
संजय
रामभरोसे पलटकर बोला, ‘सुन भाई 1992 से इसी शांति की स्थापना करने में जुटे हुए हैं भाई लोग। पहले ऐसे ही गली-गली में रामलला का जाप किया। बड़े जोर शोर से कहा, ‘सौगंध राम की खाते हैं, मंदिर वहीं बनाएंगे।’ हर छोटी बड़ी दीवार पर लिखा नजर आने लगा ‘जिस हिन्दू का खून ना खौला, खून नहीं वह पानी है। जो रामलला के काम न आई, वह बेकार जवानी है।’ बेचारों ने इतनी मेहनत की कि पूरे देश के लोगों का खून खौल गया और भाई लोगों की बातों पर भरोसा करके सब अयोध्या पहुंच गए और बाबरी मस्जिद को ढहा दिया। वह गुस्से से बोला, ‘उस दिन सब चिल्ला चिल्लाकर कह रहे थे कि राष्ट्रीय शर्म का प्रतीक हमने ढहा दिया। इन लोगों की भावनाएं देखकर लग रहा था कि मानो कुछ दिनों में ही अयोध्या में भव्य राम मंदिर बन जाएगा। तब किसी ने सोचा भी न था कि हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और होते हैं। इस उन्माद के चलते भाई लोगों ने वो काम कर लिया जिसकी सपने में भी किसी को उम्मीद नहीं थी। भाई लोग दिल्ली के सिंहासन पर बैठ गए। तब सबको लगा था कि बड़े पवित्र लोग हैं। भगवान राम की सौगंध खाकर आए हैं, मंदिर वहीं बनाएंगे। तो फिर मंदिर तो अब वहां बन ही जाएगा।’
राम भरोसे आगे बोला, ‘मगर आम आदमी को क्या पता था कि यह वो लोग हैं, जो लाशों पर राजनीति करते हैं। इनका धर्म से और मंदिर से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है। जब लोगों ने सवाल किया कि अब तो दिल्ली की हुकूमत आपके हाथों में आ ही गई है तो फिर मंदिर बनने में देरी क्यों है? तब बड़ी बेशर्मी से जवाब दे दिया कि अभी पूरा बहुमत नहीं मिला है। अगर मंदिर की बात किया तो सहयोगी दल नाराज हो जाएंगे और सरकार खतरे में पड़ जाएगी। अगर कुर्सी है तो सब कुछ है और अगर यह कुर्सी ही न रही तो फिर काहे का मंदिर और काहे की बातें। लिहाजा जब अगली बार बहुमत में आएंगे तब देखेंगे कि मंदिर-वंदिर का क्या करना है? जब सरकार चला रहे होते हैं तब ऐसी बातें नहीं सोचते। ऐसी बातें तब सोचते हैं जब विपक्ष में होते हैं। क्योंकि जब ऐसी बातें होंगी तो कुछ मारपीट होगी, कुछ जगह दंगे होंगे और अपनी दुकान फिर चल जाएगी। अगर सत्ता में रहते हुए भी ऐसी बातें की तो सत्ता भी हाथ से चली जाएगी।’
रामभरोसे बोला, ‘इन लोगों का मंदिर से कोई वास्ता नहीं है। अयोध्या में भले ही छोटा था लेकिन प्यारा सा मंदिर था रामलला का। भगवान कभी नहीं चाहेंगे कि उनके छोटे से मंदिर को भव्य मंदिर बनाने के लिए लाखों बेगुनाहों का खून बहाया जाए। उनके नाम पर दंगे करवाएं जाएं। बेकसूर महिलाओं और बच्चों को मार दिया जाए। भगवान तो हिन्दू और मुसलमान भी नहीं जानते। उन्हें इस बात से भी कोई ऐतराज नहीं होगा कि जहां उनकी आरती गाई जा रही है वहां उनके पड़ोस में कोई नमाज अदा करे। अगर इतना प्यारा वातावरण बन जाएगा, तो इन संघियों की और इन विहिप नेताओं की दुकान ही बंद हो जाएगी। इनकी दुकान तभी चल सकती है, जब धर्माधंता का वातावरण तैयार होगा।’
