‘अंग्रेज कुछ सालों में हिन्दुस्तान छोड़ जाएंगे, लेकिन यह गोरे अंग्रेजों से काले अंग्रेजों के हाथों में सत्ता के हस्तांतरण के सिवा और कुछ नहीं होगा। दस-पंद्रह साल इसी खुशफहमी में गुजर जाएंगे और फिर लोगों को महसूस होगा कि उनके साथ धोखा हो रहा है।’ अंग्रेजों की जेल में फांसी का इंतजार करते हुए भगत सिंह का यह बयान देश पर हुकूमत कर रहे आज के हुक्मरानों पर उतनी ही सटीक बैठता है, जितना जब हिन्दुस्तान अपनी गुलामी के खिलाफ मुक्ति की लड़ाई लड़ रहा था। भ्रष्टाचार और लूट-खसोट से देश के करोड़ों-करोड़ लोगों को नारकीय जीवन जीने के लिए बाध्य करने वाले हुक्मरान आजादी के छह दशक बाद भी इस देश की जनता के साथ जिस कार्यरता से बर्बरतायुक्त व्यवहार कर रहे हैं, उससे साफ होता है कि डायर की इन संतानों के चंगुल में फंसे देश को बचाने के लिए आजादी की दूसरी जंग कितनी जरूरी है।
भ्रष्टाचार और विदेशी बैंकों में जमा काली कमाई के मुददे पर अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के साथ खड़ी जनभावनाओं को कुचलने के लिए जिस तरह केन्द्र में ईमानदारी का मुखौटा पहने बैठे मनमोहन सिंह और उनके सहोदर नंगई से गुंडागर्दी पर उतर आए हैं, और संघ परिवार की तरह-तरह की संतानें जिस तरह उत्तराखंड से लेकर दिल्ली तक राष्ट्रीय फलक पर घड़ियाली आंसू बहा रहे हैं, इससे लगता है कि यह देश किसी गंभीर संकट की ओर कदम बढ़ा रहा है। इसके संकेत रामलीला मैदान में सोते हुए लोगों पर मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी की पुलिस द्वारा मध्यरात्रि में रामदेव के आंदोलन को कुचलने के लिए दमनचक्र चलाना, और फिर उसके बाद कांग्रेसियों के एक के बाद एक आ रहे बयानों में महसूस किए जा सकते हैं। इस पूरे घटनाक्रम का सबसे खतरनाक पहलू यह है जब इस देश का प्रधानमंत्री इस बर्बरतापूर्ण कार्रवाई का यह कहते हुए बचाव करता है कि उनके पास इसके सिवा कोई दूसरा रास्ता नहीं था।
मनमोहन सिंह को यह कौन बताये कि भ्रष्टाचार की जिस आग में आज यह देश जल रहा है, उसको पालने-पोसने वाले नवउदारवार्दी आर्थिक मॉडल को पूरी अकड़न के साथ इस देश पर थोपने वाले तो वहीं हैं। यह बात क्या किसी से छुपी है कि पिछले दो दशक में जब से इस देश में मनमोहन सिंह का नवउदारवादी मॉडल लागू हुआ है, तब से जनता के संसाधनों की खुली लूट का तीव्रगामी सिलसिला भी शुरू हुआ। इसी का कमाल है कि बीस रूपया रोजाना भी न कमा पा सकने वाले 83 करोड़ भारतीयों का यह देश, गरीबी, कुपोषण और मानव विकास के दूसरे सूचकांकों में अफ्रीका के दरिद्र से दरिद्र देशों से भी बुरी हालत में खड़ा है। एक ओर जहां इस देश में संसाधनों की खुली लूट होती है, दूसरी तरफ करोड़-करोड़ भारतीय भूखे पेट रात गुजारने को बाध्य होते हैं और मुट्ठी भर अरबपरियों की दौलत हर घंटे के हिसाब से उछालें मारती है।
