दक्षिण अफ्रीका के हाथों अंतिम ओवर में टीम इंडिया को मिली हार को लेकर उसका पोस्टमार्टम, टीका-टिप्पणी और किसिम किसिम के विश्लेषण मैच के पांच दिन बाद भी बदस्तूर जारी हैं. प्रिंट मीडिया में तो गनीमत है कि बेसिर-पैर की बात कम हो रही है, मगर निजी टेलीविजन चैनलों के परम विद्वान एंकर्स और विशेषज्ञ अनाप-शनाप बके जा रहे हैं. यूँ तो देश में एक अरब से ज्यादा क्रिकेट विश्लेषक हैं और गाँव का होरी और कल्लू भी धौनी को अपनी बेशकीमती सलाह देता है पर इन दिनों जबसे विश्व कप शुरू हुआ है, टीवी चैनल अपनी दुकान चलाने और चमकाने के लिए ”कुछ भी बोल दो, सब चलेगा” शैली में खुद को ज्यादा सहज पा रहे हैं. वे जानते हैं अपने देश के व्यूवर्स यानी दर्शकों को, कि उनको जो भी परोस दो वे उसे सहज भाव से स्वीकार कर लेते हैं और कोई प्रतिक्रिया नहीं देते.
दरअसल यही तो है समस्या की असली जड़. उदाहरण के तौर पर देखिये तो इन दिनों यूसुफ पठान, आशीष नेहरा और मुनाफ पटेल गलत कारणों से टीवी पर छाये हुए हैं. कभी बल्ला हाथ में भी नहीं थामने वाले महाज्ञानी एंकर्स इन दिनों पूर्व टेस्ट खिलाडि़यों को भी अपने लपेटे में ले लेते हैं और बेचारे खिलाड़ी विशेषज्ञ जब अपनी दिहाड़ी के लिए उनकी हां में हां मिलाते हैं, तो जानकार दर्शक अपना माथा पीट लेते हैं और इस नकारात्मकता की भी टीआरपी शायद जबरदस्त आती होगी, तभी तो यह व्यापार धड़ल्ले से चल रहा है. कहा जा रहा है कि पठान सभी मैचों में नाकाम रहे हैं, उनको हटाओ और रैना को लाओ. इसी तरह से यह राय दी जा रही है कि मुनाफ को हटा कर आफ स्पिनर अश्विन को लाओ. इनमे कुछ तो टीम के ”दीवाने खास” में घुसने का दावा करते हुए यहाँ तक मसालेदार खबर परोस रहे हैं कि नेहरा को लेकर टीम एकमत नहीं है.
इस मुद्दे पर टीम के कुछ वरिष्ठ खिलाड़ी नौ विकेट ले चुके मुनाफ को हटाने और नेहरा को, जिसने अंतिम ओवर में 13 रन देकर मैच अफ्रीका की झोली में डाल दिया था, खिलाने के पक्ष में हैं. क्या सच है और क्या झूठ ये तो राम जानें. मगर जिसको खेल की ज़रा सी भी समझ होगी, वो इस तरह की ख़बरों पर कभी कान नहीं देगा. टेस्ट खेलने के पूर्व कभी जिम का मुंह तक भी नहीं देखने वाले तेज गेंदबाज नेहरा का चोटों के साथ चोली दामन का साथ रहा है और वो पिछले दो महीनों से मैदान के बाहर अपनी चोट सहलाने में ही लगे हुए थे और इस बीच खेलने का सवाल ही नहीं था. नेहरा को चाहिए लय और वो उन्हें मैच अभ्यास से ही मिल सकती थी. कुपरिणाम सामने आया. सच तो ये है कि नेहरा 2003 विश्व कप के प्रदर्शन की तुलना में छाया भर भी नहीं नज़र आ रहे हैं और ऐसे लंगड़े घोड़े को चुनने की कीमत देश को चुकानी पड़ रही है. उन्हें एकादश में ढोए रखना और वो भी वेस्टइंडीज के खिलाफ अहम मुकाबले में, वाकई बात कहीं से भी हजम नहीं हो रही है. दूसरी और मुनाफ धीमे जरूर हुए हैं पर वो अपेक्षाकृत ज्यादा अचूक हैं.
जहाँ तक पठान का सवाल है तो हम पहले भी न जाने कितनी बार कह चुके हैं कि यह हरफनमौला अभी तक अपने कप्तान का विश्वास नहीं जीत सका है. तभी तो उनके साथ अजब खेल खेला जा रहा है, अलग-अलग बल्लेबाजी क्रम में उतार कर. जबकि हर कोई जानता है कि पठान के सभी शतक और अर्धशतक छठी और सातवीं पोजीशन पर खेलते हुए ही आये हैं. मैं नहीं समझता कि अभी तक इस विश्व कप में पठान का असली परीक्षण हुआ है. ऐसे में उसको हटाया जाना निरा मूर्खता ही कहा जाएगा. एक सवाल टीम इंडिया के प्रबंधन से यह भी पूछा जा सकता है कि टीम हित की कीमत पर जब चावला के आत्मविशवास की बहाली के लिए उसे लगातार तीन मैच खिलाये जा सकते हैं, तो श्रीसंत को पहले मैच की असफलता के बाद क्यों किनारे कर दिया गया? क्या श्रीसंत के लिए यह क्रिकेट महाकुम्भ सिर्फ पांच ओवर की गेंदबाजी का बन कर ही रह जाएगा, जबकि स्पर्धा शुरू होने के पहले यह तेज गेंदबाज जबरदस्त फार्म में था और तभी उसको प्रवीण का विकल्प माना गया था. अपने असंयत आचरण के चलते क्या उसे भी धौनी की खुंदक का शिकार न माना जाये?
चेन्नई में रविवार को कैरेबियाइयों से होने वाले मुकाबले में टीम इंडिया की कौन सी एकादश उतरेगी इसका अनुमान लगाना लगभग नामुमकिन सा है. क्योंकि आजकल चयन का आधार विशुद्ध क्रिकेटीय नहीं होता. न जाने कौन से नाम स्पाट सट्टेबाजी में पंटरों को जैकपाट दिला देंगे कोई नहीं जानता मगर पिच, परिस्थितियों और सामने वाली टीम के मद्देनज़र निम्न एकदश होनी चाहिए- धौनी ( कप्तान ), सचिन, सहवाग, गंभीर, कोहली, युवराज, पठान, हरभजन, अश्विन (तीन सीमर्स खिलाने के स्थिति में अश्विन के स्थान पर नेहरा या श्रीसंत में कोई एक), मुनाफ और ज़हीर.
लेखक पदमपति शर्मा वरिष्ठ पत्रकार हैं. इनकी गिनती देश के जाने-माने हिंदी खेल पत्रकारों में होती है.

