हें सीधे चोर कहकर मेरा नायक अपने व्यक्तित्व की तो हानि नहीं कर रहा। मेरे मन में अजीबोगरीब सवाल उठने लगे।

मुझे एक बार फिर अपने नायक के आंदोलन की गंभीरता कम होती दिखी। इतने बड़े आन्दोलन के लिए आवश्यक गंभीरता का अभाव पनपता दिखा। लेकिन क्या करता। देखता रहा। सोचा, जब सरकार की तरफ से कोई प्रतिक्रिया ही नहीं आ रही है तो शायद सरकार डर गयी है। अपने नायक की तरह एक बार मैं भी गलत सोच रहा था लेकिन कहीं न कहीं यह बोध था कि मैं गलत सोच रहा हूं। खैर, कुछ दिन बाद देश के एक अन्य नायक जो पिछले बहुत वर्षों से इस देश के भ्रष्टाचार से लड़ता आ रहा था,  उसने तय किया कि वह अनशन करेगा और वह अप्रैल माह 2011 में अनशन पर बैठ गया। उसके अनशन पर बैंठते ही धीरे-धीरे वह हुआ जिसकी मेरे नायक ने व अन्य किसी ने भी कदाचित ही उम्मीद की थी। देश की जनता सड़कों पर आ गई और लोग भ्रष्टाचार के खिलाफ बैनर लेकर जन्तर मन्तर व जो जहां था वहीं पर सड़क पर निकल आये। पूरे देश में वह हुआ जिससे सरकार के साथ मन ही मन मेरा नायक भी हिल गया था। अनशन करने वाले इस जननायक के साथ सभी पार्टी हितों से निरपेक्ष रहकर जनता सड़कों पर उतर आयी थी। मेरा नायक भी दो दिन बाद वहां पहुंचा और उसने भी झंडा बुलंद किया। उसने भी भाषण दिया। उसमें भी उत्साह दिखा। लेकिन मैं उसके अंदर व्याप्त एक अनजाने भय को भांप नहीं पाया। वह अंदर ही अंदर डर रहा था और बाहर से निर्भय दिख रहा था। उसका डर था कि कहीं उसके द्वारा आरंभ किया गया एक आन्दोलन किसी और के हाथ न चला जाय।

अनशन पर बैठे जननायक की मांग थी कि भ्रष्टाचार के निवारक जनलोकपाल बिल को बनाया जाय तथा उसके अनशन समाप्त होने से पूर्व सरकार अधिसूचना जारी करे। सरकार अधिसूचना तो जारी नहीं कर पायी लेकिन एक कमेटी बना दी जो एक तय समयसीमा में इस बिल को पारित करती। उस कमेटी में जो सरकार के पांच व सिविल सोसायटी के पांच सदस्य रखे गये उनमें मेरे नायक का कहीं नाम नहीं था। मेरे नायक को बुरा लगा। उसके अहं ने उसे ललकारा और उसने सिविल सोसायटी के सदस्यों में एक पिता पुत्र की नियुक्ति होने को लेकर वंशवाद का आरोप लगा दिया। हल्ला हुआ। मेरे नायक को मनाया गया। वह फिर पलटासन कर गया। मेरे वक्तव्य को गलत लिया गया है। अपने नायक पर मुझे गुस्सा आया। लेकिन क्या करता। था तो वह मेरा नायक ही। लेकिन अब तक मेरा एक और नायक हो चुका था। वह जो जननायक था। अनशन करके जिसने जनता को सड़कों पर आने के लिए उत्साहित किया व सरकार की नींद उड़ा दी। मुझे लगा कि अब मेरे नायक में भी वह बात और सुदृढ़ता से आयेगी जो अब तक उसके पलटासनों व अगम्भीरता से मुझे दिखनी गायब होने लगी थी। जननायक का आन्दोलन खत्म हो चुका था। समिति बन चुकी थी कि समिति में सिविल सोसायटी के सदस्यों पर ही आरोप-प्रत्यारोपों का सिलसिला शुरू हो चुका था। सरकार के ईरादों पर शक होने लगा था। विरोधी सामने आने लगे। लेकिन फिर भी काम चलता रहा।

