Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

तेरा-मेरा कोना

ये अयोध्‍या है, जहां कभी युद्ध नहीं हुआ

जैन मंदिर: लोगों को फैसले की नहीं रोजगार और महंगाई की चिंता है : अयोध्या मर्यादित है, अयोध्या संयमित है, अयोध्या शांत है. फिर कौन हैं वो जो इस मर्यादा, संयम और शांति में दंगे ढूंढ रहे हैं. नेता, धर्म के झंडाबरदार, शरारती तत्त्व या फिर कोई और या फिर मीडिया? बकौल शायर “सवाल इतने नहीं हैं जवाब जितने ज्यादा हैं” 24 सितम्बर को आने वाले फैसले की गहमागहमी यहाँ दिखाई तो देती है पर तब, जब जवानों के बूटों की थाप यहाँ के सन्नाटे को चीरकर ये अहसास दिलाती है कि सब कुछ ठीक नहीं है. वर्ना अयोध्या की जानी-अनजानी हलचल की खबर भी इन्हें मीडिया की बाइट या नेता जी के समर्थकों के नारों के हुंकार से मिलती है.

जैन मंदिर

जैन मंदिर: लोगों को फैसले की नहीं रोजगार और महंगाई की चिंता है : अयोध्या मर्यादित है, अयोध्या संयमित है, अयोध्या शांत है. फिर कौन हैं वो जो इस मर्यादा, संयम और शांति में दंगे ढूंढ रहे हैं. नेता, धर्म के झंडाबरदार, शरारती तत्त्व या फिर कोई और या फिर मीडिया? बकौल शायर “सवाल इतने नहीं हैं जवाब जितने ज्यादा हैं” 24 सितम्बर को आने वाले फैसले की गहमागहमी यहाँ दिखाई तो देती है पर तब, जब जवानों के बूटों की थाप यहाँ के सन्नाटे को चीरकर ये अहसास दिलाती है कि सब कुछ ठीक नहीं है. वर्ना अयोध्या की जानी-अनजानी हलचल की खबर भी इन्हें मीडिया की बाइट या नेता जी के समर्थकों के नारों के हुंकार से मिलती है.

मैं ये बात यूं ही नहीं लिख रहा वाकई शराफत भाई को फर्क ही नहीं पड़ता कि विवादित स्थल पर हक किसका अदालत सुनाएगी. उन्हें तो चिंता है कि बारिश की वजह से तीन दिन तक ठेला नहीं लगाया. खर्चा कैसे चलेगा. सुबह उठकर दिनचर्या निपटाकर अपने-अपने कार्यस्थल पर ही छोटे शहरों के बाशिंदों की तरह “टाइम पास” बहसबाजी में “मुन्नी के झंडू बाम” से ज्यादा महत्व फैसले का नहीं है. कहते हैं इस हिट गाने को यहीं की तारा बानो फैजाबादी ने लिखा है, सालों पहले. तब मुखड़ा था “मुन्नी बदनाम हुई नसीबन तेरे लिए” अब थोड़ा बदल गया है. अब तारा बानो तो मुम्बई चली गयीं…. ओह तो दूसरे नंबर पर इस मुद्दे पर भी टाइम पास हो जाय. हाँ स्थानीय चिंता का विषय है “पुलिस फ़ोर्स तो आय गय, बस सरवा बहरिये न आवैं तौ सब ठीक है”

नुक्कड़ चौराहों पर गपियाते निवासी धर्म विवाद से परे हैं. उन्हें चिंता फैसले के पहले फैसले के बाद अपनी रोजी रोटी को लेकर है. दुकानदारों को कानपुर, दिल्ली के व्यापारियों ने आशंका के चलते उधार देना बंद कर दिया. नगद पर भी अपनी गाड़ी तो कत्तई भेजने को तैयार नहीं हैं. व्यवसाय ठप हो रहा या शायद हो गया है. फ़ोर्स आ जाने से गैस गायब है, सब्जी मिलना दूभर है. जो मिल रही है उसमे आलू चालीस रुपये और प्याज पैंतीस रुपये की है. ले सकते हो तो लो. लहसुन तो डेढ़ शतक का भी आंकड़ा पार करने को बेताब है. राम प्रसाद चिढ़ गए हैं कहते हैं “ई ससुरन का पीपली लाइव देखाओ, हम तो गावे नहीं जानित हैं, पर उ का है महंगाई डायन खाए जात है.”

