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लालची धार्मिक गुरु नहीं कर सकते सत्‍ता परिवर्तन

बीपी गौतम: व्‍यवस्‍था परिवर्तन के लिए सोच में बदलाव जरूरी : धार्मिक गुरुओं को राजनीति में आना चाहिए या नहीं? इस सवाल पर समाज में कई तरह की विचारधारा के लोग हैं। राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता या समर्थक कहते हैं कि धार्मिक गुरुओं को राजनीति से दूर ही रहना चाहिए, वहीं धार्मिक गुरुओं के चेले कहते हैं कि धार्मिक गुरु राजनीति में नहीं आयेंगे, तो क्या राक्षसी प्रवृत्ति के लोग आने चाहिए? दलीय विचारधारा से दूर रहने वालों में भी इसी तरह के दो पक्ष हैं, इसलिए इस सवाल का सही जवाब नहीं मिल पा रहा है, तभी दोनों ही पक्ष अपनी-अपनी सोच सही मानते हैं, पर समाज में एक वर्ग ऐसा भी है, जो वर्तमान राजेनताओं के साथ धार्मिक गुरुओं से भी उतनी ही घृणा करता है। तटस्थ सोच रखने वाले इसी वर्ग के पास सही जवाब है, क्योंकि यह सामान्य सवाल नहीं है, इस एक सवाल के पीछे कई गंभीर सवाल हैं, जिनके बारे में जाने-समझे बिना, इस एक सवाल का सही उत्तर नहीं मिल सकता।

बीपी गौतम

बीपी गौतम: व्‍यवस्‍था परिवर्तन के लिए सोच में बदलाव जरूरी : धार्मिक गुरुओं को राजनीति में आना चाहिए या नहीं? इस सवाल पर समाज में कई तरह की विचारधारा के लोग हैं। राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता या समर्थक कहते हैं कि धार्मिक गुरुओं को राजनीति से दूर ही रहना चाहिए, वहीं धार्मिक गुरुओं के चेले कहते हैं कि धार्मिक गुरु राजनीति में नहीं आयेंगे, तो क्या राक्षसी प्रवृत्ति के लोग आने चाहिए? दलीय विचारधारा से दूर रहने वालों में भी इसी तरह के दो पक्ष हैं, इसलिए इस सवाल का सही जवाब नहीं मिल पा रहा है, तभी दोनों ही पक्ष अपनी-अपनी सोच सही मानते हैं, पर समाज में एक वर्ग ऐसा भी है, जो वर्तमान राजेनताओं के साथ धार्मिक गुरुओं से भी उतनी ही घृणा करता है। तटस्थ सोच रखने वाले इसी वर्ग के पास सही जवाब है, क्योंकि यह सामान्य सवाल नहीं है, इस एक सवाल के पीछे कई गंभीर सवाल हैं, जिनके बारे में जाने-समझे बिना, इस एक सवाल का सही उत्तर नहीं मिल सकता।

सबसे पहले सवाल यह उठता है कि राजनेता जैसी ही सोच धार्मिक गुरु की भी है, तो फिर धार्मिक गुरु के राजनीति में आने से क्या कुछ बदलेगा? राजनेता या धार्मिक गुरु देश या समाजोत्थान को लेकर अगर गंभीर नहीं हैं, तो दोनों में से किसी के भी हाथों में सत्ता हो, परिवर्तन नहीं हो सकता, इसलिए सवाल सोच का है कि राजनेता या धार्मिक गुरु में किसकी सोच समाजोत्थान की है और जिसकी है, वही देशहित में सत्ता पाने का अधिकारी भी होना चाहिए। न कि धार्मिक गुरु या राजेनता। सामान्य तौर पर देखा जाये, तो तंत्र की लापरवाही के चलते आम आदमी की सोच में भी बड़ा परिवर्तन आया है, जिसका दुष्परिणाम ही है कि आर्थिक स्थिति अगर थोड़ी सी भी ठीक है, तो लोग दवा लेने सरकारी अस्पताल नहीं जाना चाहते। इसी तरह सरकारी बस के पास में ही अगर प्राइवेट बस भी खड़ी है, तो गंतव्य तक जाने के लिए अधिकांश लोग प्राइवेट बस का प्रयोग करना पसंद करते हैं।

