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राजनीति फायदे के लिए जज्‍बात को मत छेडि़ए

संजयजीगुजरात एक नया इतिहास रच रहा है। लेकिन कुछ कड़वी यादें उसे उन्हीं अंधेरी गलियों में ले जाती हैं, जहां से वह बहुत आगे निकल आया है। गुजरात दरअसल आज विकास और प्रगति के नए मानकों की एक ऐसी प्रयोगशाला है जहां सांप्रदायिकता के सवाल काफी छूट गए हैं। उसे विकास और गर्वनेंस के नए माडल के रूप में देखा जा रहा है। ऐसे में गोधरा काण्ड पर आया फैसला एक बार फिर छद्मधर्मनिरपेक्ष ताकतों को एक अवसर की तरह है कि वे हमेशा की तरह इस फैसले की नुक्ताचीनी करें और उसके अर्नथों को विज्ञापित करें। यह कोशिश शुरू हो गयी हैं। किंतु हमें यह सोचने की जरूरत है कि ऐसी व्याख्याओं से हमें क्या हासिल होगा ? क्या गुजरात को देने के लिए हमारे पास कोई नए विचार हैं? अगर नहीं हैं तो जो गुजरात दे रहा है उसे लेने में हममें संकोच क्यों है?

संजयजी

संजयजीगुजरात एक नया इतिहास रच रहा है। लेकिन कुछ कड़वी यादें उसे उन्हीं अंधेरी गलियों में ले जाती हैं, जहां से वह बहुत आगे निकल आया है। गुजरात दरअसल आज विकास और प्रगति के नए मानकों की एक ऐसी प्रयोगशाला है जहां सांप्रदायिकता के सवाल काफी छूट गए हैं। उसे विकास और गर्वनेंस के नए माडल के रूप में देखा जा रहा है। ऐसे में गोधरा काण्ड पर आया फैसला एक बार फिर छद्मधर्मनिरपेक्ष ताकतों को एक अवसर की तरह है कि वे हमेशा की तरह इस फैसले की नुक्ताचीनी करें और उसके अर्नथों को विज्ञापित करें। यह कोशिश शुरू हो गयी हैं। किंतु हमें यह सोचने की जरूरत है कि ऐसी व्याख्याओं से हमें क्या हासिल होगा ? क्या गुजरात को देने के लिए हमारे पास कोई नए विचार हैं? अगर नहीं हैं तो जो गुजरात दे रहा है उसे लेने में हममें संकोच क्यों है?

क्या सिर्फ इसलिए कि नरेंद्र मोदी नाम का एक आदमी वहां मुख्यमंत्री है, जिसने इस देश को एक राज्य के विकास का माडल दिया। जिसने गुजराती समाज को उसकी अस्मिता की याद दिलाई और गुजरात को विकास के एक ब्रांड में बदल दिया है।  ऐसे समय में जब दुनिया के सारे कारपोरेट, देश के बड़े घराने ही नहीं, विकास के काम में लगी एजेंसियां गुजरात को एक आर्दश की तरह देख रही हैं, क्या जरूरी है कि हम गोधरा और उसके बाद घटे गुजरात के दंगों की उन खूरेंजी यादों के बहाने जख्मों को कुरेदने का काम करें। आखिरकार साबरमती जेल में गठित विशेष कोर्ट ने 27 फरवरी,2002 को गोधरा रेलवे स्टेशन पर एस-6 डिब्बे में आग लगने की घटना को हादसा नहीं वरन एक साजिश करार देते हुए 31 लोगों को दोषी ठहराया है। इसके साथ ही सबूतों के अभाव में 63 लोगों को बरी कर दिया गया। प्रत्यक्ष सबूत न होने के आधार पर बरी होने का अर्थ किसी का बिल्कुल निर्दोष होना नहीं है।

वैसे भी, अभियुक्तों की तरह ही गुजरात पुलिस के सामने भी उच्च एवं उच्चतम न्यायालय में जाने का विकल्प खुला है। अफसोस की बात है कि फैसला आने के बाद भी बहुत से राजनेताओं और संगठनों की प्रतिक्रिया रेल कोच में मारे गए कारसेवकों के प्रति उतनी ही संवेदनहीन है। इसी के चलते हमारे कथित धर्मनिरपेक्षतावादियों पर संदेह होता है और उनके प्रति एक प्रतिक्रिया जन्म लेती है। मारे गए कारसेवकों को प्रति निर्ममता का वक्तव्य देकर आप किसकी मदद कर रहे हैं। मृतकों के प्रति तो शत्रु भी सदाशयता का भाव रखता है। किंतु हमारे राजनेता लाशों की राजनीति से भी बाज नहीं आते। विशेष जांच दल (एसआइटी) के आरोप-पत्र में वर्णित घटनाक्रम को न्यायालय ने लगभग स्वीकार कर लिया है। इसमें अमन गेस्ट हाउस में साजिश रचने की बैठक से लेकर वहीं पेट्रोल रखने तथा उसे पीपे द्वारा डिब्बे के बाहर से अंदर डालने और कपड़ों के गट्ठर में आग लगाकर अंदर फेंकने की बात शामिल थी। जांच दल ने अमन गेस्ट हाउस के मालिक रज्जाक कुरकुर को मुख्य अभियुक्त कहा था। न्यायालय ने भी इस पर मुहर लगा दी है और उसे पांच मुख्य साजिशकर्ताओं में माना है। तीन अभियुक्तों द्वारा पीपे से पेट्रोल का छिड़काव तथा कपड़ों के गट्ठर में आग लगाकर अंदर फेंकने की बात भी न्यायालय ने स्वीकार की।

