Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

तेरा-मेरा कोना

मेरे सामने बैठा पीएम मुझसे लोन मांग रहा

अंचल सिन्‍हा : मेरी विदेश डायरी -3 : वे सज्जन उगांडा के पास के एक छोटे से देश बुरुंडी के प्रधानमंत्री जे बी वालिसिंबी थे : लोन देने वाले को एक से दो माह की ही कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ती है : उगांडा में मेरा एक महीना पूरा हो गया है। कल मैं एक वित्तीय संस्था के काम काज का जायजा लेने कंपाला शहर के उसके ऑफिस में बैठा था। यह कंपाला में अकेली कंपनी नहीं है, जो आम और खास लोगों को वित्तीय मदद देती है। यहां कम से कम पांच ऐसी कंपनियां हैं। कहने को तो यह एक माइक्रोफाइनैंस कंपनी है, पर इसका और इस जैसी तमाम कंपनियों को कंपाला सिटी काउंसिल निबंधन करता है और मनी लेंडिंग के नाम पर लाइसेंस भी देता है। कंपाला सिटी काउंसिल उगांडा सरकार का वह विभाग है जिसके पास शहर के पूरे प्रशासन का जिम्मा होता है। मनी लेंडिंग करने के लिए यहां कानूनी मान्यता है और उगांडा के न्यायालय और पुलिस प्रशासन मनी लेंडिंग करने वाली सभी कंपनियों को पूरी मदद देते हैं।

अंचल सिन्‍हा : मेरी विदेश डायरी -3 : वे सज्जन उगांडा के पास के एक छोटे से देश बुरुंडी के प्रधानमंत्री जे बी वालिसिंबी थे : लोन देने वाले को एक से दो माह की ही कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ती है : उगांडा में मेरा एक महीना पूरा हो गया है। कल मैं एक वित्तीय संस्था के काम काज का जायजा लेने कंपाला शहर के उसके ऑफिस में बैठा था। यह कंपाला में अकेली कंपनी नहीं है, जो आम और खास लोगों को वित्तीय मदद देती है। यहां कम से कम पांच ऐसी कंपनियां हैं। कहने को तो यह एक माइक्रोफाइनैंस कंपनी है, पर इसका और इस जैसी तमाम कंपनियों को कंपाला सिटी काउंसिल निबंधन करता है और मनी लेंडिंग के नाम पर लाइसेंस भी देता है। कंपाला सिटी काउंसिल उगांडा सरकार का वह विभाग है जिसके पास शहर के पूरे प्रशासन का जिम्मा होता है। मनी लेंडिंग करने के लिए यहां कानूनी मान्यता है और उगांडा के न्यायालय और पुलिस प्रशासन मनी लेंडिंग करने वाली सभी कंपनियों को पूरी मदद देते हैं।

मजेदार बात यह है कि छोटी अवधि के लिए ये संस्थाएं जो मदद देती हैं, उसके लिए अपने मनमाने तरीके से ब्याज वसूलती हैं। मैं जिस कंपनी की जांच कर रहा था, वहां आम तौर पर तीन तरह के ब्याज दर हैं। सांसदों के लिए, बैंकों में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए अलग और दूसरे लोगों के लिए अलग। सबसे कम ब्याज दर 10 फीसदी प्रतिमाह का है, जिसका लाभ सांसदों को मिलता है। कुछ कंपनियां तो 12 और 13 फीसदी प्रतिमाह की दर से ब्याज लेती हैं। इससे भी ज्यादा यहां एक और बात नोट करने लायक है। यहां के राजनीतिज्ञ बिल्कुल सामान्य जनता की तरह इन कंपनियों में जाते हैं और कंपनी के मालिकों के सामने हाथ जोड़कर बैठे रहते हैं और महीने दो महीने के लिए लोन लेकर अपना काम करते हैं। इसके अलावा अगर कंपनी चाहे तो तो वह अफ्रीकी यूनियन के किसी भी देश के किसी नागरिक या राजनेता को लोन दे सकती है।

कल मैं जिस कंपनी की जांच के लिए उगांडा के पार्लियामेंट एवेन्यू में बैठा था, वहां मेरी मेज के ठीक सामने एक प्रभावशाली से दिखने वाले एक व्यक्ति आए और मुझे नमस्ते करते हुए अपने लिए दस मिलियन उगांडा शिलिंग के लोन के लिए बात करने लगे। शायद उन्हें लगा होगा कि मैं कंपनी का कोई मुलाजिम हूं। मैंने उनका परिचय जानना चाहा तो उन्होंने अपना कार्ड दिया। वे सज्जन उगांडा के पास के एक छोटे से देश बुरुंडी के प्रधानमंत्री जे बी वालिसिंबी थे। असल में वे इस कंपनी के प्रबंध निदेशक, जो मूलतः भारतीय हैं, के निजी मित्रों में से एक हैं। मैं समझ नहीं सका कि कैसे मेरे सामने एक देश का प्रधानमंत्री बैठा है। न कोई प्रोटोकाल, न ही कोई सुरक्षा कर्मी न कोई और तामझाम। हालांकि पूर्वी अफ्रीका के ये देश भारत के एक छोटे राज्य जैसे ही हैं, पर क्या भारत के किसी राज्य के मुख्यमंत्री को आप सामान्य आदमी की तरह घूमते पा सकते हैं ?

