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लावारिस सपनों का शहर वाशिंगटन

दयाशंकर शुक्‍ल सागर: मेरी विदेश डायरी 7 : अंकल सैम की इस दुनिया में सपने देखने की इजाजत किसी को नहीं : एक पेड़ के नीचे एक गोरा भिखारी पड़ा है : कुछ शहरों की पहचान सिर्फ अपने नाम से होती है। वाशिंगटन डीसी यूरोप के दूसरे बड़े शहरों से बिलकुल अलग नहीं है। चौड़ी साफ चमकदार सड़कें, मजबूत पत्थरों के बने मंत्रालयों के दफ्तर, कुछ अनमने से म्यूजिम, उदास गिरजाघर, थोड़े से हरे-भरे पार्क, ऊंची भव्य इमारतें और फुटपाथ पर शराब के नशे में पड़े हुए काले और गोरे भिखारी। लुटियन हिल्स पर बने हिन्दुस्तान के राष्ट्रपति भवन के आगे ओबामा का व्हाईट हाउस, आर्मी के किसी सबसे बड़े कमांडर के शानदार सफेद बँगले जैसा दिखता है। जार्ज वाशिंगटन के नाम पर बसे इस शहर के कुछ इलाके तो एकदम नई दिल्ली जैसे हैं। लेकिन सत्ता और ताकत का प्रतीक बनकर यह शहर आज पूरी दुनिया पर हुक्म चला रहा है।

दयाशंकर शुक्‍ल सागर: मेरी विदेश डायरी 7 : अंकल सैम की इस दुनिया में सपने देखने की इजाजत किसी को नहीं : एक पेड़ के नीचे एक गोरा भिखारी पड़ा है : कुछ शहरों की पहचान सिर्फ अपने नाम से होती है। वाशिंगटन डीसी यूरोप के दूसरे बड़े शहरों से बिलकुल अलग नहीं है। चौड़ी साफ चमकदार सड़कें, मजबूत पत्थरों के बने मंत्रालयों के दफ्तर, कुछ अनमने से म्यूजिम, उदास गिरजाघर, थोड़े से हरे-भरे पार्क, ऊंची भव्य इमारतें और फुटपाथ पर शराब के नशे में पड़े हुए काले और गोरे भिखारी। लुटियन हिल्स पर बने हिन्दुस्तान के राष्ट्रपति भवन के आगे ओबामा का व्हाईट हाउस, आर्मी के किसी सबसे बड़े कमांडर के शानदार सफेद बँगले जैसा दिखता है। जार्ज वाशिंगटन के नाम पर बसे इस शहर के कुछ इलाके तो एकदम नई दिल्ली जैसे हैं। लेकिन सत्ता और ताकत का प्रतीक बनकर यह शहर आज पूरी दुनिया पर हुक्म चला रहा है।

बाल्टीमोर से वाशिंगटन डीसी का रास्ता केवल पचास मिनट का है। अमेरिका में वाहनों की तेज ऱफ्तार की एक खास वजह यह भी है कि यहाँ नब्बे फीसदी सड़कें वन वे हैं। जब तक बड़ा एक्सीडेट नहीं होता हाईवे पर जाम नहीं लगता। अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन डीसी बहुतों के लिए सपनों का शहर है। लेकिन यहां सपनों का कोई वारिस नहीं। अंकल सैम की इस दुनिया में सपने देखने की इजाजत किसी को नहीं।

टूरिस्ट कोच शहर में दाखिल हुई तो बड़े से पार्क के इर्द गिर्द उनींदे लोग सुबह की सैर कर घर लौट रहे हैं। सड़क के किनारे सलीके से बने हुए घर। घर के बाहर फूलों की छोटी-छोटी क्यारियां। क्यारियों के आगे कार पार्किंग, सड़क के बिलकुल किनारे। बहुत थोड़ी देर में हम शहर के इनर सर्किल में दाखिल हो गए। यह सर्किल कुछ कनॉट प्लेस जैसा है। और ठीक सामने एक विशालयकाय ऐतिहासिक टॉवर। अमेरिका के पहले राष्ट्रपति के नाम पर बने ‘वाशिंगटन मान्यूमेंट’ की ऊँचाई 555 फीट है। संगमरमर और सेंडस्टोन से निर्मित इस स्तम्भ को बनाने में करीब 40 साल लग गए।

