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मोदी सरकार : गैरों पे करम, अपनों पे सितम! श्रम कानून सख्त करो

मोदी सरकार श्रम कानूनों में बदलाव करने जा रही है और इस बदलाव के कारण किसी को नौकरी से निकालना आसान हो जाएगा। वो भी बिना छंटनी मुआवजा दिए किसी की भी छंटनी कर दी जाएगी. प्राइवेट सेक्टर में यूनियन नहीं बन पाएगा और ना ही मांगों को लेकर हडताल होगा। मैं तो कहता हूं कि नरेन्द्र मोदी जी श्रमिक विरोधी कानून बनाने से पहले एक बार पास के ही किसी मजदूर कॉलोनी का भ्रमण कर ले। मेरा दावा है इसे देखने के बाद या तो उन्हें खुद से घृणा हो जाएगी या ………. जाने भी दो।

मोदी सरकार श्रम कानूनों में बदलाव करने जा रही है और इस बदलाव के कारण किसी को नौकरी से निकालना आसान हो जाएगा। वो भी बिना छंटनी मुआवजा दिए किसी की भी छंटनी कर दी जाएगी. प्राइवेट सेक्टर में यूनियन नहीं बन पाएगा और ना ही मांगों को लेकर हडताल होगा। मैं तो कहता हूं कि नरेन्द्र मोदी जी श्रमिक विरोधी कानून बनाने से पहले एक बार पास के ही किसी मजदूर कॉलोनी का भ्रमण कर ले। मेरा दावा है इसे देखने के बाद या तो उन्हें खुद से घृणा हो जाएगी या ………. जाने भी दो।

अभी सितम क्या कम है
अभी कंपनियों के सितम कुछ कम नहीं है। श्रम न्यायधीश और श्रम अधिकारी सबसे भ्रष्ट हैं। श्रम विभाग में जाए सबसे ज्यादा ठेका श्रमिकों के विवाद आते हैं या वेतन भुगतान को लेकर। चूंकि श्रम विभाग को किसी का ठेका रद्द करने का अधिकार होता है इसलिए ठेकेदार हर माह श्रम विभाग की खतिरदारी करता है और इसमें श्रमिकों का ही पेट मारा जाता है। फिर बात आती है वेतन भुगतान को लेकर श्रम इंस्पेक्टर को यह अधिकार है कि महीने की 6 तारीख को वेतन ना मिलने की दशा में वह मूल वेतन में 10 गुना जुर्माना लगाकर श्रम न्यायालय प्रकरण भेज देता है। और श्रम न्यायाधीश इसे हू ब हू मान लेता है। लेकिन यदि कोई श्रमिक खुद वेतन भुगतान का मामला कोर्ट में डाले तो श्रम न्यायाधीश स्वविवेक का इस्तेमाल कर 10 गुना तो दूर मूल वेतन भी रो गाकर दिलाता है। शेष वेतन खुद घूस के रूप में ले लेता है। जबकि श्रम कानून में न्यायधीश को यह अधिकार नहीं है कि वह जुर्माने में छूट प्रदान करें लेकिन यहां कोर्ट के बारे में कोई जानता नहीं। अवमानना कानून को आतंकवाद से बढ़कर माना जाता है। और शिकायत करने पर अधिकारी कहते हैं कि वह तो जज का स्व विवेकाधिकार है। अरे भाई साहब ये कैसा विवेकाधिकार है भ्रष्टाचार करने के लिए? या स्वयं को लाभ पहुंचाने के लिए।

अब बात आती है नौकरी से निकालने के मुद्दे पर। नौकरी से निकाला है इसके लिए आस सीधे श्रम न्यायालय नहीं जा सकते। पहले श्रम विभाग जाना पड़ेगा और 45 दिन उसके कार्यवाही का इंतजार करना पड़ेगा। और श्रम विभाग श्रमिक को घुमाता रहेगा क्योंकि औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत कार्यवाही करने का उसे अधिकार ही नहीं। अब मामला एक साल बाद श्रम न्यायालय जाएगा जहां श्रमिक को अपना केस खुद  लडऩा पड़ता है। और अंत में जज स्व विवेकाधिकार का उपयोग करते हुए सिर्फ नौकरी देने का आदेश देता है। अवैधानिक बर्खास्त अवधि का वेतन यह कहकर नहीं दिलाता कि नो वर्क नो पे। जबकि औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 17 ख में स्पष्ट लिखा है कि बर्खास्त अवधि का भी वेतन देना होगा। लेकिन जज नियोक्ता को अवैधानिक लाभ पहुंचाने के लिए स्व विवेकाधिकार का गलत उपयोग करता है। अब इसके खिलाफ शिकायत करोगे तो अज्ञानी जांच अधिकारी भी यही कहेगा कि नो वर्क नो पे। अरे आपने कानून का उल्लंघन करने के आरोप में नियोक्त को सजा क्या दी?

