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राजनीति-सरकार

राजन‍ीति को बंधन मुक्‍त कराने लिए तीसरी क्रांति की जरूरत

गोपालजीजरा सोचें, क्या वास्तव में हमने अपने एमएलए तथा एमपी का चुनाव किया है? हमारी मजबूरी तो उन पाँच-सात व्यक्तियों में से एक को वोट देने की थी जो हमारे सामने विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा थोप दिए गये थे। उनमें से भले ही कोई राजनीति का अर्थ न जानता हो। चार माफिया उम्मीदवारों में से एक को चुनने की मजबूरी या जैसे किसी ने आदेश दे दिया हो कि चार कुंओं से एक में कूदने का चयन, मौत चारों में निश्चित है। राजनीतिक दल उम्मीदवार थोप रहे हैं। दल उम्मीदवार की आर्थिक स्थिति का आंकलन कर टिकट देते हैं जिस में पैमाना चंदा ही है। या फिर भुजाओं के बल एवं निजी सैन्य संगठन का आकार देखा जाता है।

गोपालजी

गोपालजीजरा सोचें, क्या वास्तव में हमने अपने एमएलए तथा एमपी का चुनाव किया है? हमारी मजबूरी तो उन पाँच-सात व्यक्तियों में से एक को वोट देने की थी जो हमारे सामने विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा थोप दिए गये थे। उनमें से भले ही कोई राजनीति का अर्थ न जानता हो। चार माफिया उम्मीदवारों में से एक को चुनने की मजबूरी या जैसे किसी ने आदेश दे दिया हो कि चार कुंओं से एक में कूदने का चयन, मौत चारों में निश्चित है। राजनीतिक दल उम्मीदवार थोप रहे हैं। दल उम्मीदवार की आर्थिक स्थिति का आंकलन कर टिकट देते हैं जिस में पैमाना चंदा ही है। या फिर भुजाओं के बल एवं निजी सैन्य संगठन का आकार देखा जाता है।

चुन लिये जाने पर उनकी प्रतिबद्धता दल की नीतियों में न होकर सरकार के जोड़-तोड़ में पार्टी का साथ देने की रहती है। बाकी समय में वे अपने सम्पर्क से व्यापार व धन-धान्य की वृद्धि करते रहते हैं। हमारी समस्याओं के समाधान के लिए क्या किया? इसका उत्तर अब सामयिक नहीं रहा। संक्षेप में उन चार उम्मीदवार में से एक को शिखर का रास्ता मिल गया परन्तु राजनीति अपनी राह से भटक गयी। अब यह उम्मीद नहीं की जानी चाहिए कि आचरण की शुद्धता का कोई नेता पैदा होगा। गाँधी, सुभाष, आचार्य नरेन्द्र देव, जयप्रकाश नरायण व डा. लोहिया आदि आन्दोलनों से निकले नेता थे। क्रान्तिकारी चन्द्रशेखर आजाद व सरदार भगत सिंह को व्यवस्था के दमन की आग ने इतना तपाया कि वह तरूणाई में ही अन्तर्राष्ट्रीय प्रेरणा पुरूष बने। हमें निराशावादी विचार मन में नहीं लाना है। जब सैन्यबल से संगठित गिरोह चलाने वाले अंग्रेज भाग गये तो यह गुटबाजियों में बंटे, अपराधियों की वैशाखी का सहारा लिए हुए लोग राजनीति को कब तक अगवा कर रख सकते है। जरूरत जनता के हुंकार भरने की है। युवा शक्ति क्षणभर के लिए भौतिक सुखों की कल्पना छोड़ दे और कल्पना के कैनवास पर अपने को समाज व राष्ट्र के प्रेरणा पुरूष की पहचान के रूप में प्राप्त आदर सम्मान को देखे।

परिस्थितियाँ लगभग सभी दलों में समान हैं। नेता भाषण में महापुरूषों के विचारों को उद्धृरित करते हुए समाजवाद, साम्यवाद की व्याख्या करते हैं। गरीबी के आंकड़े देकर शोषण मुक्त समाज का वादा करते हैं। सभा समाप्त कर पूँजीवादी व्यवस्था के प्रतीक के घर जाकर चाय पीते हुए आर्थिक हितों के तोल-मोल की बातें करते हैं। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार कोई पांखडी बाबा प्रवचन में श्रोतागण को माया मोह से दूर ईश्वर की शरण में जाने की आध्यात्मिक शिक्षा देते हुए धन को सभा स्थल पर लगे दान पात्रों में डाल देने की प्रेरणा देता है। अब बाबा भी कॉरपोरेट कल्चर के होकर प्रकाशन, दवा उद्योग तथा ऑडियो वीडियो निर्माण क्षेत्र में उतर आए हैं।

