एनडीटीवी इमेजिन पर इन दिनों महाविवादित, महाहौसलामंद सेलिब्रिटी राखी सावंत लोगों का इंसाफ करने में जुटी हुई हैं। आप पूरा प्रोग्राम देखकर बताएं कि इसमें राखी इंसाफ करती हुई दिखती है या फिर खुलेआम अश्लीलता का पाठ पढ़ती हुई गंदी टिप्पणी करती दिखती हैं। रायपुर से मेरे एक रिश्तेदार गुलाब हसीजा ने फोन पर मुझसे दो-तीन बार हुई बातचीत में इस कार्यक्रम के बारे में चर्चा की थी, उन्होंने ही मेरा ध्यान आकृष्ट कराया कि शो में जमकर अश्लील बातें की जाती है। गंदे शब्दों का इस्तेमाल करके कानून का मजाक उड़ाया जा रहा है। गुलाब जी पूर्व में कुछ दिनों तक पत्रकार रहे थे, बाद में पारिवारिक कारणों से उन्होंने पत्रकारिता छोड़कर होटल का व्यवसाय अपना लिया। मन में छुपकर बैठा कलमकारी का जज्बा उन्हें चैन से बैठने नहीं देता, पर वे लिखने में अपना समय नहीं दे पाते, लिहाजा उन्होंने मुझसे कहा कि इस मुद्दे पर लिखते क्यों नहीं, मैंने कहा कि शो को देखने के बाद ही लिख पाऊंगा।
इत्तेफाक से 7 नवंबर को मैं वह शो देख पाया। 7 नवंबर की रात दिखाए जा रहे एपिसोड में तो अश्लीलता की सारी हदें पार ही कर दी गई। कास्टिंग काउच का भंडाफोड करने का स्वांग रचकर स्त्री और पुरूष जाति को भद्दे-भद्दे अलफाजों से नवाजा गया। शो में इंसाफ मांगने आई माडल रितु और कास्टिंग डायरेक्टर वंश पाठक ने एक दूसरे से मारपीट की, एक और माडल ने वंश पाठक पर अपनी सैंडिलें भी फेंकी, जिसके जवाब में वंश ने भी उससे पीटने की कोशिश की। क्या इस तरह किसी शो में हिंसा दिखाना अपराध नहीं? शो के दौरान राखी सावंत ने यह टिप्पणी भी की कि ये लड़के महिलाओं को अपने बाप का माल समझते हैं क्या? मंच पर मौजूद एक शख्स को उसने कह दिया कि तू फट्टू है। यह सब देखकर भी लोग चुप हैं या मजे ले रहे हैं।
इस कार्यक्रम में पुरूषों को ही नहीं, महिलाओं को भी अपमानित किया जा रहा है। जब राखी जैसे लोग इंसाफ के नाम पर यह सब करेंगे तो जाहिर है कि वह इंसाफ नहीं कानून का मजाक भी है और इंसाफ जैसे पवित्र काम करने का हक आखिर उसे किसने दे दिया, यह एक बड़ा सवाल है। इसके पहले भी मशहूर आईपीएस अधिकारी रहीं किरन बेदी स्टार प्लस पर आपकी कचहरी के नाम से लोगों के परिवारों की समस्याएं सुलझाने में लगी हुई थीं, उस कार्यक्रम में एक मर्यादा झलकती थी, लोग भद्दे लफ्जों का इस्तेमाल नहीं कर पाते थे। लेकिन राखी के ऐसे इंसाफ ने तो इंसाफ जैसे पवित्र लफ्ज के मुंह पर तमाचा ही मारा है। इतनी घटिया हरकतें टीवी चैनल पर देखने के बाद तो यही लगता है कि देश का सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय कुंभकरण की तरह सो रहा है। जिसे जगाने के लिए बड़े-बड़े ढोल-नगाड़ों, छप्पन भोग, पूरी-पकवानों और 5 डेसीबल से अधिक आवाज वाले पटाखों की जरूरत है, फिर भी यह कुंभकरण जाग जाएगा, इसमें संदेह है।
लेखक रतन जैसवानी जांजगीर-चांपा छत्तीसगढ़ में पत्रकार हैं.