हर गलती माफ है
नियोक्ताओं को हर गलती माफ है। कोई टैक्स चोरी करें, अवैधानिक काम करें तो सरकार उसे ऐसे परिभाषित करती है मानों उसने बहुत बड़ा अपराध कर दिया। लेकिन नियोक्ता श्रमिक को पीएफ ना दे, हक मारने के लिए नियुक्ति पत्र ना दे, हाजरी रजिस्टर ना रखे तो इसके लिए महज एक हजार का जुर्माना लगता है। और अधिकांश बार जज उन्हें माफ कर देता है कि यह तो कानून की पालन करने की बात कर रहा है। अब इसे मोदी सरकार वैध बना रही है। जबकि कानून और सख्त बनाने चाहिए।

कंपनियों को छूट क्यों?
कंपनियां देश का सबसे बड़ा अहित कर रही है। अब तक कंपनियों के ऊपर 5 लाख करोड़ का कर्ज है और यह ऐसा कर्ज है जिसे बैंक वसूल नहीं कर सकते। तो समझ सकते हैं कि कुछ उद्योगपति भारतीय अर्थव्यवस्था को किस तरह घुन की भांति खा रहे हैं। एक उद्योगपति करता क्या है, बैंक से लोन लेकर कंपनी खड़ा करता है। यहां सबकुछ सहयोग सरकार देती है। फिर उसी से खुद कमाता खाता है और अंत में वह कंपनी डिफाल्टर घोषित हो जाती है। अब बैंकों को इतना भी अधिकार नहीं कि एक उद्योगपति के दूसरे फर्म को नीलाम कर सके या कर वसूल सके। ऐसा कर्ज लेकर तो कोई भी कंपनी खड़ा कर लेगा और सरकारी पैसे से मौज करेंगा। जब कर्ज चुकाने की बारी आएगी तो कह देगा कि भैया कर्ज नहीं चुका पाऊगा आप कंपनी नीलाम कर लो। अब भूमि सरकार की, ढांचा दो रूपए का. मशीने गायब हैं तो बैंक क्या नीलाम करेंगी।

श्रम कानून और सख्त हो
श्रम कानून श्रमिकों की रक्षा के लिए बनते हैं। चूंकि सरकार की यह जिम्मेदारी होती है कि हर नागरिक को रोजगार मिले। कोई भूखा ना बैठे और किसी को रोजगार मिल गया तो उसे नौकरी से ना हटाया जाए। क्योंकि इससे ना सिर्फ एक परिवार का बजट बिगड़ता है अपिंतु देश की अर्थव्यवस्था डामाडोल होती है। और देश पर भार पड़ता है। होना तो यह चहिए कि सरकार कंपनी से पूछे कि हम आपको यह सुविधा दे रहे हैं तो आप हमारे कितने लोगों को रोजगार देंगे। हर वर्ष श्रम कानूनों के मुताबिक 12 प्रतिशत नए लोगों को रोजगार देंगे या नहीं। यदि किसी श्रमिक के साथ कंपनी का विवाद होता है तो उसे श्रम विभाग एक हफ्ते में निपटाए। श्रमिक को कंपनी में कार्य को लेकर प्रताडि़त ना किया जाए। किसी को नौकरी से निकालने पर श्रम विभाग एक माह में निपटारा करें। और विवाद चलने तक उसकी नौकरी बनी रहे। वेतन भुगतान के मामले एक हफ्ते में निपटे। लेकिन श्रम न्यायालय में फैसले ही 100 साल बाद आते हैं और वह भी जज की भ्रष्टाचार के भेंट चढ़ जाते हैं। मैं जानना चाहता हूं कि आखिर उद्योगपति सरकार को ऐसा क्या लाभ देते हैं जिससे सरकार उनके आगे झुकती है। बमुश्किल 5 करोड़ लोगों को भी ठीक से रोजगार नहीं दे पाती प्राइवेट कंपनियां। ऊपर से शोषण और अन्याय अलग से करती हैं। और जनता का पैसा खाकर भाग जाती हैं।  यही सुविधा यदि सरकार किसानों को दे तो देश की आधी अर्थव्यवस्था सुधर जाए।

महेश्वरी प्रसाद मिश्र
पत्रकार
[email protected]

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