राज्य फोरेंसिक विज्ञान निदेशालय ने कोच को जलाने के लिए पेट्रोल के प्रयोग की बात स्वीकार की थी। न्यायालय ने 253 गवाहों के बयान, 1500 दस्तावेजी सबूतों के अध्ययन, परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के गहरे विश्लेषण तथा आठ अभियुक्तों द्वारा अपराध की स्वीकारोक्ति के आधार पर फैसला दिया है। निश्चय ही यह ऐसा फैसला है जो गोधरा काण्ड के बाद फैलाए गए भ्रम को साफ करता है। खासकर नानावटी आयोग और यूसी बनर्जी आयोग ने जिस तरह से अपनी रिपोर्ट दी, उसने पूरे मामले को उलझाकर रख दिया था। नानावटी आयोग ने कहा था कि कि आग जानबूझकर लगाई गयी और बाहरी लोगों ने आग लगाई। आग लगने से जलकर मौत हुयी और स्टेशन पर भारी भीड़ थी। जबकि यूसी बनर्जी आयोग ने तो विचित्र बातें कीं। उसका कहना था कि दुर्घटनावश आग लगी और दम घुटने से मौत हुयी है। इस साजिश में कोई बाहरी नहीं था। स्टेशन पर भीड़ नहीं थी और डिब्बे बाहर से बंद नहीं थे। इसी बनर्जी आयोग की रिपोर्ट के तत्कालीन रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव ने खूब प्रचारित किया। जाहिर तौर पर 58 लोगों की मौत पर इस तरह की राजनीति भारत में ही संभव है।

गोधरा की प्रतिक्रिया स्वरूप जो कुछ गुजरात में हुआ, उसे पूरे देश ने देखा और भोगा है। आज भी गुजरात को उन दृश्यों के चलते शर्मिंदा होना पड़ता है। किंतु हमें देखना होगा कि आक्रामकता का फल कभी मीठा नहीं होता। गोधरा ने जो आग लगाई उसमें पूरा गुजरात झुलझ गया। यह सोचना संभव नहीं है कि किसी भी दंगे की प्रतिक्रिया न हो। आज जबकि गुजरात 2002 की घटनाओं से बहुत आगे निकलकर विकास और प्रगति के नए मानक गढ़ रहा है तब राजनीतिक दलों को चाहिए कि वे गुजरात को लेकर राजनीति बंद करें। वे इसे देखने के प्रयास करें कि इतने बिगड़े हालात और कई प्राकृतिक आपदाओं के बावजूद गुजरात के मुख्यमंत्री ने किस तरह एक राज्य के भाग्य को अपने संकल्प से बदल दिया है। आज का गुजरात, गोधरा और उसके बाद हुए दंगों को भूलकर आगे बढ़ चुका है। उसे पता है कि उसकी बेहतरी शांति और सद्भाव में ही है। इसलिए देश के अन्य राजनीतिक दलों को भी इस सच को स्वीकार कर लेना चाहिए। आज गुजरात की प्रगति की तारीफ योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया से लेकर विश्व बैंक तक कर रहे हैं तो यह अकारण नहीं है। भारतीय न्याय प्रक्रिया पर भी विश्वास ऐसे फैसलों से बढ़ता है और उसके नीर-क्षीर विवेक का भी पता चलता है। इस फैसले के बाद देश के छद्मधर्मनिरपेक्ष लोगों को यह मान लेना चाहिए कि गोधरा का काण्ड एक गहरी साजिश का परिणाम था जिसका भुगतान गुजरात के तमाम निर्दोष और बेगुनाह लोगों ने किया। गुजरात के दंगे आज भी हमें दुखी करते हैं। किसी भी सभ्य समाज के दंगें और आपराधिक धटनाएं शुभ नहीं कही जा सकतीं। किंतु इन दुखद घटनाओं के बाद गुजरात ने जो रास्ता पकड़ा है, वही सही मार्ग है।

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक राज्य को जिस तरह की मिशाल बना दिया है वह काबिले तारीफ है। बस हमें यह ध्यान देना होगा कि जख्मों को बार-बार कुरेदने से वे हरे होते हैं, सूखते नहीं। क्या गुजरात के मामले पर देश के राजनीतिक दल बार-बार जख्मों को कुरेदने से बाज आएंगें और नए गुजरात को अपनी शुभकामनाएं देने का साहस जुटा पाएंगें? लेकिन हमें पता है कि राजनीति बहुत निर्मम होती है। वह कोई मौका नहीं छोड़ती। हमें पता है दंगे हमेशा आम आदमी पर कहर बनकर बरसते हैं। रोजमर्रा की जिंदगी के संघर्ष में लगे लोगों पर वे जुल्म की इंतहा करते हैं। इसलिए इन घटनाओं में आम आदमी ही सबसे ज्यादा तबाह होता है। उनकी रोजी-रोटी पर बन आती है, घरों में फांके पड़ जाते हैं। लेकिन सियासत में सबसे ज्यादा इस्तेमाल उसके उसकी भावनाओं का होता है। देश को बांटने और तोड़ने में लगी ताकतों को अब हिंदुस्तान पर रहम करना चाहिए। गोधरा और गुजरात दंगों से आगे निकालकर गुजरात जिस तरह अपने सपनों में रंग भर रहा है, हमें उस गुजरात का इस्तकबाल करना चाहिए।

लेखक संजय द्विवेदी माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्‍वविद्यालय भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्‍यक्ष हैं.

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