मेरे नायक ने फिर एक दिन अचानक घोषणा की कि वह 4 जून 2011 को दिल्ली में अनशन करेगा। तैयारी शुरू हो गई। रामलीला मैदान दिल्ली को किराये पर लिया गया। सरकार के अनुसार यह मैदान योग शिविर के नाम पर लिया गया। तीन जून को पालम एअरपोर्ट पर मेरा नायक उतरा तो उसकी अगवानी के लिए चार केन्द्रीय मंत्री गये। मेरे दूसरे जननायक ने आगाह किया कि मेरे नायक के साथ धोखा हो सकता है। मेरा नायक भोला भाला था। समझा नहीं। बराक ओबामा को जो अगवानी नहीं मिली मेरे नायक को मिली थी। समझ नहीं आया था। तीन की शाम को ही क्लेरिजेज होटल में मेरे नायक की मीटिंग सरकारी प्रतिनिधियों के साथ हुई। मेरा नायक साढ़े चार घण्टे की मीटिंग के बाद होटल से प्रसन्नमुख बाहर निकला और कह गया कि सरकार के साथ सकारात्मक बातें हुई हैं और सरकार ने नब्बे प्रतिशत मांगें मान ली हैं। अनशन शुरू हुआ कि इससे पूर्व ही मेरे नायक ने जननायक के बारे में फिर एक बार एक नई उलट बात कह दी। – उन्हें राजनैतिक मंच तो हमने ही दिया है। इस बार मैनें सिर पकड़ लिया था। मेरा आत्ममुग्ध नायक अहंकार की ओर बढ़ रहा था। मुझे लगा जैसे कि उसे लग रहा है कि किसी ने शायद पहले उसका बहुत कुछ लूट लिया था। मुझे लगा कि क्या मेरा संन्यासी नायक जो देश को सुधारने चला था वह ईर्ष्याग्रस्त हो चुका था। सुबह योग व बाद में अनशन शुरू हुआ। दिन भर भाषणबाजी होती रही। व्यापक व्यवस्था के बीच तमाम मीडिया के आकर्षण का केन्द्र बना रहा मेरा नायक। दिन में लगभग पचास हजार लोग अनशन पर। साथ ही देश के कोने कोने में जगह जगह लोग अनशन पर बैठे। मीडिया कवरेज लगातार जारी रहा।

शाम को पांच साढे़ पांच बजे। अचानक मेरा नायक पीछे गया और पांच मिनट बाद मंच पर आया। माईक संभाला। कहा – सरकार ने हमारी मांगें मान ली हैं। यह घोषणा होते ही सब तरफ हर्ष का वातावरण हो गया। और मेरे नायक की जय जयकार होने लगी। इसी के थोड़ी देर बाद टीवी पर सरकार के एक मंत्री प्रेस कांफ्रेन्स कर रहे थे। उनका कहना कि सरकार का तीन तारीख की शाम को ही मेरे नायक के साथ समझौता हो गया था तथा इस समझौते में मेरे नायक के निकटतम सहयोगी ने लिखकर कहा था कि चार की शाम को घोषणा कर दी जाएगी कि अनशन खत्म हो गया है और चार से छह तक तप होगा। यह लाईव टेलीकास्ट होते ही हंगामा मच गया और मैने पहली बार अपने नायक को हतप्रभ होते देखा। चेहरा उतरना क्या होता है यह मुझे तत्काल समझ आ गया। मेरे नायक ने अपने अनुयायियों को समझाया कि यह उनसे लिखवाया गया है तथा यदि वे यह न लिखकर देते तो कदाचित् उन्हें होटल के बाहर ही गिरफ्तार किया जा सकता था। अब पत्रकारों की प्रश्नवर्षा की बारी थी। मेरा नायक घिर सा गया था। प्रश्नवर्षा का तूफान उससे झेला नहीं जा रहा था। पूछा गया कि यदि पत्र पहले ही इच्छा अनिच्छा से लिखवा लिया गया था तो सुबह ही बताया क्यों नहीं गया? इस प्रश्न का कोई भी सुस्पष्ट उत्तर मेरा नायक दे ही नहीं पाया और प्रश्नों में घिर गया। अन्ततः उसने उद्घोषणा की कि अब अनशन जारी रहेगा और जब तक मांगें पूरी नहीं होतीं तब तक अनशन जारी रहेगा। मेरे नायक का कहना था कि सरकार ने पत्र को गोपनीय रखने का वादा किया था और चूंकि सरकार अपना वादा नहीं निभा पायी इसलिए वह भी अब अपनी बात पर नहीं रहेगा और अनशन मांग पूरी होने तक जारी रखेगा।

