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तेरा-मेरा कोना

यहाँ तो मौत का भी डर नहीं है

यह दुनिया है और दुनिया भी कैसी कि यहाँ आँख खोलने के बाद इन्सान रोना शुरू कर देता है… और अगर रोए नहीं तो उसको रुलाया जाता है… क्योंकि यहाँ आकर जो नहीं रोया तो वह ज़िन्दा नहीं समझा जाता… कभी हस्पताल जाकर देखा करो जब तक नया जीवन आते के साथ ही रोता नहीं है तो माता पिता के चहरे नहीं खिलते… है न कमाल… इन्सान आता है तो रोता है और जाता है तो रुलाता है… जो सत्य की खोज में रहते हैं वह तो इसी आने-जाने को लेकर चिंतन करें तो उन्हें कहीं और जाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी…यह बिलकुल ऐसा ही है कि खाया पिया कुछ नहीं गिलास तोड़ा बारह आने… दुनिया में आये… इधर उधर घूमे फिरे… यहाँ वहाँ देखा.. मगर जाते समय पता चला कि कुछ देखा ही नहीं …जो देखा था वह तो सिर्फ एक मृग तृष्णा भर है… प्यास ऐसी है कि सागर पी जाने को दिल मचलने लगे.

यह दुनिया है और दुनिया भी कैसी कि यहाँ आँख खोलने के बाद इन्सान रोना शुरू कर देता है… और अगर रोए नहीं तो उसको रुलाया जाता है… क्योंकि यहाँ आकर जो नहीं रोया तो वह ज़िन्दा नहीं समझा जाता… कभी हस्पताल जाकर देखा करो जब तक नया जीवन आते के साथ ही रोता नहीं है तो माता पिता के चहरे नहीं खिलते… है न कमाल… इन्सान आता है तो रोता है और जाता है तो रुलाता है… जो सत्य की खोज में रहते हैं वह तो इसी आने-जाने को लेकर चिंतन करें तो उन्हें कहीं और जाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी…यह बिलकुल ऐसा ही है कि खाया पिया कुछ नहीं गिलास तोड़ा बारह आने… दुनिया में आये… इधर उधर घूमे फिरे… यहाँ वहाँ देखा.. मगर जाते समय पता चला कि कुछ देखा ही नहीं …जो देखा था वह तो सिर्फ एक मृग तृष्णा भर है… प्यास ऐसी है कि सागर पी जाने को दिल मचलने लगे.

सत्य की खोज किया करो.. इसी आने जाने पर ध्यान दो तो तुम्हें लगेगा कि यह तो चिंतन का अच्छा ख़ासा विषय है… इसी पर चिंतन करो… तुम चिंता से मुक्त हो जाओगे… चिंतन करो कि यह जो एक भीड़ से आती है और चली जाती है.. यह कहाँ जाती है… चिंतन करो जो यह कारवां गुज़रता जाता है और हम ग़ुबार देखने पर मजबूर हैं यह क्या है… चिंतन करो कि चार कंधों पर हम जिसे लिए जाते हैं वह अपने पैरों से चल कर क्यों नहीं गया.. और गया तो कहाँ गया…???? और क्यों गया… और यह जो एक भीड़ सी पीछे हाय तौबा मचाती चल रही है.. आंसुओं की बरसात करती…. यह किस लिए है….??

अरे कल तक तो यह पूछते भी नहीं थे… आज दुःख में मुख पर करुणा का ऐसा भाव कि देखने वाला भी आईना सा हो जाता है… कहीं यह जाने वाले की ख़ुशी से तो दुखी नहीं हैं… क्योंकि दुनिया में तो हर इन्सान अपने दुःख से नहीं दूसरे के सुख से परेशान रहता है… ऐसा नहीं लग रहा इनका रोना जैसे बाबूजी बचपन में हाट बाज़ार अकेले चले जाते थे… और बच्चे पीछे रोते थे… बाबूजी हमें छोड़ गए हम भी मेला देखने जायेंगे… यह अकेला मेला देखने क्यों जा रहा है.. या फिर यह मेला देखने जा रहा है या मेला छोड़ के जा रहा है… वह गाना याद आता है…. ओ दूर के मुसाफिर हमको भी साथ लेले… हम रह गए अकेले…!!