आशय यही है कि सरकारी विभाग में सेवा कार्य की भावना कम होती जा रही है, तभी आम आदमी का सरकारी सेवाओं से विश्वास उठता जा रहा है, लेकिन जब किसी विभाग में किसी भी पद के लिए आवेदन मांगे जाते हैं, तो नियुक्तियों की संख्या के अनुपात में हजारों गुना अधिक आवेदन पहुंच जाते हैं, साथ ही आवेदक योग्यता के साथ मोटी रिश्वत देकर किसी भी स्थिति में सरकारी नौकरी पाने के लिए लालायित दिखाई देते हैं, इसका आशय भी यही है कि उनकी सोच भी यही रहती है कि सरकारी नौकरी में करने के लिए कुछ खास नहीं होता और रिश्वतखोरी के माध्यम से कुछ ही दिनों में वह धन कुबेर हो जायेंगे। कुछ लोग तर्क देते हैं कि युवाओं के राजनीति में आने से हालात सुधरेंगे, पर अब युवा राजनीति में भी हैं और सरकारी नौकरियों में भी, पर हालात लगातार बदतर ही होते जा रहे हैं, क्योंकि सोच में ही विकार आता जा रहा है। कर्तव्य भावना लगातार घटती जा रही है और ऐसी स्थिति में सकारात्मक परिवर्तन होना नामुमकिन ही है, इसलिए सोच बदलने की आवश्यकता है, जिस पर किसी का ध्यान नहीं है।

खैर, बात राजनीति और धर्म के घालमेल की थी कि होना चाहिए या नहीं। इसका जवाब यही है कि धर्म या आस्था, श्रद्धा के माध्यम से वोट पाने के बाद धार्मिक गुरु सत्ता पा लें और उनकी सोच सही भी हो, तो भी वह आम आदमी की आशाओं पर पूरी तरह खरा उतर ही नहीं सकते, क्योंकि आम आदमी की अपेक्षायें व्यापक होती हैं और जब आम आदमी किसी भी स्तर पर आहत होगा, तो जाहिर है कि उसका धार्मिक गुरुओं पर विश्वास कम होगा और जब धार्मिक राजनेता गुरु से विश्वास उठेगा, तो फिर आम आदमी तटस्थ धार्मिक गुरु पर भी विश्वास करना बंद कर ही देगा, जो धार्मिक दृष्टि से बहुत बड़ा नुकसान होगा, जिसके दूरगामी परिणाम बेहद खतरनाक होंगे, क्योंकि धार्मिक पाखंड के चलते ही सनातन धर्म से पहले ही लोगों का विश्वास कम होता रहा है, तभी धर्म के कई टुकड़े हो चुके हैं, साथ ही धर्म की व्यापक स्तर पर आलोचना होती रही है, इसलिए लोग सनातनी गुरुओं की बजाये अन्य पर अधिक विश्वास करने लगते हैं, क्योंकि वह स्वार्थ से हट कर बात करते हैं, जिस पर विश्वास होना स्वभाविक ही है।

इस दृष्टि से देखा जाये, तो धर्म और राजनीति को अलग ही रखना चाहिए, क्योंकि स्वामी दयानंद सरस्वती जैसे महापुरुष की आने की फिलहाल संभावनायें कम ही दिख रही हैं। इसलिए लगातार गिर रही सामाजिक सोच में परिवर्तन के साथ आम आदमी को जागरुक करने की दिशा में ही धार्मिक गुरुओं को काम करना चाहिए। धार्मिक गुरु ऐसा करने में अगर कुछ प्रतिशत भी सफल हो गये, तो उनका सम्मान हिमालय के शिखर से भी ऊंचा होगा और यह उनके लिए सबसे बड़ी बात होगी, लेकिन धार्मिक गुरुओं की भी सोच ऐसी नहीं दिख रही, साथ ही राजनीति में भी आने को आतुर दिख रहे हैं, जिससे साफ है कि उनकी सोच भी जनहित की नहीं, बल्कि स्वार्थ सिद्ध करने की है।

लेखक बीपी गौतम मान्‍यता प्राप्‍त स्‍वतंत्र पत्रकार हैं. जनपक्षधर एवं शुचितापरक पत्रकारिता के हिमायती हैं तथा सभी विषयों पर बेबाक लेखन करते रहते हैं.

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