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यह नाटक पेट्रोल मूल्‍यवृद्धि से ध्‍यान हटाने के लिए

प्रकाशइन दिनों पूरे देश में प्याज के दामों पर किचकिच चल रही है. एक-दूसरे पर दोषारोपण किया जा रहा है. पर असली सच यही है कि सत्ताधीश, पेट्रोलियम कंपनियां और उनके हाथों की कठपुतली बने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया-कर्मी पेट्रोल मूल्यवृद्धि से ध्यान हटाने के लिए ही प्याज की महंगाई का नाटक कर रहे हैं. प्याज की अस्थायी तौर पर बढ़ी हुई कीमत पर हाहाकार मचा रहे हैं. जबकि सभी जानते हैं कि प्याज की कीमत आज नहीं तो कल कम हो जाएगी, मगर पेट्रोल के बढे़ हुए दाम कभी कम नहीं होंगे. पिछले कुछ दिनों से खबरिया चैनलों पर मीडिया-कर्मी प्याज के समाचारों को इतना ‘हाइप’ दे रहे हैं मानों प्याज नहीं होगा तो यह जीवन-सृष्टि नहीं चलेगी. जबकि ऐसा कुछ नहीं है. जैन समाज में अधिकांश लोग प्याज नहीं खाते. छूते तक नहीं, फिर भी उनकी सेहत हमेशा अच्छी रहती है. आज जनता अगर एक-दो सप्ताह प्याज न खाए, तो क्या बिगड़ेगा. वह जीवनावश्यक वस्तु नहीं है. मगर पेट्रोल सर्वाधिक जीवनावश्यक वस्तु है. वह हर घर, हर व्यक्ति, हर परिवार और हर समाज की जरूरत है. लेकिन पेट्रोल की कभी कम न होने वाली प्रचंड मूल्यवृद्धि को लेकर आजकल कहीं कोई हाहाकार नहीं कर रहा है, क्योंकि कोई भी न्यूज चैनल इस विषय पर चीख नहीं रहा है.

प्रकाशइन दिनों पूरे देश में प्याज के दामों पर किचकिच चल रही है. एक-दूसरे पर दोषारोपण किया जा रहा है. पर असली सच यही है कि सत्ताधीश, पेट्रोलियम कंपनियां और उनके हाथों की कठपुतली बने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया-कर्मी पेट्रोल मूल्यवृद्धि से ध्यान हटाने के लिए ही प्याज की महंगाई का नाटक कर रहे हैं. प्याज की अस्थायी तौर पर बढ़ी हुई कीमत पर हाहाकार मचा रहे हैं. जबकि सभी जानते हैं कि प्याज की कीमत आज नहीं तो कल कम हो जाएगी, मगर पेट्रोल के बढे़ हुए दाम कभी कम नहीं होंगे. पिछले कुछ दिनों से खबरिया चैनलों पर मीडिया-कर्मी प्याज के समाचारों को इतना ‘हाइप’ दे रहे हैं मानों प्याज नहीं होगा तो यह जीवन-सृष्टि नहीं चलेगी. जबकि ऐसा कुछ नहीं है. जैन समाज में अधिकांश लोग प्याज नहीं खाते. छूते तक नहीं, फिर भी उनकी सेहत हमेशा अच्छी रहती है. आज जनता अगर एक-दो सप्ताह प्याज न खाए, तो क्या बिगड़ेगा. वह जीवनावश्यक वस्तु नहीं है. मगर पेट्रोल सर्वाधिक जीवनावश्यक वस्तु है. वह हर घर, हर व्यक्ति, हर परिवार और हर समाज की जरूरत है. लेकिन पेट्रोल की कभी कम न होने वाली प्रचंड मूल्यवृद्धि को लेकर आजकल कहीं कोई हाहाकार नहीं कर रहा है, क्योंकि कोई भी न्यूज चैनल इस विषय पर चीख नहीं रहा है.

फिर बता दें कि नैसर्गिक विपदा (बेमौसम वर्षा) के कारण किसानों की प्याज और सब्जी-भाजी की फसल का बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ है. इसलिए बाजार में प्याज सहित अन्य सब्जियों का अभाव देखा जा रहा है. अनेक किसानों का प्याज सड़ गया है. वह 2-4 रुपए किलो की दर पर भी लेने कोई तैयार नहीं है. तब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया वाले वह सड़ी हुई फसल क्यों नहीं दिखाते? क्यों नहीं इन गरीब किसानों के हुए नुकसान पर सरकारी तंत्र को झकझोरने वाली रिपोर्ट प्रसारित करते! मगर सरकारी नुमाइंदों, पेट्रोलियम कंपनियों और सत्ताधीशों के हाथों में खेलने वालों को किसानों के आंसुओं से कोई सरोकार नहीं है.