यह 1884 में पूरा हुआ। हमारे साथ चल रहे स्टीव ने बताया कि व्हाईट हाउस बस इसी मान्यूमेंट के करीब है। लेकिन आज वाशिंगटन का पारा 35 डिग्री सेल्सियस से ऊपर है। सैलानियों की भीड़ तेज कदमों से वाशिंगटन स्मारक की तरफ बढ़ रही है। फुटपाथ पर एक पेड़ के नीचे एक गोरा भिखारी पड़ा है। बढ़ी हुई खिचड़ी दाढ़ी, मैले कपड़े। किसी दयावान ने भीख में उसे एक सिगरेट दी है, जो उसके पेट के ऊपर पड़ी है। मुझे उम्मीद है कि उठकर सबसे पहले वह अपनी सिगरेट सुलगाएगा और उसका सारा धुंआ वह व्हाईट हाउस की सफेद दीवारों की तरफ हवा में उड़ा देगा।

अब हम पैदल मान्यूमेंट के करीब बढ़ रहे हैं। दूर आसमान में एक हवाईजहाज मान्यूमेंट के ठीक पीछे से गुजर रहा है। लग रहा है अभी टॉवर से टकरा जाएगा। टीवी पर देखा 9/11 का दृश्य जेहन में घूम जाता है। स्टीव बताते हैं कि ‘ये कोई नई बात नहीं, एयरपोर्ट करीब होने से इस मान्यूमेंट टॉवर के पीछे से हर दस मिनट में एक हवाई जहाज गुजरता है। पर अब हम सतर्क हैं।’ अब हम वाशिंगटन स्मारक के ठीक नीचे खड़े हैं। स्मारक के दोनों तरफ पार्क है। बीच में व्यस्त यातायात की सड़क जो शहर के व्यस्तम इलाके में जाती है। पार्क में दौड़ते बच्चे और घूमते टहलते पर्यटक। एक बार लगा हम इंडिया गेट और राष्ट्रपति भवन के बीच कहीं खड़े हैं।

स्मारक से करीब 800 मीटर दूर हरे पेड़ों की झुरमुट में व्हाइट हाउस नजर आता है। व्हाईट हाउस की तरफ बढ़ते हैं। रास्ते में कहीं का कोई तालाशी नहीं। पर्यटकों को व्हाईट हाउस की सीढ़ियों तक जाने की इजाजत है। यहां तक पहुंचने में किसी साधारण मेटल डिटेक्टर तक से नहीं गुजरना होता। ऊंगलियों पर गिने जाने वाले सफेद वर्दी के सुरक्षा कर्मी बस रास्ता बताते का काम करते हैं। उनके हथियार भी मुश्किल से दिखते हैं। हमारे एक अमेरिकी मित्र बताते हैं कि यहां सारी सुरक्षा अदृश्य है। लेकिन यह सच है कि यहां परिंदा वाकई पर नहीं मार सकता।

अब हम व्हाईट हाउस के बिलकुल पास खडे़ है। हरे भरे लॉन में। सामने सैंडस्टोन की बनी एक खूबसूरत और भव्य इमारत है, इसमें जो रहता है उसे दुनिया का सबसे ताकतवर आदमी माना जाता है। व्हाईट हाउस के मुख्य बरामदे में छह विशाल पिलर हैं। बीच में अमेरिका का झंडा लहरा रहा है। इसके आगे बढ़ने की फिलहाल हमें इजाजत नहीं। कुछ वक्त पहले एक कान्फ्रेंस में व्हाइट हाउस में साइंस और टेक्नालॉजी देखने वाली नीति विशेषज्ञ हेलरी चेन से हमने ओबामा से मिलने की इच्छा जताई थी। उन्होंने कहा इसके लिए हमें एक लम्बी प्रक्रिया से गुजरना होगा जिसमें कई महीने लग सकते हैं।सामने दूर सफेद रंग की ‘कैपिटल बिल्डिंग’ का करीब 287 फीट ऊँचा विशालकाय गुम्बद दिखता है जो अमेरिका की कांग्रेस यानी संसद है। वास्तुकला के लिहाज से यह इमारत व्हाईट हाउस से कई गुना सुंदर और भव्य है। दुनिया यहीं से चलती है। शक्ति का केन्द्र। बेशक सम्मान का नहीं।

दयाशंकर शुक्ल सागर ‘दैनिक हिंदुस्तान’ लखनऊ में विशेष संवाददाता के पद पर कार्यरत हैं. सागर को अमेरिका की जोन्स हापकिंस यूनिवर्सिटी ने फैलोशिप-2010 के लिए चयनित किया है. इन दिनों वे अमेरिका की यात्रा पर हैं.

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