23 जून 2011 को भोपाल के जिला न्यायालय में पेशी के लिये लाये गये एक अपराधी राजू खान की विनोद सिंह नामक व्यक्ति ने गोली मारकर हत्या कर दी। इस घटना के बाद से लगातार एक सप्ताह, जिला न्यायालय एवं शासन के मंत्रियों एंव अधिकारियों के बीच बैठकों की सुर्खियों में रहा। मीडिया से लेकर सभी की चिन्ता थी कि जिला न्यायालय में सुरक्षा के उपाय पर्याप्त नही हैं इसलिये यह घटना घटी। मीडिया ने यह भी याद दिलाया कि सुरक्षा के अभाव में इस प्रकार की घटना की पुनरावृत्ति हुई जबकि कई वर्ष पूर्व एक और गोलीकांड की घटना न्यायपालिका परिसर में घट चुकी थी। देखना यह होगा कि क्या ये घटनायें वास्तव में सुरक्षात्मक दृष्टिकोण से देखी जाना चाहिये या न्याय व्यवस्था की असफलता से। 23 जून को विनोद सिंह ने गोली चलाने के बाद जो बयान दिया उसमें कहा कि मुझे नहीं मालूम था कि अपराधियों की संख्या तीन थी, नहीं तो मैं तीन गोली लेकर आता।
दरअसल कुछ समय पूर्व मृतक राजू खान और दो अन्य अपराधी विनोद सिंह के घर में चोरी के लिये घुसे थे। उन्हों ने रात्रि में सोते हुए विनोद सिंह और उसके परिजनों को बॉंध दिया और चोरी के साथ साथ उसकी पत्नी के साथ बलात्कार भी किया। इन बलात्कारियों में से एक को विनोद सिंह पहचान सकता था और वह अपनी ऑंखों के सामने अपनी पत्नि के साथ बलात्कार की प्रतिहिंसा की आग में जल रहा था और इसलिये राजू खान को गोली मारने के बाद विनोद सिंह ने बगैर किसी पछतावे के कहा कि अगर मैं तीनों अपराधियों को पहचान सकता तो मैं शेष दो को भी मौत के घाट उतारता।
विनोद सिंह के बयान का स्पष्ट अर्थ यही है कि उसका देश की पुलिस व्यवस्था और न्याय व्यवस्था पर विश्वास नहीं बचा। इसके पूर्व जो गोली काण्ड भोपाल न्यायालय के परिसर में हुआ था, वह भी एक व्यक्ति के द्वारा अपने पिता की हत्या के बदले में किया गया था। शासन, प्रशासन और न्याय प्रणाली के कर्ता धर्ताओं को इस घटना को सामान्य सुरक्षा के मुद्दे के रूप में नहीं देखना चाहिए बल्कि व्यवस्था के प्रति अविश्वास के रूप में देखना चाहिए। आये दिन हत्या और बलात्कार के अपराधी प्रमाणों के अभाव में बच निकलते है। अभी पुलिस चाहे तो राजनैतिक या प्रशासनिक दबाब में या फिर अर्थ के प्रभाव में न केवल गवाहों प्रमाणों को बिगाड़ देती है बल्कि इतना लम्बा समय खींचती है कि अभियोजन अत्यधिक कमजोर हो जाता है। अनेक मामलों में न्यायाधीशों ने अपने निर्णय तक में लिखा कि पुलिस ने न तो ठीक ढंग से तफ्तीश की न ही प्रमाणित करने का प्रयास किया। कई बार अभियोजक वकीलान भी अपराधियों से मिल जाते हैं और जान बूझकर ऐसे कमजोर बिन्दु छोड़ देते हैं, जिससे केस की पकड़ कमजोर हो जाये तथा न्यायालय को सजा देना या कठोर सजा देना संभव न हो।
भारतीय न्याय प्रणाली जो ब्रिटिश न्याय प्रणाली से बहुत हद तक प्रभावित है, का यह मान्य सिद्धांत है कि ”सौ अपराधी छूट जायें, एक बेगुनाह को सजा नहीं होना चाहिए” तथा अपराध असंदिग्ध ढंग से किया जाना सिद्ध होना चाहिए। निस्संदेह ये दोनों सूत्र न्याय प्रणाली के लिये आर्दश सूत्र हैं। पर भारत जैसे देश में जिस प्रकार की समाज व्यवस्था बन रही है, उसमें यह सूत्र अमूमन अपराधियों के लिये रक्षक वाक्य बन जाते है।