इस बार फिर मैं अपने नायक की नादानी पर दुखी था। मुझे लगा कि सब कुछ छिन्न भिन्न हो रहा है। क्यों उसने लोगों को सुबह ही नहीं बता दिया कि सरकार ने उसके साथ यह ज्यादती की है। यदि उसने पहले ही बता दिया होता तो सरकार के खिलाफ कम से कम लोगों के मन में अविश्वास एवं मेरे नायक के प्रति विश्वास ही जग गया होता। सरकार किसी दुध मुंहे बच्चे का नाम नहीं है कि वह इतने बड़े आंदोलन के लिए अतिरिक्त तैयारी के साथ नहीं आती। मेरे नायक को तो चार मंत्रियों द्वारा अगवानी के लिए आने पर ही सतर्क हो जाना चाहिये था। लेकिन मेरा नायक आत्ममुग्ध हो गया और बहकावे में आ गया। राजनीति के खेल से दूर राजनीति का शिकार मेरा नायक हठ कर चुका था कि अब अनशन जारी रहेगा। रात हुई। मैं सो गया। यह सोचकर कि अब आज की रात सरकार को तो नींद आने से रही। सुबह उठा और टीवी ऑन किया। मेरा शक सही निकला। सरकार रात को सोयी नहीं थी। अपने आप को बचाने की चिन्ता में और किसी के सपनों की चिता जलाने की चिन्ता में। सरकार रात को पूर्वनियोजित ढंग से जागती रही थी। मेरा नायक उचित नियोजन के अभाव में व राजनीति के छल कपट व सरकार के हठ से अनजान अपने हठयोग में मस्त सोया रहा। टीवी चैनलों पर खबरें जारी थी। आंदोलन को बलात कुचल दिया गया था। हाहाकार मचा था। मेरे नायक व उसके सहयोगी का पता तक नहीं था। मुझे तत्काल सरकार के एक मंत्री का एक बयान दिमाग में कौंध गया। उस सरकारी मंत्री ने कुछ समय पूर्व कहा था कि – मेरा नायक सरकार की शक्ति को पहचाने। मेरा नायक उस वाक्य को कोरी धमकी समझ बैठा था और आज खामियाजा भुगत रहा था। सब तरफ लोग त्रस्त नजर आ रहे थे। रात को लाठीचार्ज, अश्रुगैस अत्याचार सब कुछ हुआ। मैने अपने नायक को हांफते,  कूदते, कभी किसी के कंधे पर सवार देखा। उसने महिलाओं से आग्रह किया कि वे उसे चारों तरफ से घेरेंगी। फिर युवा और तब तमाम अन्य लोग। वह महिलाओं के घेरे में था कि अचानक गायब हो गया। मैदान में अश्रुगैस के गोलों से धुआं ही धुआं था। लोग गिड़गिड़ा रहे थे। स्टेज में आग लगी थी। मुझे लगा कि कोई फिल्म देख रहा हूं।

सुबह मैदान खाली था। लोग रो रहे थे। किसी की टांग, किसी के हाथ, किसी का कोई किसी का कोई अंग दुखन में डूबा था। टूट चुका था। यह हतप्रभ कर देने वाला दृश्य था। ऐसा मैंने तो पहले कभी नहीं देखा था। जब इमर्जेंसी लगी थी तब बहुत छोटा था। याद नही । टीवी पर बहसों का दौर जारी था। हर कोई हैरान। सरकारी पक्ष इसके इस दमन के पक्ष में व तमाम विपक्ष इस दमन के विपक्ष में कहने में मशगूल था। अचानक मुझे लगा कि मेरे नायक के सारे आंदोलन को एक राजनैतिक पार्टी ने पूरी तरह से हाईजैक कर लिया है। सरकार को इसी अवसर की तलाश थी। वह यही चाहती थी कि इस आंदोलन को पार्टी आधारित कर दिया जाये। देश की राजधानी में जगह जगह मेरे नायक के सक्रिय समर्थक मेरे नायक के बारे में पूछ रहे थे। टीवी पर अनेक तरह के कयास लगाये जा रहे थे। कोई कहता पुलिस के कब्जे में है। कोई कहता- नोएडा छोड़ दिया गया है। कुछ घण्टे बाद पता चला कि मेरा नायक स्त्रीवेश में अपने गृहराज्य के एक हवाई अड्डे पर उतार दिया गया है। मैं पहचान नहीं पाया। सफेद कपड़ों में। सलवार कुर्ता में। इससे पूर्व जब टीवी पर एक खबर आयी थी कि कुछ सूत्रों के अनुसार मेरा नायक स्त्री वेश में था तो मैनें मीडिया को बेवकूफ कहकर अपना गुस्सा कम किया। लेकिन अब सलवार कुर्ता? मैने सोचा, कुर्ता पाजामा है। लेकिन कुर्ते में कॉलर नहीं थे। मुझे लगा सलवार कुर्ता ही है। चुन्नी भी थी। मैं हतप्रभ था। मेरा नायक अपने काफिले के साथ अपने कर्मक्षेत्र पहुंचा दिया गया। वह रो रहा था और बता रहा था कि यदि वहां से न भागता तो उसकी हत्या कर दी जाती। उसे जला दिया जाता। वह पुलिस से रो रोकर अनुरोध कर रहा था कि लोगों को मत मारो।