मैं कुछ बोलता उससे पहले ही बोला, ‘आम आदमी भले ही इन लोगों को सबक न सिखा पाया हो मगर भगवान ने इन लोगों को सबक जरूर सिखा दिया। जो नेता मस्जिद गिराने के दोषी थे, उनकी औकात बद से भी बदतर कर दी भगवान ने। कभी इस डगर तो कभी उस डगर, भटकते दिख रहे हैं ये नेता। कोई पूछने वाला नहीं है।’ एक सांस में बोला, ‘आडवाणी से लेकर कल्याण सिंह, विनय कटियार, साध्वी ऋतंभरा, उमा भारती, साक्षी महाराज तमाम ऐसे नाम हैं, जिनको भगवान ने सही सबक सिखा दिया। सब उस घटना के बाद से कभी भी सही स्थिति में नहीं पहुंच पाए।’ उसने कहा, ‘लंबा समय हो गया है, अशोक सिंघल और तोगडिय़ा जैसे कथित नेताओं का बहिष्कार किए हुए इस समाज को। मंदिर बनाने के नाम पर विदेशों से करोड़ों रूपया मंगाया। गली मोहल्ले की टंकियों से पानी भर के सरयू का पानी कहकर जगह-जगह बेचा और धनवसूली करके नफरत का वातावरण बनाने में जुट गए भाई लोग।’
बोला, ‘लंबे समय से कोई नया मुद्दा मिल नहीं रहा था। राममंदिर के नाम पर लोग इनको पहचान चुके थे लिहाजा राम के नाम पर अब इनका काम होने वाला नहीं था। इसलिए अब हनुमानजी का नाम पकड़ा। गली-गली में हनुमानजी की मार्केटिंग करेंगे। जल्दी ही छोटी-छोटी गदाओं को यह कहकर बेचेंगे कि यह अयोध्या में हनुमान गढ़ी से छुआकर लाईं गईं हैं।’ मुस्कुराते हुए बोला, ‘राम मर्यादा पुरूषोत्तम थे। वह गंभीर थे और शांत थे। उन्होंने क्षमा मांगने पर कई राक्षसों को भी माफ कर दिया था। मगर हनुमानजी थोड़ा उग्र हैं वह लगे हाथ हिसाब साफ करने वाले भगवान माने जाते हैं। अगर इन लोगों ने राम मंदिर की तरह कोई भी दगाबाजी की तो लगे हाथ हनुमान जी सबक भी सिखा देंगे।’
राम भरोसे बोला, ‘तुम इन लोगों की कुत्सित राजनीति को समझ भी नहीं सकते। प्रदेश में डेढ़ साल बाद विधानसभा चुनाव है। भाजपा एक दर्जन सीटों पर भी जीतने की बात दावे के साथ कर पाने की स्थिति में नहीं है। जल्दी ही राममंदिर मुद्दे पर फैसला आने वाला है। यदि इस मुद्दे पर पक्ष में फैसला आया तो श्रेय खुद लेंगे और भाजपा को दिलवायेंगे और यदि खिलाफ फैसला आया तो प्रदेश भर में नफरत का इतना बड़ा वातावरण तैयार कर देंगे कि उस उन्माद के चलते भाजपा को फायदा हो जाए, भले उसके लिए कितनी ही जगह दंगे हो जाएं और कितने ही मासूमों का खून सड़कों पर बह जाए।’
वह बोला, ‘अच्छा होता यह लोग कहते कि अदालत जो भी फैसला करेगी यह उसका सम्मान करेंगे। मगर अब जब यह लोग इस देश की गंगा जमुनी तहजीब को ही बिगाडऩे पर आमादा हैं तो हम सबका दायित्व है कि इनको इनकी भाषा में ही सबक सिखा दिया जाए। इनसे कह दिया जाए कि हनुमान चालीसा का पाठ करने के लिए उन लोगों की कोई जरूरत नहीं है, जो धर्म का इस्तेमाल राजनीति के लिए करते हैं।’ मैं तो भौचक्का होकर रामभरोसे की बात सुन रहा था, कोई जवाब नहीं सूझा, अगर आपके पास हो तो हमें लिखिएगा।
लेखक संजय शर्मा वीकेंड टाइम्स के संपादक हैं.

