: कर्म और भक्ति का समवेत भाव खोजा सिद्धा ने : यह ना तो द्रोपदी थी और ना ही राधा। हां, तुलना मीरा से जरूर की जा सकती है। इसका ताल्लुक ना तो ब्रज से रहा और ना ही वृन्दावन से। मीरा की तरह राजस्थान के किसी राजपरिवार से भी यह सम्बन्धित नहीं रही। लेकिन कुल मिलाकर यह कहानी कृष्ण के ही इर्दगिर्द घूमती रही और इस तरह मीरा की ही तरह की वंश-परंपरा में इस महिला का नाम अमिट हो गया। मीरा जैसी यह महिला भी अपना सर्वस्व कृष्ण के चरणों में न्योछावर कर भक्ति-इतिहास में अपना नाम स्वर्णाक्षरों में दर्ज करा गयी। नाम था सिद्धा परमेश्वरी बाई जिसका प्रताप आज भी ब्रज की कुंज गलियों में ही नहीं, आसपास फैले गांवों और घोर जंगलों तक में व्याप्त है। तभी तो इस इलाके में राधा-कृष्ण के जयनाद के साथ सिद्धा परमेश्वरी बाई के जयकारे भी खूब गूंजते हैं।
ब्रज में यमुना के किनारे धूनी रमाने वाले वैष्णव गुरू बाबा दामोदरदास का नटवरकुंज अपनी सादगी और पवित्रता के लिए विख्यात था। ना किसी से कोई अपेक्षा और न लालसा। दिखावा और प्रचार भी नहीं। कभी जरूरत ही नहीं समझी गयी। चार गायों और दो शिष्यों के साथ पूरा कुंज अपने में मस्त रहता था, कि अचानक कड़ाके की एक सर्द रात में हो रही बारिश में गाय के रंभाने की आवाज ने कुंज की शांति-भंग कर दी। बाबा ने अपने शिष्यों को जगाया तो डरावनी बारिश में गाय के पास एक रूपसी महिला बेहोश पड़ी दिखी। आनन-फानन उसे धूनी के पास लिटाया गया। सामाजिक निन्दा के डर से पहले तो बाबा इस महिला को चलता करने पर आमादा थे, लेकिन उसकी करूण गाथा ने बाबा का हृदय द्रवित कर दिया। उसकी दीन-हीन दशा के बावजूद उसमें बसे कृष्ण-प्रेम पर बाबा प्रफुल्लित हो उठे। उसमें उन्हें साक्षात राधारानी दिख गये।
पूछताछ में पता चला कि उसका नाम मालती दास है। बंगाल के एक मध्यम आयवर्गीय कायस्थ माता-पिता के घर जन्मी मालती के पिता का निधन बचपन में ही हो गया। बेहद लावण्यमयी मालती का विवाह कलकत्ता के एक जानेमाने धनी और व्यापारिक परिवार में हुआ, जहां विशालकाय हवेलियां और ऐश्वर्य के सारे साधन थे। राजरानी बन गयी मालती। कुछ समय बाद एक सुंदर बेटे की किलकारियों से मालती की गोद सज गयी। लेकिन हाय रे काल का नियम। कुछ समय बाद ही पति चल बसे। एक ओर वैधव्य और ऊपर से कठोर बंगाली परम्पराओं ने मालती को खूब तोड़ा। हालांकि उसने हौसला नहीं खोया और अपनी सम्पत्ति की रक्षा करती रही। लेकिन उसके चचेरे जेठ की कुदृष्टि पड़ गयी। मालती के रूप-लावण्य के प्रति आसक्त के चलते उसने मालती के दुधमुंहे बेटे को मरवा दिया।
पति के बाद बेटा भी खो जाने से मालती स्तब्ध थी। जीवन के लिए कोई अवलम्बन बचा ही नहीं। जिये तो किसके सहारे। आंसुओं की अविरल धारा बह चली। अचानक एक दिन उसकी निगाह राधा-माधव की प्रतिमा पर पड़ी। ना जाने कौन सा आकर्षण था उस प्रतिमा में कि अचानक उसके आंसू सूख गये। बस फैसला हो गया। जीवन तो अब कान्हा के नाम पर समर्पित रहेगा। अगले ही दिन सारी सम्पत्ति एक ट्रस्ट के नाम कर केवल एक धोती में वृंदावन की ओर कूच कर दिया।