अरे अगर वहाँ मेला है तो यहाँ क्या है.. झमेला… चिंतन करो.. चिंता से मुक्ति मिलेगी… चिंता चिता समान है… पढ़ा होगा… सुना भी होगा… छोटी सी बात है.. मगर कितनी बड़ी बात है… देखो… ग़ौर से देखो जो रोता आया था… रोता छोड़ के जा रहा है.. उसके ख़ुद के चेहरे पर कितना सुकून है… ऐसा लगता है जो पीछे रह गए हैं उनको उसके जाने का कम और अपने पीछे छूट जाने का दुःख अधिक है… मगर रोने-पीटने से प्रतीत यूँ होता है कि किसी के सदा के बिछड़ जाने का ग़म सता रहा है… लेकिन यह सब रो इसी लिए रहे होते हैं कि अपना चला गया… मगर कहीं न कहीं दिल के किसी कोने में कोई और ही दर्द तड़प बन कर मचलता है जिसे वह ही जान सकता है जो चिंतन करेगा… इसी लिए तो जानकार कह गए हैं यह दुनिया है… इस से उतना ही प्यार करो जितना जीवन के लिए ज़रूरी है… यहाँ आ के तो बस वहां का सामान करो जहाँ यहाँ का सामान काम नहीं आता…वह अँधा सफर है.. किसी को नहीं पता वहां क्या काम आता है.. क्या साथ ले जाना चाहिए… हाँ जानते तो वह हैं जिनको चिंतन की बीमारी लग जाती है… तो याद रखो यहाँ का हर सामान यहीं रह जाएगा… वहां लेकिन जाएगा  वह सामान जो तुमने भलाइयों से अर्जित किया है…जो तुम्हें दिखाई नहीं देता… जिसका मज़ा दुगना है… जो यहाँ भी तुम्हें मानसिक सुख देता है और वहां के सफर में तो तुम्हारा क़दम क़दम पर साथ देता रहेगा.

तुम्हारी अछाइयां ..सचाइयां ..नेकी… तुम्हारी भलाइयां सब….तुम्हारा सामान करने के लिया काफी हैं… वह जो तुम ने उस दिन भूखे ग़रीब को खाना खिलाया था… वह खाना तुम्हारे साथ रहेगा… वह जो तुम ने ग़रीब विद्यार्थी की फीस दी थी वह भी तुम साथ ही ले जा रहे हो… वह जो तुम ने ग़रीब की बेटी की शादी का खर्च उठाया था… वह भी तुम्हारा सामान बन गया है… जो रास्ते में पड़े पत्थर उठाये थे वह भी तुम्हारे रास्तों के गड्ढ़े भरने के लिया जा रहे हैं… वह बीमार की दवा भी साथ है… तुम ने जो सत्य का दामन थमा था वह सत्य भी तुम्हारे साथ है… इस अंतिम यात्रा में वह सब तुम्हारे साथ है जो दुनिया में रह कर तुमने जाने अनजाने भलाइयां की थीं… और देखो इन अच्छाइयों के साथ तुम्हारा सफ़र कितना रोशन है.. आलोकित है… उज्‍ज्‍वल है… मुनव्वर है… इतनी रौशनी तुमने पहले कभी देखी थी… अचंभित हो इस रौशनी से… यह तुम्हारी अपनी रौशनी है… यही सत्य है… अंतिम सत्य… आओ और इस में डूब कर हर चिंता से मुक्त हो जाओ.

हमारा रास्ता ऐसा है जिसमें
कहीं भी मील का पत्थर नहीं है
यह कैसे शहर में हम आ गए हैं
यहाँ तो मौत का भी डर नहीं है…!!!

लेखक तहसीन मुनव्‍वर बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं. प‍त्रकारिता से लेकर लेखन तक के कई आयाम नापे हैं. पत्रकार हैं, एंकर हैं, शायर हैं, लेखक हैं, टीचर हैं, कवि हैं, गीतकार हैं, कहानीकार हैं यानी कई शख्सीयतों के संगम हैं. हिंदी, उर्दू, पंजाबी सहित कई भाषाओं के जानकार हैं. विज्ञापनों और जिंगल से लेकर फिल्‍मों, धारावाहिकों, रेडियो तथा टीवी के लिए लेखन कर चुके हैं. कश्‍मीर में इन्‍होंने दूरदर्शन के लिए उस समय रिपोर्टिंग और एंकरिंग की जब वादी गोलियों की तड़तड़ाहट एवं बमों के धमाकों से गूंजा करती थी. कई अखबारों और मैगजीनों में इनके स्‍तंभ छपते हैं. इंदौर में 2008 में निदा फाजली के साथ भरोसा सम्‍मान से सम्‍मानित तहसीन ने अपनी कविताओं की किताब ‘धूप चांदनी’ में जीवन के कई रंगों को उकेरा है. उनकी कहानी की किताब ‘मासूम’ को उर्दू अकादमी ने सम्‍मानित किया है. इसके अलावा भी वे कई सम्‍मानों से नवाजे जा चुके हैं. देश-विदेश में कवि सम्‍मेलनों और मुशायरों में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं. फिलहाल रेल मंत्रालय में मीडिया कंसलटेंट के रूप में कार्य कर रहे हैं.

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