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लघु समाचार पत्रों को मिटाने की तैयारी में कांग्रेस सरकार

: पूंजीपति अखबारों की कोशिश लघु अखबारों को निगलने की : यह आज के जमाने का सच है कि मीडिया में तूती पूंजी की बोल रही है। सरस्वती लक्ष्मी की दास बन चुकी हैं। जो खुद को पत्रकारिता के हितों का रक्षक बताते नहीं अघाते। वह पूंजीवादी अखबारों में आफिस की घुटन में रूटीन र्क्लक की तरह काम करने में जुटे हैं, तो दूसरी ओर लघु पत्रकारिता के माध्यम से अपने दिल की बात को बेबाक अंदाज में कहने का दम भरने वाले पत्रकार भी जैसे-तैसे जिंदा रहने के लिए सरकारी निजाम की गुलामी का पट्टा पहने हुए दिखायी दे जाते हैं। किसी समय लघु पत्रकारिता का अपना महत्व था लेकिन आज जिस तरह से पूंजीवादी कम्पनियां अखबार जगत को अपने आधिपत्य में लेने की कोशिश कर रही हैं। उसके चलते एक बात तो साफ हो रही है कि शायद आने वाले अगले दशक में लघु अखबारों पर भी येनकेन प्रकारेण पूंजीवादी एवं आपराधिक तत्वों का ही कब्जा हो जायेगा।

: पूंजीपति अखबारों की कोशिश लघु अखबारों को निगलने की : यह आज के जमाने का सच है कि मीडिया में तूती पूंजी की बोल रही है। सरस्वती लक्ष्मी की दास बन चुकी हैं। जो खुद को पत्रकारिता के हितों का रक्षक बताते नहीं अघाते। वह पूंजीवादी अखबारों में आफिस की घुटन में रूटीन र्क्लक की तरह काम करने में जुटे हैं, तो दूसरी ओर लघु पत्रकारिता के माध्यम से अपने दिल की बात को बेबाक अंदाज में कहने का दम भरने वाले पत्रकार भी जैसे-तैसे जिंदा रहने के लिए सरकारी निजाम की गुलामी का पट्टा पहने हुए दिखायी दे जाते हैं। किसी समय लघु पत्रकारिता का अपना महत्व था लेकिन आज जिस तरह से पूंजीवादी कम्पनियां अखबार जगत को अपने आधिपत्य में लेने की कोशिश कर रही हैं। उसके चलते एक बात तो साफ हो रही है कि शायद आने वाले अगले दशक में लघु अखबारों पर भी येनकेन प्रकारेण पूंजीवादी एवं आपराधिक तत्वों का ही कब्जा हो जायेगा।

देश को आजादी का तोहफा देने वाली कांग्रेस सरकार ने अखबारों को मदद देने के उद्देश्य से विज्ञापनों का भंडार खोला था। डीएवीपी के साथ राज्यों में सूचना जनसम्पर्क विभागों का गठन हुआ। आज के दौर में बैनर बन चुके हिन्दुस्तान, अमरउजाला, दैनिक जागरण सरीखे कई अखबारों ने सरकारी मदद का पूरा फायदा उठाया। इस दौर में कई ऐसे अखबार भी रहे जो नियमों को ताक पर रखकर अपने पैर जमाने में कामयाब रहे। लघु समाचार पत्रों को भी काफी मदद मिली। आज के दौर में जिन अखबारों को विज्ञापन मान्यता उदारता या सेटिंग के सहारे मिली हुई है। वह अपने वजूद को बनाये हुए हैं।

बात आज के दौर की जाये तो लघु पत्रकारिता काफी जोखिम का काम हो चुका है। नियमों को बनाने में सरकारी अफसरों के साथ पूंजीवादी अखबारों एवं पत्रकार यूनियनों के नुमाइन्दों ने ऐसी भूमिका निभायी है कि अखबारों के मालिक प्रसार के मामले में झूठी घोषणाएं करने को मजबूर रहते हैं। यह अलग बात है यूपीए टू में सूचना प्रसारण मंत्रालय का जिम्मा संभालने वाली अंबिका सोनी के कार्यकाल में लघु अखबारों का पूरी ताकत से दमन किया गया है। कमेटियों में हिस्सा लेने वाले पत्रकार यूनियन के सदस्यों ने भी नियमों को लेकर कोई चर्चा नहीं की। इससे कोई भी गुरेज नहीं कर सकता कि लघु अखबार बड़े जोखिम के साथ बेचारा हॉकर से लेकर सम्पादक तक की भूमिका निभाने वाला पत्रकार तैयार करता है, तो उसके सामने रोज संकट रहता है कि अगले दिन का कागज और छपाई का पैसा कहां से आयेगा। मान्यता के नाम पर जब फाइल लगती है तो पहले फर्जी कागजों को तैयार करना, फिर डीएवीपी में छह माह का इंतजार, इसके बाद न्यूज रिप्रोडक्शन एवं रिपीटेशन का ठप्पा उसके हाथ में आता है। ऐसे में आखिर कब तक एक पत्रकार घर में बीवी की डांट खाकर लघु समाचार पत्र को जिंदा रख सकता है।

लघु समाचार पत्र पैदा भी तेजी से होता है। उसका अंत भी उसी तेजी से होता है। प्रेस मान्यता के लिए भी पत्रकार तरसते ही रहते हैं। बैनर में काम करने वाले पत्रकार डर के मारे अपनी फाइल को बॉस के आगे नहीं रख पाते, तो लघु समाचार पत्र के प्रतिनिधियों को ऐसे कायदे कानून पढ़ाये जाते हैं कि बिना हरे हरे नोटों की झलक दिखाये उसका भी नम्बर नहीं आता। कुल मिलाकर सरकार द्वारा विज्ञापन जारी करने की जो परम्परा अखबारों को जिंदा रखने के लिए शुरू की गयी थी। उसमें एक बड़ा हिस्सा डकारने के बाद भी पूंजीवादी अखबारों को चैन नहीं आया। नियमों की नकेल कुछ अंदाज में लघु समाचार पत्रों पर कसने में मीडिया के बड़े ठेकेदार इस तरह सफल रहे कि लघु अखबारों को मिलने वाला कुल विज्ञापन का 15 फीसदी हिस्सा भी इनके पेट में ही जाता नजर आ रहा है।

जिस तरह से चल रहा है, उसे देखते हुए यह साफ भी हो रहा है कि सुरसा की तरह मुंह फैला रही मंहगाई यूपीए सरकार का टर्म पूरा होने तक लघु अखबारों को इतिहास के पन्नों में समेट कर रख देगी। यूं भी तो पहले लघु समाचार पत्र छापना बेहद मुश्किल कार्य होता है। तिस पर उसे बेचना तो और भी टफ। यदि बिक भी जाये तो फर्जी प्रसार के खेल के चलते कागज के दाम भी नहीं मिल पाते। व्यावसायिक विज्ञापन के नाम पर लघु समाचार पत्र हमेशा शून्य ही रहते हैं। ऐसे में जब सरकारी इमदाद न मिलेगी तो जल्द ही सभी का बोरिया बिस्तर सिमट जायेगा। हां कुछ अखबार जिंदा जरूर रहेंगे लेकिन उनका संचालन पत्रकारिता का ककहरा भी न जानने वाले अपराधिक जगत के नुमाइन्दों एवं माफियाओं के सहारे होगा।

लेखक मोहित कुमार शर्मा मुदाराबाद से प्रकाशित दैनिक न्‍यूज ऑफ जेनरेशन एक्‍स के संपादक हैं.

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