संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक में गलती से पुर्तगाल के विदेश मंत्री का भाषण पढ़ गए भारतीय विदेश मंत्री एसएम कृष्णा इसे बड़ी बात नहीं मानते। उनका कहना है कि ऐसी चीजें होती रहती हैं क्योंकि इस तरह के भाषणों की शुरुआत एक जैसी होती हैं। वैसे कुछ लोग मंदिरों में जाकर गलती से दूसरों का जूता पहन कर लौटते हैं। कुछ लोग दारू की पिनक में दूसरे की बीवी को अपना समझ बैठते हैं। वैसे भी गलती तो गलती होती है, ‘सॉरी’ कहकर गलतियों के भावी परिणामों से निजात पाई जा सकती है, अलबत्ता इसकी गारंटी नहीं होती। पर कृष्णा इस जमात से नहीं हैं। वे उस बेशर्म जमात से हैं जो गलती करने के बाद उसे स्वीकार तक नहीं करते। वे कहते हैं कि दूसरे का भाषण पढ़ जाना कोई गलती नहीं है। मेज पर ढेरों कागज पड़े होते हैं।
यानी विदेश मंत्री जैसा संवेदनशील पद एक ऐसे शख्स के हवाले है, जो टेबल पर पड़े किसी भी कागज को अपना भाषण मानकर पढ़ने लगते हैं। शायद अपने दफ्तर की मेज पर पड़ी हर फाइल पर भी वे आंख मूंदकर ही हस्ताक्षर करते हैं और इसमें कोई झिझक या शर्म महसूस नहीं करते। वे कहते हैं कि सभी भाषणों की शुरुआत एक जैसी होती है इसलिए कोई फर्क नहीं पड़ता। तो यह बात तो गवाही और हलफनामे पर भी लागू होती है। यानी कि लोग किसी के भी नाम की गवाही पढ़ सकते हैं, किसी के भी नाम से हलफनामा कर सकते हैं।
दरअसल यह देश के कथित बड़े लोगों की उस मानसिकता को दर्शाती है जिन्हें अपनी तरफ उठती उंगलियां बर्दाश्त नहीं होती। वे जो कह देते हैं वही कानून बन जाता है। वे जो भी करते हैं वह किसी भी संविधान या कानून से परे होता है। वे चाहते हैं तो लोगों की सुनते हैं। नहीं चाहते तो नहीं सुनते। वे हर परिस्थिति को अपने अनुसार ढाल लेते हैं। इन दिनों यही सफलता की परिभाषा है। लोग सामर्थ्यवान बनना चाहते हैं। वे इतना ऊंचा उठ जाना चाहते हैं कि लोग केवल उनकी सुनें, उनसे कहें कुछ नहीं। धीरे-धीरे यही हमारा राष्ट्रीय चरित्र हो चला है। हमने भारतीय दर्शन को अपने स्वार्थ में भुला दिया है। भारतीय दर्शन कहता है कि सामर्थ्यवान को गरीबों, कमजोरों और दीन-हीनों की मदद करनी चाहिए। इससे उसका सामर्थ्य और बढ़ जाता है। भारतीय दर्शन यह भी कहता है कि क्षमा बड़न को चाहिए… पर पाश्चात्य फिलासफी इन फुटकर चीजों को नहीं मानती। वह कहती है, आगे बढ़ो कि दुनिया तुम्हें सलाम करे। इतना आगे निकल जाओ कि तुम्हारे पड़ोसी तुमसे ईष्या करें।
पर हम कहते हैं कि इतना बड़ा बनो कि तुम्हारा परिवार, तुम्हारा मुहल्ला, तुम्हारा प्रांत, तुम्हारा देश तुम पर नाज कर सके। पर हमारी सुनता कौन है। बल्कि अब तो नए जमाने के सूटबूट धारी गुरु आपको दूसरों को रौंद कर आगे बढ़ने की सीख देते हैं। वे पीछे छूट जाने वाले लोगों को कमजोर, नाकारा और नामर्द करार देते हैं। इस लिहाज से देखा जाए तो कृष्णा हमारे देश की युवा पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते दिखते है जिसकी एक ही फिलासफी है – ‘चित भी मेरी, पट भी मेरा, अंटा मेरे बाप का’। ले करले जो तुझसे बन पड़ता है, उखाड़ ले जो उखाड़ सकता है, हम तो ऐसे ही हैं और ऐसे ही बने रहेंगे।
लेखक दीपक रंजन दास हरिभूमि में कार्यरत हैं तथा दुर्ग-भिलाई के डेस्क प्रभारी हैं.