विषय पर सीधे आते हुए हम राजनीति को दल-दल की कैद से मुक्त कराकर 120 करोड़ लोगों के हित के लिए औजार बनाने की तरकीब पर सोचें। इसे तीसरी क्रान्ति की शुरुआत का नाम दिया जा सकता है। मैने लोकनायक जयप्रकाश नरायन को ध्यान से सुना, गाँधी व लोहिया को ध्यानपूर्वक पढ़ा, अमर शहीद भगतसिंह के संस्मरणों को परिवार से ग्रहण किया, कहीं भी इनकी कल्पना में आजाद भारत में राजनीति को बन्धक बनाने की नहीं थी। मैंने नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का नाम इस कड़ी में मात्र इसीलिए नहीं लिया कि व्यवस्था मे सुधार लाने तथा जनता को दिशा देने मे वे अकेले ही सक्षम थे। यदि वे जीवित रहे होते तो देश के हालात सुधर चुके होते।

सम्पूर्ण क्रांति का आह्वान करते हुए लोकनायक ने स्पष्ट कहा था कि जन प्रतिनिधयों को वापस बुलाने का अधिकार होना चाहिए। प्रतिनिधियों को वरीयता क्रम के बहुमत के आधार पर चुना जाये। अर्थात मतदाता की पसन्द के क्रम के आधार पर गणना उस समय तक हो जब तक एक प्रतिनिधि मतदाताओं का स्पष्ट बहुमत प्राप्त न कर ले। यह व्यवस्था कुछ कुछ अमेरीका की चुनाव प्रणाली से मेल खाती है, जहाँ उम्मीदवार को मुख्य चुनाव मे उतरने से पूर्व अपने दल के सदस्यों का बहुमतीय विश्वास भी प्राप्त करना होता है। वापस बुलाने का अधिकार तो भारतीय दर्शन की दूरगामी क्रिया तथा परिपक्वता का वह बिन्दु है जहाँ व्यवस्था दोष मुक्त एवं निर्मल हो जाती है। वैसे कोई भी व्यवस्था कभी अन्तिम नहीं होती। उसमें परिवर्तन का गुण सदैव बना रहना चाहिए।

परन्तु, दोष शोधन प्रतिनिधि वापस बुलाने की व्यवस्था में भी पूर्ण रुप से नहीं होता। लोकतन्त्र का स्वरुप तभी निखरेगा जब दलों मे आन्तरिक लोकतन्त्र स्थापित होगा। इसके लिए डा. लोहिया का हिमालयी कलेजा चाहिए जो पार्टी मंच पर अपनी आलोचना को उकसाए। आज लगभग सभी दलों के अध्यक्ष आजीवन हैं। भले ही चुनाव आयोग की औपचारिकताओं के कारण निश्चित समयान्तर से उनकी चुनाव प्रक्रिया दिखाने के लिए पूरी करा ली जाती है। जिस दल मे अध्यक्ष आजीवन नहीं है अथवा परिवर्तित हो जाते हैं, वहाँ दल के ऊपर उनका नीति निर्धारक संचालक मंडल अध्यक्ष के नाम का फैसला करता है। कभी कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए वास्तविक मतदान होता था या सत्तर के दशक तक समाजवादी दलों मे इस प्रकार का लोकतन्त्र था।

जब दलों मे आन्तरिक लोकतन्त्र ही नहीं तो उम्मीदवार कैसे छन कर आएगा? टिकट पद्धति ने भारतीय युवाओं मे कुंठा पैदा कर दी है। वे या तो कॉरपोरेट सेक्टर के सलाना मोटे लिफाफों की ओर दौड़ रहे हैं या नेता की शरण मे चापलूस होकर टिकट की भीख मांग रहे हैं। वैसे मुझे इनका मन भी साफ दिखाई नहीं देता। मैं हर युवा को राजनीति मे लाने का पक्षधर हूं। जब इस सम्बन्ध मे बात की जाती है तो राजनीति में प्रताड़ना का आरोप लगा कर युवा अपनी अनिच्छा प्रकट कर देता है। किन्तु, वही युवा व्यूरोक्रेसी में जाने को उतावला है, जहाँ इससे कहीं अधिक प्रताड़ना सत्तादल के लोगों से सहनी पड़ती है। दोनो ही परिस्थितियाँ घातक हैं। शरणागत प्रवृत्ति राजनीति मे नये रक्त का संचार रोक रही है और नेताओं के रोब से डरा हुआ अफसर व्यवस्था मे सड़न पैदा कर रहा है।

चुनाव प्रक्रिया क्या हो? वर्तमान व्यवस्था में विचारवान युवा टिकट नहीं पा सकेगा, उससे पार्टी के नेता को खतरा है। धनकुबेर को वह भायेगा नहीं, तुरन्त दस आरोप लगा कर चुगली कर दी जायेगी। विचारवान नेताओं का दल के नेताओं से वैसे भी सम्पर्क अब टूटा रहता है। जिस प्रकार द्वारपाल की मुट्ठी गरम किए बिना अधिकारी से साक्षात्कार कठिन है, वैसे ही नेताओं के निजी स्टाफ की कृपा प्राप्त करे बगैर नेता के दर्शन सुलभ नहीं होते। नेताओं की गणेश परिक्रमा से अधिक उनके स्टाफ की परिक्रमा करने के दृष्टान्त पार्टी दफ्तरों में मिल जाते हैं।