उसने कहा कि वह अनशन जारी रखेगा। वह अनशन जारी रखेगा। उसने सब कहानी बताई। कहा कि नारी वेश में भागना मजबूरी थी। सरकार की साजिश में मरने से अच्छा अनशन करते हुए देश के लिए मरना है। इसलिए वह भागा। उसने कहा कि शिवाजी भी कई बार अलग अलग वेश में भागे थे। मन स्वीकार न कर पाया पर मन को मैंने समझाया। अब अनशन जारी था। लोग टीवी पर अपनी पीड़ाएं बताए जा रहे थे। इस दिन को सबके द्वारा काला दिन घोषित किया। मेरे दूसरे जननायक ने एक दिन का अनशन की घोषणा की। सरकार डर गयी। उसने जन्तर मन्तर पर अनुमति नहीं दी। राजघाट पर मेरे जननायक ने अनशन किया। लोग आये। फिर से वही भ्रष्टाचार विरोधी माहौल। लोग पूर्ववत तरह तरह के बैनर लेकर उपस्थित थे। खुश थे। सरकार का एक मंत्री कह रहा था कि सरकार के पास चार तारीख के आन्दोलन को इस तरह से समाप्त किये जाने के सिवाय कोई उपाय नहीं था। जगह योग शिविर के नाम पर ली गई थी और अनशन शुरू कर दिया गया था। इसलिए ऐसा किया गया। लेकिन रात में क्यों? जब लोग सोये थे। इसका सरकार के पास ढुलमुल जवाब था। क्योंकि अलोकतांत्रिक कार्यों पर किये गये प्रश्नों के जवाब ढुलमुल ही होते हैं। सरकार का डर स्पष्ट था। सुप्रीम कोर्ट ने नोटिफिकेशन जारी कर दिया था कि सरकार जवाब दे। दो सप्ताह का समय दिया गया।

इधर मेरे नायक का अनशन जारी था कि नौ तारीख को उसे अस्पताल ले जाना पड़ गया। तबीयत खराब हो चुकी थी। जौलीग्रांट अस्पताल, देहरादून। मीडिया का जमावड़ा। भीड़। नारे। समर्थक। मोमबत्तियां जलाते लोग। अनशन तुड़वाने की कोशिश करते सहयोगी साधु सन्यासी। और मेरे नायक द्वारा अनशन तोड़ने से इनकार। तबीयत बिगड़ती जा रही थी। केन्द्र सरकार के किसी भी मंत्री ने इस बारे में कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया था। वह मेरे नायक को ज्यादा महत्व नहीं देना चाहती थी। राज्य सरकार द्वारा मेरे नायक के कोमा में पहुंचने की सम्भावना जताई गई। इसे राजनीति बताया गया कि पार्टी विशेष इस मुद्दे पर राजनीति कर रही है। अन्ततः कुछ प्रतिष्ठित साधु सन्यासियों द्वारा बारह तारीख को अनशन तुड़वाया गया। सभी समर्थकों की जान में जान आयीं। मेरा यह नायक टूटा सा दिखाई दिया। वह सातवें दिन में ही टूट गया था। यह भी चर्चा का विषय बन चुका था। आखिर योगियों के बारे में तो कहा जाता है कि उनकी शारीरिक क्षमता बेहिसाब होती है लेकिन मेरा नायक तो सातवें ही दिन अस्पताल पहुंच चुका था। कहा गया कि वह योगी नहीं योग का व्यापारी था। मुझे उसकी स्थिति से भी कुछ कुछ ऐसा ही लगने लगा था। वह वस्तुतः टूटा क्योंकि अनशन पर था, दिन भर बोलता था और सरकार के द्वारा आन्दोलन को कुचल दिये जाने से बुरी तरह से मन से टूट चुका था। बदहवासी उसके व्यक्तित्व का हिस्सा बन चुका था। टूटे मन का तो स्वस्थ व्यक्ति भी बीमार पड़ जाता है। मेरा नायक तो बदहवासी की स्थिति में पहुंच चुका था। उसे सातवें दिन टूटना ही था।