मनमोहन सिंह की यह मंडली चुपचाप लाखों-लाख करोड़ रुपये टाटाओं और अंबानियों को बिना किसी शर्म के यूं ही दे देती है। भारत सरकार के ताजा आंकड़े बताते हैं कि ईमानदारी का मुखौटा पहने मनमोहन सिंह एंड कंपनी ने पिछले पांच साल में टाटा और अंबानी जैसे अरबपतियों से वसूला जाने वाले 21 लाख करोड़ के टैक्स को बिना किसी वजह के माफ कर दिया। यह वह रकम है जिससे इस देश में शिक्षा और स्वास्थ्य की तस्वीर बदली जा सकती है और करोड़ों लोगों को गरीबी की दलदल से बाहर निकाला जा सकता है। ऐसे में पूंजीपतियों और धन्नासेंठों की चाकरी करने वाली मनमोहन और सोनिया की कांग्रेसी मंडली से यह उम्मीद कैसे की जा सकती है वह इस देश की आम जनता के पक्ष में खड़ी होगी? अपनी राजनीति को बचाये रखने के लिए वह गरीबों की हितैषी होने का नाटक भी करती है, लेकिन सच यह है कि उसके दिखाने के दांत कुछ और हैं, और खाने के कुछ और हैं।
लोकतंत्र के लिए खतरा बने भ्रष्टाचार का सवाल, जो व्यापक स्तर पर इस देश की गरीबी, अशिक्षा और कुपोषण के लिए एक हदतक जिम्मेदार है, पर मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी की कांग्रेस जिस तरह की बेशर्म राजनीति पर उतर आई है, उससे दिखावे के लिए महात्मा गांधी के नाम की माला जपने वाले कांग्रेसियों के चेहरे से नकाब उठ गया है। बेशक, धर्म और आध्यात्म के रास्ते भ्रष्टाचार मुक्त भारत की लड़ाई लड़ाई लड़ रहे बाबा रामदेव के मंच पर इस देश को सांप्रदायिकता की आग में झुलसाने वाले संघ परिवार के चेहरों की मौजूदगी पर सवाल उठाए जा सकते हैं, लेकिन इससे रामदेव जिन सवालों के समाधान की मांग कर रहे हैं, उस को खारिज नहीं किया जा सकता। रामदेव की कार्यशैली पर पिछले दस सालों में समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं, लेकिन इस बात को कौन भूल सकता है कि रामदेव जितने आज संघ परिवार के चहेते हैं, कुछ दिन पहले तक उससे कम कांग्रेसियों के लिए नहीं।
भ्रष्टाचार के खिलाफ रामदेव के आंदोलन को संघ परिवार से जोड़कर जिस तरह से इस पूरे आंदोलन को ही सांप्रदायिकता का रंग देने की कोशिश हो रही है, वह बताती है कि मनमोहन सिंह की सरकार और सोनिया गांधी की कांग्रेस अपने बचाव के लिए आज के भारत में भी अपने काले इतिहास का दुहराव करने की हदतक जा सकती है। अपने बचाव में इस दलील के कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन देश में लोकतंत्र को कमजोर करने की साजिश है, न केवल बचकाना है, बल्कि कांग्रेसियों की उस खतरनाक मानसिकता की भी परिचायक है, जिसके तहत जेपी आंदोलन को कुचलने के लिए उसने देश पर आपातकाल थोप दिया था। यहां यह बात भी अहम है, जब कांग्रेसी एक गांधीवादी तरीके से लड़े जा रहे रहे आंदोलन को कुचलने के लिए इस तरह की बेढंगी दलील दे रही है, तब वह कुछ दिन पहले ही आपातकाल थोपने के लिए इंदिरा गांधी की आलोचना करते हुए अपने इतिहास का शुद्धिकरण करने में जुटी हुई है। क्या कांग्रेस का यह दोगलापन नहीं है?
