मौत बिकती है बोलो खरीदोगो? आइये नजर डालते हैं समाज में बिक रही उन नशीली मौतों पर जो खुले आम बेची जा रही है, ऐसी मौत जो ना किसी बन्दूक की गोली से ना किसी हादसे से होती है बल्कि जो खुद खरीदी जाती है, जिसे बेचती है सरकार वो भी डंके की चोट पर. सरकार द्वारा जनहित में जारी विज्ञापन से इसके दुष्परिणाम को बता कर लोगों को मौत के मुंह में जाने से नहीं रोका जा सकता, ये प्रयास तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक ऐसे नशीले पदार्थों पर पूर्ण रूप से प्रतिबन्ध नहीं लगा दिया जाता. हमारी सरकार के भी क्या कहने- हाल ही में गुटखा-तम्बाकू की बिक्री पर रोक लगाने की बजाय प्लास्टिक पाउच में बेचने पर प्रतिबन्ध लगा दिया. ऐसे में सरकार क्या साबित करना चाहती है ये सरकार ही जाने! चलिए बात करते है उन मौतों की जो तम्बाकू के सेवन से होती है. सरकार द्वारा इसके दुश्परिणामों की जानकारी एक विज्ञापन के द्वारा लोगों तक पहुंचाई जा रही है और इसका सेवन ना करने की सलाह लगातार दी जा रही है. दूसरी तरफ इसे खुले आम बेचा भी जा रहा है.
सोचनीय है कि जिस पदार्थ/सामग्री से लोगों को कैंसर की बीमारी होने की जानकारी दी जा रही है वहीं दूसरी तरफ ऐसे पदार्थ/सामग्री को खुलेआम बेचने की अनुमति क्यों है? होना तो ये चाहिए था कि अगर ऐसी सामग्री से लोगों की जान जाती है तो उस पर पूर्ण रूप से प्रतिबन्ध लगा देना चाहिए था, ना की टीवी और अखबारों में विज्ञापन देना चाहिए कि इसका सेवन ना करें. और तो और सरकार ने तम्बाकू और सिगरेट की पैकेट पर बिच्छू की आकृति के साथ ये शब्द “तम्बाकू जानलेवा है, तम्बाकू से कैंसर हो सकता है” को प्रदर्शित करना अनिवार्य कर दिया. सरकार को लगता है कि ऐसी आकृति और जानलेवा शब्द के प्रदर्शित करने से लोग इसका सेवन नहीं करेंगे. सुप्रीम कोर्ट ने अब प्लास्टिक के पाउच में गुटखा/तम्बाकू की बिक्री पर पूर्ण रूप से प्रतिबन्ध भी लगा दिया है, लेकिन एक बात सोचने पर मजबूर करती है कि सरकार द्वारा इस तरह मौत बेचने की अनुमति देने की कमज़ोरी क्या है?
आज ना जाने कितने लोग तम्बाकू के सेवन से ज़िन्दगी और मौत से जूझ रहे है लेकिन हमारी सरकार सिर्फ विज्ञापन से लोगों को इसका प्रयोग ना करने की सलाह देने में आगे है. सबसे अधिक इसके सेवन से गरीब मरते हैं. हमारे शराब माफियाओं की मेहरबानी के क्या कहने एक तो शराब पहले से ही जानलेवा है, उसके बाद उसमें भी मिलावट कर उसे और ज़हरीला बना दिया जा रहा है, जिससे आये दिन ना जाने कितने लोगों की मौत हो रही है.
विभिन्न टेलीविजन चैनलों पर रोज़ आने वाले विज्ञापन पर नज़र डालें तो कोई भी उस विज्ञापन को देख कर कह सकता है कि सच में तम्बाकू का सेवन कितना खतरनाक है. हालांकि घरों में इस विज्ञापन का असर भी देखने को मिला है, जिसके बाद कुछ लोगों ने इस मुसीबत से छुटकारा पा लिया, वहीं कुछ इसका सेवन नियमित रूप से कर रहे हैं. कुछ का कहना है कि अगर ऐसे पदार्थ मार्केट में ना बेचे जाएं तो संभव है कि इस तम्बाकू से छुटकारा मिल सकेगा, लेकिन मार्केट में हर दस कदम की दूरी पर बिकने वाले तम्बाकू को देख कर ही तलब लगने लगता है और ना चाहते हुए भी इसका सेवन करना पड़ता है. देश की सर्वोच्च अदालत ने एक मार्च से गुटखे के प्लास्टिक पाउच में उत्पादन तथा बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया है, लेकिन इसके बावजूद अब तक इसकी बिक्री पर कोई रोक नहीं लगाई जा सकी है. कुछ फुटकर दुकानदारों की माने तो उनके पास प्लास्टिक पाउच में मौजूद गुटखा/तम्बाकू का काफी स्टॉक है. कुछ दुकानदारों का कहना है कि वितरण करने वाले को इसे वापस करने के लिये कहा गया तो उन्होंने असहमति जता दी और वापस लेने से मना कर दिया, जिसकी वजह से छोटे और फुटकर दुकानदारों द्वारा इसको बेचा जाना मजबूरी बन गया है. प्रशासन की तरफ से भी अभी तक इसकी रोक पर कोई तेजी नहीं दिखाए जाने से इसकी बिक्री पर कोई असर नहीं पड़ा है. इसे खुले आम बेचा जा रहा है.
बहरहाल देखना ये है कि सरकार ऐसे ज़हरीले पदार्थो पर प्रतिबन्ध कब लगाती है? और कब इनसे हो रही मौतों को रोकने में दिलचस्पी लेती है? सरकार द्वारा जनहित में जारी विज्ञापनों से इसके दुष्परिणाम बता कर लोगों को मौत के मुंह में जाने से नहीं रोका जा सकता, ये प्रयास तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक ऐसे नशीले पदार्थों पर पूर्ण रूप से प्रतिबन्ध नहीं लगा दिया जाता.
लेखक इमरान जहीर मुरादाबाद में रिसर्च ब्यूरो समाचार पत्र और जर्नलिस्ट टुडे नेटवर्क से जुड़े हुए हैं. साथ ही स्वतंत्र लेखन भी करते रहते हैं.