ऐसा आजाद भारत में पहली बार हुआ था कि किसी आंदोलन को इस प्रकार से रातों रात कुचल दिया गया हो। उसे इसकी तो कतई उम्मीद नहीं रही होगी। उसके सहयोगी ने भी अनशन तोड़ दिया था। मैंने उसके लिए था का प्रयोग किया क्योंकि आंदोलन से पहले के और बाद के मेरे नायक में बहुत अंतर आ चुका है। केन्द्र सरकार ने उसके अनशन टूटने पर कहा कि यह खुशी की बात है कि उसने अनशन तोड़ दिया है। लेकिन केंद्र सरकार ने ज्यादा तवज्जो न देते हुए कोई प्रतिक्रिया व्यक्त करने से मना कर दिया है। आज चौदह जून को मेरा नायक अपने कर्मस्थल पतंजलि योगपीठ पहुंच चुका है। उसका शरीर तो थोड़ा संभल चुका है लेकिन मन शायद न संभला हो। स्वागत हुआ है। उसने कहा कि आंदोलन नये तरीके से जारी रहेगा। सरकार के एक मंत्री ने चार तारीख के दमन के बाद कहा था कि यह सभी के लिए एक सबक है। और मुझे लग रहा है कि सरकार ने मेरे दूसरे जननायक को भी धमकाने की कोशिश की है कि यदि वह भी दुबारा अनशन पर बैठा तो उसका भी वही हश्र होगा। यह लोकतांत्रिक तानाशाही है। लेकिन मेरा जननायक इतना कमजोर नहीं। सरकार का इरादा उसके इस आंदोलन को भी किसी पार्टी विशेष से संबद्ध कर इसके आंदोलन को फेल कर देने का है।

वह इसके लिए निरंतर बयानबाजी कर उसे भटकाने की कोशिश कर रही है। लेकिन वह इतनी जल्दी विफल नहीं होने वाला है। क्योंकि वह मिट्टी से जुड़ा है। क्योंकि वह वर्षों से सरकारी विभागों की राजनीति व राजनीति के सरकारी हथकण्डों से भलीभांति परिचित है। वह मेरे नायक की तरह आत्ममुग्ध नहीं, संचयप्रेमी नहीं, महत्वाकांक्षी नहीं बल्कि सचमुच मानवसमाज की निरपेक्षभाव से सेवा करने का आकांक्षी है। वह मेरे नायक की तरह बोलकर तोलने वाला नहीं बल्कि तोलकर बोलने वाला है। और उसके इसी संतुलित व्यक्तित्व से यह भ्रष्टाचार कर करके असंतुलित हो चुकी सरकार व इसके नुमाइंदे परेशान हैं। मैं इस उम्मीद के साथ बहुत खुश हूं कि भले ही मेरा नायक अब वैचारिक वनवास पर चला गया है और कुछ समय बाद इस वनवास से लौट आएगा और अपने अधूरेपन को खत्म करेगा। लेकिन मेरा यह जननायक और उसके नुमाइंदे पूरी तरह मुस्तैद हैं और चार जून की रात की रामलीला मैदान में मेरे नायक के आंदोलन के दमन से मेरा नायक कितना सीखेगा यह तो उसके वैचारिक वनवास से लौटने के बाद ही पता चलेगा,  लेकिन मेरा यह जननायक जरूर अपने अनुभव को और विस्तार देगा और अपने मुकाम पर जरूर पहुंचेगा।

अंतिम पंक्तियां इन शब्दों के साथ कि मेरा नायक भी जल्द वैचारिक वनवास से लौटे और मेरे जननायक के अनुभव से सीखकर ही अपने अभियान को आगे ले जाये। इधर खबर है कि हरिद्वार में गंगा नदी में हो रहे अवैध खनन के विरोध में सौ से ज्यादा दिनों से अनशन पर बैठा लेकिन वर्तमान में उसी जौलीग्रांट हॉस्पिटल में जहां मेरा नायक था कोमा में रहते हुए स्वामी निगमानंद का देहांत हो चुका है । उसकी खोज खबर लेने वाला, अनशन तुड़वाने वाला कोई नहीं था क्योंकि हाईप्रोफाईल होना भी तो कुछ होता है। इस पर फिर कभी …

लेखक डा. द्विजेन्‍द्र वल्‍लभ शर्मा देहरादून के निवासी हैं.

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