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ये मायावती का भी अपमान है

गाजीपुर के एसएसपी रविकुमार लोकू इससे पहले गाजियाबाद के एसएसपी थे। रिपोर्टिंग के सिलसिले में उनसे कई बार मिलने का मौका मिला। उन्हें देखकर या उनकी कार्यशैली को करीब से जानकर कभी भी ऐसा नहीं लगा कि वे किसी थानेदार को अपने उपर हावी नहीं होने देते हैं। हम पत्रकारों के साथ हमेशा उनका दोस्ताना रवैया होता था। पत्रकारों से हर विषय पर खुलकर बातें भी करते थे। उनकी बातों से लगता था कि वे धर्मभीरू व्यक्ति हैं। अक्सर कहा करते थे कि पैसा कमाकर क्या करूंगा गॉड के आगे पैसे की नहीं चलती है। उस समय यहां विजय भूषण एसपी सिटी थे। विजय भूषण काफी तिकड़मी थे और लोकू और उनके बीच में तनातनी बनी रहती थी। एसपी सिटी के बसपा नेताओं से अच्छे संबंध थे लेकिन इसके बाद भी हम लोगों के साथ बातचीत के दौरान कई बार उन्होंने एसपी को झिड़क दिया।

गाजीपुर के एसएसपी रविकुमार लोकू इससे पहले गाजियाबाद के एसएसपी थे। रिपोर्टिंग के सिलसिले में उनसे कई बार मिलने का मौका मिला। उन्हें देखकर या उनकी कार्यशैली को करीब से जानकर कभी भी ऐसा नहीं लगा कि वे किसी थानेदार को अपने उपर हावी नहीं होने देते हैं। हम पत्रकारों के साथ हमेशा उनका दोस्ताना रवैया होता था। पत्रकारों से हर विषय पर खुलकर बातें भी करते थे। उनकी बातों से लगता था कि वे धर्मभीरू व्यक्ति हैं। अक्सर कहा करते थे कि पैसा कमाकर क्या करूंगा गॉड के आगे पैसे की नहीं चलती है। उस समय यहां विजय भूषण एसपी सिटी थे। विजय भूषण काफी तिकड़मी थे और लोकू और उनके बीच में तनातनी बनी रहती थी। एसपी सिटी के बसपा नेताओं से अच्छे संबंध थे लेकिन इसके बाद भी हम लोगों के साथ बातचीत के दौरान कई बार उन्होंने एसपी को झिड़क दिया।

अब यह समझ में नहीं आ रहा है, जो व्यक्ति गाजियाबाद में पोस्टिंग के दौरान किसी को हावी होने नहीं दिया और पत्रकारों के साथ सौहार्द बनाए रखने की कोशिश में रहते थे, वे गाजीपुर में जाकर अचानक इस तरह से निस्प्रभाव और संवेदनहीन कैसे हो गए। जो व्यक्ति गाजियाबाद के कार्यकाल के दौरान महिलाओं के सम्मान और अधिकारों के बारे में ऊंची-ऊंची बातें किया करते थे, वे पूर्वांचल में जाने के बाद अचानक बदल कैसे गए। महिलाओं के बारे में उनका ख्याल कैसे बदल गया। मुझे लगता है कि वे भी अब राजनीति के प्रभाव में आ गए हैं। अगर ऐसा है तो यह और भी गंभीर घटना होगी।

बात यशवंत की मां या भाभी की नहीं है, बात यह है कि पुलिस को इतनी ताकत किसने दी कि उसने तीन महिलाओं को सिर्फ दबाव बनाने के लिए पूरी रात थाने में बिठाए रखा। यह यशंवत की मां का अपमान नहीं है यह पूरी नारी जाति का अपमान है। नारी को समाज में सम्मान दिलाने की बात करने वाली मायावती का अपमान है। यह तो अच्छा हुआ कि यशवंत भाई ने इसे चुनौती के रूप में स्वीकार कर पूरे देश को माया सरकार के खाकी वर्दीधारी गुंडों से परिचित करा दिया। रोज न जाने कितनी मांए, भाभी और बहनें इन निरंकुश और पैसे की भाषा जानने वाले दरिंदों के हाथों अपमानित होती रहती हैं।

हो सकता है कि यशंवत भाई की मां कुछ दिनों बाद इस घटना को भूल जाएं। हो सकता है कि नंदगंज के दारोगा को सस्पेंड कर दिया जाए लेकिन सभ्य समाज क्या इस घटना को यूं ही भूला सकता है। हर्गिज नहीं। पुलिस की दंरिदगी का यह मात्र नमूना है। इससे भी ज्यादा दरिंदगी पुलिस दिखाती है, खासकर यूपी में। तो क्या अब पानी सर से ऊपर नहीं बह रहा है। क्या हम सभ्य समाज पुलिस की इस दरिंदगी को आसानी से सहन करते रहेंगे।

अब समय आ गया कि समाज के सभी वर्ग इस बात पर गंभीरता से सोचे कि इस सरकारी उद्दंडता और गुंडागर्दी पर कैसे रोक लगाई जा सकती है। कैसे पुलिस के आला अधिकारियों को जनता के प्रति जवाबदेह बनाया जा सकता है। पुलिस रिफार्म, जिसकी जरूरत खुद प्रधानमंत्री तक जाहिर कर चुके हैं, उसे कैसे अमल में लाया जा सकता है। कैसे पुलिस को राजनीति प्रभाव से मुक्त किया जा सकता है। अब चूंकि यशवंतजी ने कैंपेन छेड़ दिया है, उम्मीद करनी चाहिए कि इस महत्वपूर्ण विषय पर एक सार्थक बहस के बाद पहल होगी।

लेखक सुब्रत भट्टाचार्य गाजियाबाद से प्रकाशित हिन्‍ट के समाचार संपादक हैं. इसके पूर्व डीएलए में भी काम कर चुके हैं.

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