बाबा ने भी उसे अपनी बेटी के तौर पर पाला। दीक्षा दी और नाम रखा कुंजदासी। बाबा ने कुंजदासी को योग और ध्यान सिखाया। वे कुंजदासी को माई कहते थे। कठोर परिश्रम से कुंजदासी ने आश्रम का सारा दायित्व सम्भाला। वह यमुना से गागर में जल भर कर पूरे आश्रम तक लाती और पूजा-अर्चना तक का काम देखती। पूरा आश्रम राधेकृष्ण की ध्वनि से गुंजित होने लगा। दिन बीतने के साथ ही बाबा के माथे की रेखाएं बढने लगीं। आखिर व्यक्ति को सम्पूर्ण सिद्धि के लिए एक दिन स्वतंत्र तो होना ही होगा। इसके बिना चारा कहां। आखिर बाबा के निर्देश का दिन आया। बोले- माई, तुम्हारी साधना में कृष्णकृपा का उदय हो चुका है। जाओ, अब नटवरनागर और किशोरी की स्वतंत्र उपासना करो। और यह काम एकांत साधना से ही सम्भव है।
परमेश्वरी दासी के नये नामकरण के साथ बाबा ने कुंजदासी को उस घने विहार-वन नामक जंगल में भेजा जिसके बारे में कहा जाता है कि वह राधा और कृष्ण की विहार-स्थली थी। वन में परमेश्वरी दासी ने अपने अकेले दम पर लकडियां और घास-पात इकट्ठा करके कुटी बनायी और शुरू हो गया कृष्ण की उपासना का यज्ञ। सिद्धा ने राधा का स्थान लेने की कभी कोशिश नहीं की। वह दोनों के विग्रह की समान भाव से उपासना करती थी। केवल जंगली कंद-मूल-फल और उस इलाके के इकलौते कुंए के बेहद खारे पानी पर ही जिन्दा थीं। कहा जाता है कि करीब दस वर्षों तक वे अदृश्य रहीं। हालांकि इस बीच बाबा साल में एकाध बार उनका हालचाल लेते रहे। एक दिन बाबा ने सिद्धा को अंतिम दर्शन देकर लौकिक शरीर छोडा।
उधर अब साठ साल की हो चुकी परमेश्वरीदासी में वैष्णवी सिद्धिप्राप्ति का अनोखा प्रकाशपुंज समाया। अचानक एक दिन एक लकड़हारा भीखनलाल उधर से गुजरा तो तेज के आगे नतमस्तक हो गया। मां परमेश्वरी ने उसे आशीष दिया और वह आज्ञाकारी भक्त की तरह उनकी शरण में आ गया। इसके बाद इस पर्णकुटी में पहली बार मीठा पानी लाने का जिम्मा भीखन ने ही सम्भाला। अब परमेश्वरी दासी की ख्याति जंगल में आग की तरह फैल गयी। एक अंग्रेज शिकारी से जंगल की चिडियों को और उसकी बुरी नीयत से खुद को किस तरह बचाया यह तो बाद में किंवदंतियों में जा जुडा। ब्रज, गोकुल, वृंदावन के लोगों की भक्ति विहारवन की ओर बढ़ी तो बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं का तांता जुड़ा। मां ने किसी को आश्रम में रूकने की इजाजत कभी नहीं दी। भेंट की वस्तु आश्रम में कभी नहीं बचायी। रोज का निपटारा रोज।
अब लोग परमेश्वरी को मां सिद्धा परमेश्वरी बाई के नाम से पुकारने लगे। कोई वंश-वृद्धि की आकांक्षा से आता तो कोई बीमारी-व्याधि से छुटकारे के लिए। मां केवल उन्हें राधा-कृष्ण की भक्ति का उपदेश देतीं और लोग मानने लगे कि उनकी आकांक्षा इतने भर से ही पूरी हो गयी। मां ने हमेशा माना कि भक्ति का मार्ग ही सभी व्याधियों और विकारों का शमन करता है। उन्होंने कृष्ण के कर्म और राधा की भक्ति का मार्ग बताया। कृष्ण को परमात्मा मान कर किया गया कोई भी काम कभी अधूरा नहीं होता। कृष्ण और राधा का प्रेम ही संसारिक विकारों से मुक्ति का मार्ग है। बताते हैं कि 1910 के एक कृष्ण पक्ष की रात मां परमेश्वरी सिद्धा राधाकृष्ण में विलीन हो गयीं।
लेखक कुमार सौवीर लखनऊ के जाने-माने पत्रकार हैं. इन दिनों महुआ न्यूज में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्यरत हैं. उनका यह लेख जनसंदेश टाइम्स में प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लिया गया है.