ऐसे समय मे तीसरी क्रांति के लिए कैसे खड़ा हुआ जाए? राजनीति को बन्धन मुक्त करने के लिए मुहिम चलाना पड़ेगा। 1942 और 1974 की तरह निगाहे पुनः युवा शक्ति पर हैं। पुलिस या प्रशासनिक अफसर बनने के लिए भी तो दो वर्ष कठोर परिश्रम के गुजारने होते हैं। देश का भाग्य विधाता बनना है तो मुट्ठी भींचकर हाथ ऊपर उठा संकल्प ले लें कि ‘‘जन-जन की लालन पालनी राजनीति माँ को बन्धन मुक्त करना है। भारत माँ की गुलामी की बेड़ियाँ गाँधी के नेतृत्व में हुए आन्दोलन की धार से कट गयीं। अब 120 करोड़ जनता की देखभाल करने वाली विधाता माँ यानी ‘राजनीति’ को बन्धन मुक्त कराना है।’’ राजनीति को इस हद तक गुलाम बना दिया गया है कि आपके क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने के लिए बाहर से विजूना लाकर राजनीतिक दल खड़ा कर देते हैं।

मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि एमएलए व एमपी को पार्टी की नीतियों को बताने के लिए कोई प्रश्नावली दे दी जाये तो अधिकांश बता नहीं पायेंगे। ऊपरी सदन जिसका गठन बुद्धिजीवी वर्ग के लिए हुआ, वहाँ चुनाव से तिरस्‍कृत अथवा पूँजीवादी विग्रहों का यथास्थान समायोजन होने लगा है। क्या करना है यह एक विचारणीय प्रश्न है? अब 1942 की तरह न तो आन्दोलन हो सकते हैं न जरुरत है। स्वतन्त्र भारत की कुल राष्ट्रीय सम्पत्ति हमारी अपनी है। उसको क्षति पहुँचाना आत्मघाती है। हिंसा तो निजी जीवन से लेकर आन्दोलन तक कहीं भी कतई नहीं होनी चाहिए। केवल, संगठन, आपसी जुड़ाव व विचार परिपक्वता को हथेली पर रखकर संकल्प ले लें कि मैं राजनीति की छनन प्रक्रिया में हिस्सा लूँगा। मेरा लक्ष्य देश को निर्मल राजनीति देना है। मैं अपने क्षेत्र से दलों का थोपा हुआ नहीं वरन जनता के दुख दर्द को समझने वाले व्यक्ति का चुनाव करुँगा। जिसमें इतना हौसला हो कि अपनी पार्टी की जन विरोधी नीतियों का विरोध कर सके। जो अपने दल के नेता के सत्ता समीकरण मे जोड़-तोड़ का गणित बैठाने में भूमिका न निभाये। प्रत्येक युवा संकल्प ले कि ऐसा व्यक्ति ‘‘मैं हूँ’’, मैं इन गुणों को आत्मसात कर चुका हूं। मैंने राजनीतिक विचारों का अध्यन कर लिया है। मैं सामाजिक व आर्थिक विषयों पर गम्भीर टिप्पणियाँ कर सकता हूँ। मैं व्यवस्था को भली-भाँति समझ चुका हूँ। इसमें लगी भ्रष्टाचार की कड़ियों को पहचानता हूँ, जिसे निकाल फेंकने के लिए मैं जनता के प्रति वचनबद्ध हूं।

राजनीति का रुप क्या हो यह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है? लालन-पालन करने वाली माँ का रुप क्या है? वह आभूषणों से कैसे सुसज्जित होगी। उसके माथे पर कौन सा तिलक होगा। कितनी भुजाएं और प्रत्येक मे क्या-क्या होगा, ये सब प्रश्न अर्थहीन इसलिए हैं कि हमारी इस माँ का रुप निर्गुण है। वह सभी के साथ समान व्यवहार करने वाली है। वह कमजोर बच्चे को विशेष पौष्टिक पदार्थ देती है तथा ताकतवार से धर्म व सीमा की रक्षा को कहती है। उसकी अनुभूति हमारे अन्दर है। वह दिखाई नहीं देती इसीलिए रंग और रोली हमारे लिए निरर्थक है। वह किसी को किसी पूजा स्थल पर जाने से नहीं रोकती साथ ही जाने के लिए बाध्य भी नहीं करती है। उसे आभूषण नहीं चाहिए इसलिए किसी भी प्रकार का आर्थिक दोहन समाप्त कर दो।

लेखक गोपाल अग्रवाल समाजवादी आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़े रहे हैं। इन दिनों समाजवादी पार्टी की राष्ट्रीय राजनीति के हिस्से हैं। मेरठ निवासी गोपाल से संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।

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