एक फिल्मी हीरो रात में शराब पीकर पटरी पर सोये निर्दोष गरीबों को दबा कर मार देता है और इसके बावजूद भी वह पिछले 15-20 वर्ष से फिल्मों में काम कर रहा है। जो गरीब मारे गये उनके परिजन जिन्दा हैं या भूख से मर गये, उन पर क्या दुख बीता, यह कोई देखने वाला नहीं है। एक उद्योगपति का बेटा दिल्ली में मध्य रात्रि में पैसे और नशे के मद में न केवल सड़क पर सोये गरीबों को अपनी नयी विदेशी कार से कुचल कर मार देता है, बल्कि उनकी सुरक्षा करने वाले होमगार्ड सिपाहियों को कुचल देता है। घर में गाड़ी ले जाकर उसके परिजन गाड़ी को साफ कराते हैं और सबूत नष्ट कराते हैं। बड़ी मुश्किल से जब मामला न्यायालय में पहुंचता है तब दिल्ली के बड़े वकील जो भारत सरकार को बचाने वाले दलाल और रक्षक भी रहे हैं, एक पूर्व प्रधानमंत्री के नजदीकी व खासम खास रहे हैं, गवाहों को समझाने और सौदा पटाने का माध्यम बन जाते है। इतना ही नहीं जब यह उद्योगपति का बेटा जमानत पर छूट कर जेल से बाहर आता है तो दिल्ली शहर में बड़े – बड़े बैनर लटकाये जाते है। ”वेलकम वेक” और रात्रि में पॉंच सितारा होटल में जो पार्टी दी जाती है, उसमें भारत सरकार के अनेकों मंत्री, सांसद, विधायक एंव उच्च अधिकारी शामिल होते हैं। ऐसी और भी अनेक घटनायें होंगी जिन्हें यहॉं पर उल्लेखित किया जा सकता है।
देश के सफेदपोश अपराधियों का समाज अब अपने समाज के अपराधियों को दण्ड से बचाने के लिये अपने सत्ता-संपर्क, सत्ता-शक्ति, धन-बल, बाहुबल, प्रचार-तंत्र और सभी हथकण्डों का इस्तेमाल करते है। देश की पुलिस व्यवस्था सही मायनों में इसी नकाबपोश अपराधी समूह, जो भद्रलोक माना जाता है कि रक्षा में लगे रहने को लाचार होता है। और परिणामस्वरूप गैर श्रेष्ठि वर्ग की अपराधों से रक्षा के लिये पुलिस प्रशासन तंत्र और न्याय तंत्र के पास समय इच्छा और साधन तीनों का अभाव होता है। जब देश का कोई बड़ा भ्रष्टाचारी सैकड़ों से लेकर लाखों करोड़ रुपये के भ्रष्टाचार के लिये जेल में होता है और जेल से पेशी पर लाया जाता है तब उसकी रक्षा के लिये समूचे न्यायालय को छावनी में बदल दिया जाता है।
मोनिका बेदी और अबू सलेम जब न्यायालय में पेश होने जाते हैं तब भारत का मीडिया और टी.वी. चैनल सर्द रात्रि में तीन बजे रेलवे प्लेटफार्म पर दौड़ लगाते हैं। जाने अनजाने में इन अपराधियों को ग्लैमराइज करते हैं। फूलन देवी ने जो हत्याएं की थी, वे उसके साथ घटित अपराधों की प्रति हिंसा थी, बाद में जातीय प्रतिहिंसा ने फूलन देवी की हत्या कराई। ये प्रकरण केवल सुरक्षा के नहीं है बल्कि व्यवस्था के प्रति अविश्वास के ही हैं, जिन में व्यक्ति को न्याय की कोई उम्मीद नहीं रहती। कहीं न कहीं विनोद सिंह के मन में यह भाव रहा है कि वे अपराधी छूट जायेंगे जिन्हों ने उसकी ऑंखों के सामने उसे बॉंधकर उसकी पत्नी के साथ बलात्कार किया। पुलिस प्रशासन, सरकार और न्यायपालिका सभी को यह सोचना होगा कि कि अगर व्यवस्था से न्याय की उम्मीद समाप्त होगी तो हिंसा और प्रतिहिंसा पैदा होगी। आम आदमी न्याय की तलाश में भटकते – भटकते लाचार होगा और अंत में हाथ में हथियार उठायेगा। फिर विनोद सिंह होंगे या फिर वह शर्मा होंगे, जिसने हरियाणा के पूर्व डी.जी. पी. श्री राठौर, जिसने एक बच्ची को यौन अपराध का शिकार बनाया था, पर हमला किया था।
माननीय न्यायाधीश महोदयों से मेरी अपील है कि वे इन घटनाओं को व्यक्ति सुरक्षा या अदालत परिसर की सुरक्षा के बजाय व्यवस्था की गिरती साख की घटना माने और प्रयास करें कि आम आदमी को सही समय पर सस्ता और सही न्याय मिल सके। न्यायपालिका को खतरा अपराधी से नहीं, समाज से नहीं बल्कि अपने आप से है। क्या यह तथ्य नहीं है कि उच्च न्यायिक संस्थायें, हॉई प्रोफाइल मामलों, जिनके प्रचार के लिये टी.वी. और मीडिया बेताब रहता है, पर अपने कार्यालयीन समय का बड़ा हिस्सा खर्च करता है। देश के करोड़ों लोग न्यायालयों के बाहर पेशी के लिये भटकते रहते है तथा भ्रष्टाचार के शिकार होते हैं परन्तु उनकी फाइलों को देखने सुनने की फुरसत, अदालतों के पास नहीं होती।
लेखक रघु ठाकुर मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

