: मेरी विदेश डायरी-6 : केन्या-भूख, गरीबी में भी जमकर मस्ती : सूदखोरों की तरह व्यवहार करती हैं माइक्रोफाइनेंस कंपनियां : कल लगभग 15 दिनों की केन्या यात्रा के बाद जब उगांडा में अपनी बस घुसी तो कंपाला की सारी सड़कें जाम थीं। हमें जिंजा रोड की ओर जाने का कोई रास्ता नहीं मिल पा रहा था। बाद में पता चला कि उगांडा के वर्तमान राष्ट्रपति मुसोविनी को आज नेशनल रेसिस्टेंस मूवमेंट की ओर से अगली सरकार चलाने के लिए नामित किया जाना है इसीलिए एक बड़ी रैली निकाली गई है। कंपाला में सुबह के समय वैसे ही तमाम सड़कों पर अपार भीड़ होती है, तो किसी रैली से क्या हालत हो सकती है, अंदाजा लगाया जा सकता है। उगांडा में इस समय चुनावी माहौल है और बहुत सारे भारतीय डरे हुए भी है। लोग बताते हैं कि पिछली बार के चुनाव में खूब जमकर गुंडागर्दी हुई थी और अनेक भारतीयों को निशाना बनाया गया था। यहां अभी चुनाव जनवरी में होने हैं पर अपनी अपनी पार्टियों से उम्मीदवारों की सूची पहले ही बना ली जाती है और उनका भी पार्टी के स्तर पर बाकायदा चुनाव होता है। इसे प्राइमरी कहते हैं।
पर मैं इस समय कंपाला से ज्यादा केन्या के बारे में सोच रहा हूं। केन्या की राजधानी नैरोबी को सुंदर बनाने की पूरी कोशिश की गई है। परेशानी की बात यह कि मैं अपना लैपटॉप कंपाला में ही छोड़ आया था इसलिए उस सुंदर शहर की कोई तस्वीर नहीं ले सका। केन्या के भी अखबार कम से कम 1800 केन्या शिलिंग के ही बिकते हैं। लगभग 4 करोड़ की आबादी वाले इस छोटे से देश में भारतीयों की संख्या कम से कम 40 हजार तो होगी ही। नैरोबी में अनेक उद्योग भारतीयों के हाथ में हैं। जैसे कंपाला में गुजरातियों ने पूरे व्यापार जगत पर कब्जा जमा रखा है, वैसे ही केन्या में भी यही हालत है। केन्या में ईसाइयों की आबादी लगभग 78 फीसदी है, जिनमें प्रोटेस्टेंट और कैथोलिक दोनों ही लगभग बराबर के हिस्सेदार हैं। मुसलमानों की भी अच्छी खासी संख्या है। बाकी आबादी मिलीजुली है, जिनमें भारतीय भी शामिल हैं।
वर्तमान राष्ट्रपति पार्टी ऑफ नेशनल यूनिटी के हैं और उनका देश के हर क्षेत्र में बराबर का दबदबा है। जैसे उगांडा में इस समय मुसोविनी को चुनौती देने की हैसियत किसी दूसरे नेता में नहीं है, वैसे ही केन्या में भी एमिलो किबाकी का एकछत्र राज है। प्रधानमंत्री रैला ओडिंगा को किबाकी ने अपनी पसंद का मानते हुए 2008 में मनोनीत किया था, पर उनकी ही पार्टी के लोग बताते हैं कि ओडिंगा अपने को महामहिम के समानांतर खड़ा करने की कोशिश में हैं और अब किबाकी के गले की हड्डी बन रहे हैं। इस छोटे से देश में विद्रोह कराकर सत्ता पर काबिज होना बहुत मुश्किल नहीं है पर किबाकी उन्हें अपना सबसे वफादार साथी बताते रहते हैं। केन्या में अनेक राजनैतिक दल हैं- नेशनल रेनबो कोलिशन, डेमोक्रेटिक पार्टी को ही लोग याद रखते हैं।
मैं केन्या में काम करने वाले कुछ माइक्रोफाइनैंस कंपनियों के बुलावे पर गया था, इसलिए मेरा दूसरा कोई और काम हो नहीं पा रहा था। मेरी कोशिश थी कि मैं कम से कम नैरोबी के आसपास के कुछ गांवों में काम करने वाले गैर-सरकारी संगठनों के साथ उनके कामकाज का जायजा लूं। मुझे यह जानकर हैरत हुई कि केन्या में भी अनेक ऐसी संस्थाएं हैं, जिनका नाम तो माइक्रोफाइनैंस के लिए है पर वे किसी सूदखोर महाजन की ही तरह काम करती हैं। इनमें से अनेक संस्थाएं छोटी अवधि के लिए 10 से 15 फीसदी प्रतिमाह के ब्याज पर लोन मुहैया कराती हैं और वसूली भी पूरे दमखम से करती हैं। उनके पक्ष में ही देश के ज्यादातर कानून हैं। उगांडा में भी कमोबेश ऐसी ही हालत है। मजेदार बात यह कि यहां के भी सांसद खूब जमकर कर्ज लेते हैं और ब्याज सहित चुकाने में जरा भी संकोच नहीं करते।
आबादी के लगभग 22 फीसदी लोग किकुयू हैं और गरीब हैं। वे मुर्गीपालन जैसे छोटे उद्योगों के लिए उंची ब्याज दरों पर लोन लेते हैं और बाद में अपनी रेहन पर रखी जमीन भी गवां देते हैं। इसके बावजूद यहां सूदखोरों के खिलाफ बोलने का साहस किसी में नहीं है। मौसम के हिसाब से केन्या भी अच्छा देश है। फसल अच्छी होती है और लोगों को मौजमस्ती में समय बिताना ही ज्यादा अच्छा लगता है। वे पांच दिन भले ही रो पीटकर बिता लें पर शनिवार की रात वोदका पीने से पीछे नहीं हटते। कहीं कोई ऐसा संगठन नहीं दिखता जो केन्या की आम जनता को राजनैतिक रुप से चेतनशनील बनाए और उन्हें संगठित विरोध करने को प्रेरित करे। जाहिर है, आने वाले कुछ सालों तक यहां की गरीबी के कम होने की कोई संभावना नहीं दिखती।
लेखक अंचल सिन्हा बैंक के अधिकारी रहे, पत्रकार रहे, इन दिनों उगांडा में बैंकिंग से जुड़े कामकाज के सिलसिले में डेरा डाले हुए हैं. अंचल सिन्हा भड़ास4मीडिया पर अपनी विदेश डायरी के जरिए समय-समय पर उपस्थित होते रहेंगे. अंचल सिन्हा से सम्पर्क उनके फोन नंबर +256759476858 या ई-मेल – [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