अगले माह तक प्याज के दाम जब जमीन पर आ जाएंगे और पेट्रोल के दाम वहीं 62-63 रुपए प्रति लीटर पर कायम रहेंगे, तब हाहाकार मचाने वाले ये लोग कहां मुंह छिपाएंगे? क्योंकि प्याज और सब्जियों के भाव तो कम हो ही जाएंगे, मगर भविष्य में कभी भी पेट्रोल के दाम नहीं घटेंगे! पिछले छह माह में पेट्रोल के मूल्य में सात बार वृद्धि की गई है और वह पिछले छह माह की तुलना में 12 रुपये महंगा हो चुका है. लेकिन कहीं किसी ने हो-हल्ला नहीं किया. जबकि किसानों की उपज का मूल्य जरा-सा बढ़ा नहीं कि हाहाकार मचाया जाता है. ऐसे में लगता है कि यह किसानों के खिलाफ एक सुनियोजित षड़यंत्र है.

विदेशों से आयात किया गया क्रूड ऑइल प्रक्रिया पूरा होने के बाद भारत में पेट्रोल 22 रुपये प्रति लीटर की दर से उपलब्ध होता है. मगर उपभोक्ताओं को उसके लिए 62-63 रुपये प्रति लीटर देने पड़ते हैं अर्थात प्रत्येक लीटर पर कम से कम 40 रुपये अधिक. महीने में दो से तीन किलो प्याज खाने वाले एक परिवार को हर माह कम से कम 30 से 40 लीटर पेट्रोल (औसतन) लगता है. प्याज के दामों की मार ज्यादा पड़ेगी या पेट्रोल की! फिर सरकार को यदि ‘आम आदमी’ की इतनी ही चिंता है, तो वह 22 रुपये प्रति लीटर वाले पेट्रोल पर इतने भारी-भरकम टैक्स क्यों लगाती है? और पेट्रोलियम कंपनियों को भारी मुनाफा क्यों कमाने दे रही है? क्या इससे यह साबित नहीं होता कि सरकार और इन पेट्रोलियम कंपनियों के बीच लंबी साठगांठ है?

पेट्रोल (फ्यूल) जीवनावश्यक वस्तु है, जबकि प्याज नहीं. पेट्रोल-डीजल पर बेतहाशा टैक्स लगाना ही अव्यवहारिक है. नैतिकता के खिलाफ है. अब भी वक्त है, सरकार को टैक्स लगाना भी छोड़ना चाहिए और फ्यूल कंपनियों को मुनाफा भी कम करने के आदेश देने चाहिए. अगर सरकार किसानों की सच्ची हमदर्द है, तो उसे बायो पेट्रोल व बायो डीजल (नैसर्गिक ईंधन) के उत्पादन पर ध्यान देना चाहिए. वह शक्कर (गन्ने) से बनता है. ऐसा ईंधन सस्ता भी होगा, इससे किसानों को लाभ भी होगा तथा वह पर्यावरण के हित में भी होगा. दुनिया में ब्राजील, चिली, मैक्सिको, अर्जेंटीना व मॉरीशस आदि देशों में तो अधिकतर इसी प्रकार का बायो फ्यूल ही इस्तेमाल किया जाता है. लेकिन किसान विरोधी सरकार शायद ही ऐसा करेगी. पेट्रोल न मिले, तो रोजमर्रा का जीवन प्रभावित हो सकता है, लेकिन प्याज न मिले तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा. इसलिए प्याज मूल्यवृद्धि पर रेंकने वालों को पेट्रोल मूल्यवृद्धि पर ही हाहाकार करना चाहिए.

लेखक प्रकाश पोहरे देशोन्‍नति ग्रुप के चेयरमैन, कृषि आंदोलनकारी हैं तथा कृषि पत्रकारिता करते हैं. इन्‍हें कई पुरस्‍कारों से सम्‍मानित किया जा चुका है. उनका यह लेख देशोन्‍नति में प्रकाशित हो चुका है.

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