इस आशंका का क्या किया जाय जो यहाँ सभी को है कि बाहरी नेता आयेंगे. कोई सद्भाव बनाने की अपील करेगा तो कोई राम लला से कसम खायेगा और यहाँ रह जायेंगे मंसूर और जावेद, राम पदारथ और विशाल. एक चैनल सबसे बड़ी बहस चला रहा था कि अयोध्या किसकी. जब दर्शकों ने कहा कि साहब हम तो बस सुकून और विकास चाहते हैं, तो एंकर साहब बाजारवाद के पिछलग्गू होने का प्रमाण देते हुए बोल पड़े कि अयोध्या के लोगों की मानसिकता देश में आये उदारीकरण की वजह से तो नहीं बदल गयी. अरे भाई थोडा सा और रिसर्च कर लेते. तो पता चलता कि विवादित परिसर से कुछ दूरी पर एक भवन है जहाँ हिन्दू-मुसलमान ही नहीं ईसाई और पारसियों की भी इबादतगाह बनी हुई है, एक ही छत के नीचे. अयोध्या वो मस्तक का तिलक है जहाँ ऋषभदेव के जन्मस्थान पर बनी मस्जिद को मुसलमानों ने जैनियों को सौंप दिया. कहा अपनी मंदिर बना लो. ज्यादा पुरानी बात नहीं है.

सन 1965 में ही जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव का मंदिर मुसलमानों द्वारा दी गयी जमीन पर बना. क्यूंकि नेता लोग नहीं जान पाए और आप बड़ी बहस वालों का जन्म नहीं हुआ था. फक्र होता है कि अयोध्या मेरी जन्मभूमि है. जहाँ कभी दंगा नहीं हुआ. होगा भी क्यूँ, न इन्हें मतलब मंदिर से है न उन्हें वास्ता मस्जिद से. हनुमान गढ़ी में फूल बेचते, श्रृंगार हाट में फल बेंचते, हरद्वारी बाजार में कपडा सिलते रहमान, वसीम और कादिर मिलेंगे तो अड़गड़ा मस्जिद में जाते और शीश पैगम्बर नौगजी पर दुआएं मांगते राहुल, इंदु, अभय और सोनपता क्यूंकि ये अयोध्या है, जहाँ कभी युद्ध नहीं हुआ.

अयोध्या को इस पहलू से देखने की कोशिश मेरी जानकारी में सिर्फ लाइव इंडिया ने ही की. सिक्के के इस ओर अपने सनगन की रौशनी वाकई लाइव इंडिया ने ही बाउंस की. वर्ना अभी तक 1885 से 1992 तक ही ज्यादातर टीवी वाले केन्द्रित रहे. खैर अयोध्या, जहाँ मर्यादा है, शांति है, विश्वास है, अमन चैन है. मोहब्बत भरी इस नगरी को फैसले में नहीं अमन चैन में भरोसा है. अयोध्या किसकी, ये फैसला दिल्ली या गुजरात नहीं अयोध्या करेगी. ये नैतिक मौलिक अधिकार तो इसे मिलना ही चाहिए. आखिर में ये शेर गुनगुनाने का मन कर रहा है….
न ये वस्ल हिन्दू था, न ये हिज्र मुसलमान है,
मेरा मजहब नहीं, अब तो मेरा दर्द ही मेरी पहचान है.चंदन श्रीवास्‍तव

लेखक चंदन श्रीवास्‍तव फैजाबाद के निवासी हैं तथा लाइव इंडिया से जुड़े हुए हैं.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You May Also Like

मेरी भी सुनो

अपनी बातें दूसरों तक पहुंचाने के लिए पहले रेडियो, अखबार और टीवी एक बड़ा माध्यम था। फिर इंटरनेट आया और धीरे-धीरे उसने जबर्दस्त लोकप्रियता...

राजनीति-सरकार

मोहनदास करमचंद गांधी यह नाम है उन हजार करोड़ भारतीयों में से एक जो अपने जीवन-यापन के लिए दूसरे लोगों की तरह शिक्षा प्राप्त...

साहित्य जगत

पूरी सभा स्‍तब्‍ध। मामला ही ऐसा था। शास्‍त्रार्थ के इतिहास में कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि किसी प्रश्‍नकर्ता के साथ ऐसा अपमानजनक व्‍यवहार...

मेरी भी सुनो

सीमा पर तैनात बीएसएफ जवान तेज बहादुर यादव ने घटिया खाने और असुविधाओं का मुद्दा तो उठाया ही, मीडिया की अकर्मण्यता पर भी निशाना...