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युवराज, प्‍यादा, किसान, राजनीति और पीपली लाइव

मदनजीदेश के युवराज को किसानों की चिंता सोने नहीं दे रही है। किसानों की समस्या तभी दूर हो सकती है जब यूपी में सरकार बदल जाये और युवराज की पार्टी सत्ता में आ जाये। युवराज बहुत परेशान हैं यूपी की जालिम सरकार से, जिसने बेचारे निहत्थे किसानों पर गोली चलवाई। युवराज की चिंता जायज है, अगर गोली ही चलवानी थी तो अयोध्या में चलवाती, युवराज भी मदद करते सरकार को बचाने में, जैसे युवराज के पिताश्री ने किया था मुलायम को बचाने के लिये। सैकडों लोग जला दिये गए भट्टा परसौल में। जलनेवाले कहां के थे यह सिर्फ़ युवराज को पता है। उधर बेचारा नत्था उर्फ़ भट्टा परसौल अलग परेशान है किसकी सुने किसे भगाये। अगर कोई सबसे बड़ा हमदर्द है भट्टा परसौल का तो वह भाजपा है,  लेकिन ये नत्था समझता हीं नहीं। वह तो बस फ़िदा है कातिल मुस्कान पर। क्या मुस्कुराहट है युवराज की।

मदनजीदेश के युवराज को किसानों की चिंता सोने नहीं दे रही है। किसानों की समस्या तभी दूर हो सकती है जब यूपी में सरकार बदल जाये और युवराज की पार्टी सत्ता में आ जाये। युवराज बहुत परेशान हैं यूपी की जालिम सरकार से, जिसने बेचारे निहत्थे किसानों पर गोली चलवाई। युवराज की चिंता जायज है, अगर गोली ही चलवानी थी तो अयोध्या में चलवाती, युवराज भी मदद करते सरकार को बचाने में, जैसे युवराज के पिताश्री ने किया था मुलायम को बचाने के लिये। सैकडों लोग जला दिये गए भट्टा परसौल में। जलनेवाले कहां के थे यह सिर्फ़ युवराज को पता है। उधर बेचारा नत्था उर्फ़ भट्टा परसौल अलग परेशान है किसकी सुने किसे भगाये। अगर कोई सबसे बड़ा हमदर्द है भट्टा परसौल का तो वह भाजपा है,  लेकिन ये नत्था समझता हीं नहीं। वह तो बस फ़िदा है कातिल मुस्कान पर। क्या मुस्कुराहट है युवराज की।

युवराज भी क्या करें उनका प्रधानमंत्री एक दम नकारा है, सात साल होने को आये उसे प्रधानमंत्री बने अभी तक किसानों की क्या समस्या है उसे नहीं पता, आखिर युवराज को निकलना पड़ा खुद पता लगाने किसानों की समस्या का। पहले भी राजा भेष बदलकर निकलते थे, अपने राज की जनता का हालचाल लेने। अब भेष बदलने में खतरा है। किसान समझेंगे कि यह दलाल है बिल्डर का। समझते तो अभी भी हैं लेकिन टीवी पर फ़ोटो आयेगा बस इसी से खुश हैं। नत्था अलग असमंजस में है। युवराज कहते हैं कि जमीन की उचित कीमत नहीं मिल रही है, सरकार कम दाम पर खरीद कर बिल्डरों को ज्यादा दाम पर बेच रही है। किसान की समझ में नहीं आ रहा कि यह दो जमीन के दलालों की व्यवसायिक प्रतिद्वंदिता है या वाकई युवराज उनका भला चाहते हैं। पीपली लाइव की तरह पत्रकारों का काफ़िला युवराज के साथ भट्टा परसौल की लाइव दिखा रहे हैं।

एक मूर्ख नौसिखिया पत्रकार मेरे जैसा बीच में टपक जाता है आखिर जमीन ली ही क्यों जाये। किसानों की अन्य समस्या क्या है इसे क्यों नही दिखाते, किसान जमीन क्यों बेचना चाहता है ये दिखाओ, उसकी बॉस बरखा (पीपली लाइव वाली ) झिड़कती है अबे चुप क्या अनाप शनाप बोलकर टीआरपी खराब करना चाहता है, दर्शकों को क्या पता नहीं है किसान की समस्या? दर्शक तो युवराज की मोहक मुस्कान देखना चाहते हैं, तू किसान का बरसात में टपकता घर दिखाना चाहता है, वही देखना होगा तो दर्शक टीवी क्यों देखेगा अपने घर के बाहर की झोपडी नहीं देखेगा। बेचारा एक्टिविस्ट छाप पत्रकार चुप। फ़िर थोड़ा उत्साह में आता है, लेकिन यह सच्ची पत्रकारिता नही है, अबे अब बक बक बंदकर पत्रकारिता क्या है मुझे बतायेगा?  कारगिल में जाते तो पता चलता कवर करने में … फ़टकर हाथ में आ जाती। मूर्ख पत्रकार फ़िर नहीं समझता, मुंह बाकर पूछता है, क्या सच्ची हाथ में आ गई थी। तबतक हल्ला होता है नत्था उर्फ़ भट्टा परसौल वाले मैदान जा रहे हैं निपटने, एक्‍शन, कैमरा, चालू।

उधर युवराज के मंत्री जो खुद कभी राजा थे,  वक्त ने युवराज का प्यादा बना दिया.  भट्टा परसौल को कहते हैं देखो सालों अपनी मांग से पीछे न हटना, ऐसा न हो कि सरकार ज्यादा पैसा देने लगे तो शिकायत वापस ले लेना, फ़िर चेतावनी देते हुये कहते हैं, मालूम है न ई सरकार से बड़ा हमारा सरकार है, जहां समझौता किया इस बार हमलोग तुम्हारी जमीन घर-मकान सहित ले लेंगे, बेचारा नत्था। इस पुराने राजा और नये प्यादा के साथ उस राज्य की मुख्यमंत्री बनने का ख्वाब देख रही गुणा भाग करनेवाली नेत्री चश्मा चढ़ाकर हां में हां मिलाती हैं। तबतक शोर मचता है कोर्ट भी फ़ोटो खिंचाना चाहता है, उसको भी अब किसान की समस्या का पता चला है, उसका आदेश आता है जमीन बिल्डर को नहीं मिलनी चाहिये। राजा उर्फ़ प्यादा युवराज के कान में फ़ुसफ़ुसाकर यह बताते हैं। युवराज कातिल मुस्कान के साथ समझाते हैं भट्टा परसौल क्या एक ही हैं,  अब महापंचायत बुलाकर किसान की समस्या दूर करेंगे जैसे दादी ने देश की गरीबी दूर की थी।

लेखक मदन कुमार तिवारी बिहार के गया जिले के निवासी हैं. पेशे से अधिवक्ता हैं. 1997 से वे वकालत कर रहे हैं. अखबारों में लिखते रहते हैं. ब्लागिंग का शौक है. अपने आसपास के परिवेश पर संवेदनशील और सतर्क निगाह रखने वाले मदन अक्सर मीडिया और समाज से जुड़े घटनाओं-विषयों पर बेबाक टिप्पणी करते रहते हैं.

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