एक ओर वह आपातकाल के लिए बचाव की मुद्रा में दिखती है और दूसरी ओर रामदेव के आंदोलन को कुचलने को जायज ठहराने के लिए ठीक वहीं दलीलें पेश करती है, जिन्हें देते हुए इंदिरा गांधी ने इस देश को आपातकाल की जंजीरों में बांध लिया था। कांग्रेसियों की बेशर्मी की हद तो तब हो जाती है जब गांधीवादी अन्ना हजारे को भी वे संघ परिवार का एजेंट करार देने लगते हैं। अब यह सोनिया गांधी की कांग्रेस से कौन पूछे कि अगर रामदेव भी संघ का एजेंट और अन्ना हजारे भी, तो आखिर गांधीवादी कहलाने की उसकी परिभाषा क्या है? क्या कांग्रेसी जिस बेहयायी से दिल्ली की गद्दी पर बैठ कर इस देश को नोच रहे हैं, उसकी हां में हां मिलाना ही, उसके नजरिये से गांधीवादी होने का प्रमाण है। क्या सोनिया गांधी के कांग्रेसी चाटुकार आज गांधीवादी होने के मामले में ठीक उसी तरह प्रमाण पत्र बांटने का धंधा नहीं कर रहे है, जैसे संघ परिवार की भगवा पलटनें लोगों को राष्ट्र भक्त होने न होने का सर्टिफिकेट देती फिरती है? इसका मतलब हुआ जो भ्रष्टाचार को पालते-पोसते रहने के लिए कांग्रेसियों का साथ दे, वे लोकतंत्र समर्थक और जो आंदोलन करे वह देश के लिए खतरा।
कल तक जिस रामदेव के चरण में लोटने के लिए कांग्रेसी उतावले हुआ करते थे, उन्हें एकाएक रामदेव ढोंगी और ठग नजर आने लगते हैं। अगर उसकी नजर में रामदेव जनता से ठगी का धंधा करते हैं तो उसकी सरकार के चार-चार मंत्री किसी राष्ट्राध्यक्ष की तरह हवाई अड्डे पर जाकर आखिर क्यों मान-मनौव्वल करती है? पहले रामदेव की आड़ लेकर लोकपाल बिल के मुददे पर गिरगिट की तरह रंग बदलने और फिर रामदेव के आंदोलन को बर्बरता से कुचलना, बताता है कि भ्रष्टाचार और आजाद भारत के भीमकाय घोटालों को अंजाम देने वाली कांग्रेसी मंडली कालेधन के सवाल पर कालेधन के मगरमच्छों के बचाव के लिए किसी भी हदतक गिर सकती है। यह बात सही है कि इस देश को संघ परिवार के सांप्रदायिक मनसूबों से बचाने की जरूरत है, लेकिन क्या इतिहास के पन्ने चीख-चीखकर यह नहीं बताते कि कांग्रेसियों ने ही समय-समय पर संघ परिवार की सांप्रदायिक परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए अपने सियासी फायदों के लिए खाद-पानी देने का काम किया।
रामलीला मैदान में चार जून की मध्यरात्रि में जो कुछ हुआ, वह जलियावाला कांड की याद दिलाते हैं, जब डायर ने निहत्थे भारतीयों को घेर कर कत्ल करवा दिया था। क्या मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी की पुलिस ने देश की राजधानी में भूखे पेट सोते हुए महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को घेरकर एक आंदोलन को खत्म करने के लिए जो बर्बरता दिखाई क्या वह किसी भी मायने में जलियावाला कांड से कम है? शायद आज महात्मा गांधी जिंदा होते तो मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी की कांग्रेस को अरब सागर में डुबोकर इसकी कहानी खत्म कर डालते। चूंकि अब गांधी नहीं हैं, इसलिए इस देश की जनता ही कांग्रेसियों के मुंह पर कालिख पोतेगी।
लेखक दीपक आजाद स्वतंत्र पत्रकार हैं। यह आलेख देहरादून से प्रकाशित साप्ताहिक ‘उत्तराखंड आज’ के ताजा अंक में प्रकाशित हुआ है।