इस कंपनी ने उगांडा के लगभग 60 सांसदों को 10 फीसदी मासिक ब्याज पर लोन दिया हुआ है। बिल्कुल सामान्य आदमी की तरह ये सांसद कंपनी में आते हैं, अपनी कार की लौगबुक या अपनी जमीन के कागज गिरवी रखते हैं और 1 मिलियन से 10 मिलियन उगांडा शिलिंग की राशि बतौर लोन लेकर चले जाते हैं। इस पूरी औपचारिकता में बमुश्किल 15 मिनट का समय लगता है। ये सारे लोन ज्यादा से ज्यादा 6 माह के लिए दिए जाते हैं। पर ज्यादातर लोग 2 महीने में ब्याज समेत पैसे वापस कर देते हैं। मैंने देखा कि यहां कानून का अनुपालन पूरी गंभीरता से किया जाता है। अगर आपने अपने आवेदन में यह लिखा है कि लोन नहीं देने की स्थिति में लोन देने वाला उसकी कार या उसका प्लॉट बेचकर अपनी राशि मयब्याज वसूल सकता है तो इसकी पूरी कानूनी वैधता है।

इस प्रक्रिया में लोन देने वाले को एक से दो माह की ही कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ती है और 99 फीसदी मामलों में कानून लोन देने वाली कंपनी के पक्ष में ही फैसला देता है। इसलिए ऐसे वित्तीय संस्थाओं को फलने फूलने में देर नहीं लगती। भारत में बैंकों को कानूनी प्रक्रिया में सालों तक इंतजार करना होता है और बैंक लाखों रुपये खर्च करने के बाद भी विश्वास नहीं कर पाते कि फैसला उनके ही पक्ष में होगा। इसके अलावा भारत में पुलिस के लोग इस या उस कारण से बैंकों के साथ कितना जाते हैं, यह भी सर्वविदित है। ऐसा नहीं है कि उगांडा में अधिकारी पैसे नहीं खाते, वे भी घूस की रकम पचाने में उतने ही तेज हैं, जैसे अपने देश में। पर वे धन वसूली के समय मनी लेंडरों से पैसे लेते हैं और उनका पूरा साथ भी देते हैं।
असल में उगांडा में अभी तक मनीलेंडिंग को ही माइक्रोफाइनैंस की तरह मानने की लोगों की आदत है। यहां के केंद्रीय सरकारी बैंक, बैंक ऑफ उगांडा ने अब जाकर माइक्रोफाइनैंस को गंभीरता से लिया है और अब वे लोग अपने कानूनों में सुधार करने की कोशिश कर रहे हैं। इसलिए हो सकता है कि आने वाले कुछ महीनों में इसका कोई नया प्रारुप तैयार हो सके।

लेखक अंचल सिन्हा बैंक के अधिकारी रहे, पत्रकार रहे, इन दिनों उगांडा में बैंकिंग से जुड़े कामकाज के सिलसिले में डेरा डाले हुए हैं. अंचल सिन्हा भड़ास4मीडिया पर अपनी विदेश डायरी के जरिए समय-समय पर उपस्थित होते रहेंगे.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You May Also Like

मेरी भी सुनो

अपनी बातें दूसरों तक पहुंचाने के लिए पहले रेडियो, अखबार और टीवी एक बड़ा माध्यम था। फिर इंटरनेट आया और धीरे-धीरे उसने जबर्दस्त लोकप्रियता...

राजनीति-सरकार

मोहनदास करमचंद गांधी यह नाम है उन हजार करोड़ भारतीयों में से एक जो अपने जीवन-यापन के लिए दूसरे लोगों की तरह शिक्षा प्राप्त...

साहित्य जगत

पूरी सभा स्‍तब्‍ध। मामला ही ऐसा था। शास्‍त्रार्थ के इतिहास में कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि किसी प्रश्‍नकर्ता के साथ ऐसा अपमानजनक व्‍यवहार...

मेरी भी सुनो

सीमा पर तैनात बीएसएफ जवान तेज बहादुर यादव ने घटिया खाने और असुविधाओं का मुद्दा तो उठाया ही, मीडिया की अकर्मण्यता पर भी निशाना...