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लोकपाल के लिए दिनों की नहीं, महीनों के आंदोलन की जरूरत पड़ेगी

: भीड़ के पांव होते हैं, दिमाग नहीं : जन लोकपाल बिल के लिए जो जुनून और जोश सड़कों पर दिखाई दे रहा है उसे आजादी की दूसरी लड़ाई का नाम दिया जा रहा है। अन्ना को तिहाड़ में बंद करना सरकार को भारी पड़ा। संसद से सड़क तक अन्ना को मिल रहे भारी जनसमर्थन से घबराई और बैक फुट पर आयी सरकार ने थक-हारकर अन्ना को रामलीला मैदान में 15 दिन के अनशन की अनुमति दे डाली। दरअसल मनमोहन सरकार इस मुगालते में थी कि रामदेव की तरह वो अन्ना के अनशन को भी कुचल डालेगी। लेकिन सरकार के दमनकारी नीति और नीयत ने जनभावनाओं को भड़का दिया। फलस्वरूप अन्ना के समर्थन में भारी जनसैलाब सड़कों पर उतर आया।

: भीड़ के पांव होते हैं, दिमाग नहीं : जन लोकपाल बिल के लिए जो जुनून और जोश सड़कों पर दिखाई दे रहा है उसे आजादी की दूसरी लड़ाई का नाम दिया जा रहा है। अन्ना को तिहाड़ में बंद करना सरकार को भारी पड़ा। संसद से सड़क तक अन्ना को मिल रहे भारी जनसमर्थन से घबराई और बैक फुट पर आयी सरकार ने थक-हारकर अन्ना को रामलीला मैदान में 15 दिन के अनशन की अनुमति दे डाली। दरअसल मनमोहन सरकार इस मुगालते में थी कि रामदेव की तरह वो अन्ना के अनशन को भी कुचल डालेगी। लेकिन सरकार के दमनकारी नीति और नीयत ने जनभावनाओं को भड़का दिया। फलस्वरूप अन्ना के समर्थन में भारी जनसैलाब सड़कों पर उतर आया।

पर अहम सवाल यह है कि जो लोग सड़कों पर उतरे हैं वो अन्ना के समर्थन में है या फिर ये सब भेड़चाल के सिवाय कुछ खास नहीं है। क्योंकि दो-तीन दिन के समर्थन और आंदोलन से किसी बडे़ परिवर्तन या बदलाव की उम्मीद रखना बेमानी है। जन लोकपाल कानून के लिए अभी लंबी लड़ाई की दरकार है। अगर सड़कों पर उमड़ी भीड़ असल में अन्ना के समर्थन में है तो कुछ उम्मीद मन में जगती है। लेकिन अगर एक-दूसरे की देखादेखी भेड़चाल में भीड़-भड़क्का हो रहा है, तो आंदोलन की हवा निकलने में देर नहीं लगेगी।

जन लोकपाल कानून के लिए अन्ना ने जो लड़ाई सरकार के खिलाफ छेड़ी है वो काबिले तारीफ है। अन्ना की लड़ाई या विरोध गलत नहीं है। लेकिन सरकार अन्ना के आंदोलन को जाति तौर पर ले रही है। सरकार को ऐसा लग रहा है कि अन्ना भ्रष्टाचार के विरूद्व न होकर सरकार के खिलाफ हैं। जबकि असलियत यह है कि अन्ना की लड़ाई एक मजबूत और सख्त जन लोकपाल बिल को लेकर है। सिविल सोसायटी के सुझाए बिंदुओं पर सरकार को आपत्ति थी। संयुक्त मसौदा कमेटी की मीटिंग के दौरान दोनों पक्षों में गहरे मतभेद उभरकर सामने आये थे। सरकार ने नैतिकता को ताक पर रखकर मसौदा कमेटी के मतभेदों को दरकिनार कर आनन-फानन में सरकारी ड्राफ्ट को संसद के सामने पेश्‍ा कर दिया। अगर सरकार को यही सब करना था तो फिर मसौदा कमेटी में सिविल सोसायटी के सदस्य शामिल करने की क्या जरूरत थी। जब सरकार मनमानी, हठधर्मिता और बेशर्मी पर ही उतारू थी तो उसे पहले ही अन्ना की बात माननी नहीं चाहिए थी। लेकिन गठबंधन धर्म का पालन सरकार ने नहीं किया। अगर कोई कमेटी बनायी गयी थी तो उसे ही बैठकर मतभेदों को सुलझाना चाहिए था। ऐसे में अगर आज अन्ना अनशन कर रहे हैं तो वो क्या गलत कर रहे हैं। सरकार की चालबाजियों और खोटी नीयत ने आग में घी का काम किया और अन्ना के साथ देश की जनता भावनात्मक स्तर पर जुड़ती चली गयी। आज जो जनता अन्ना के समर्थन में खड़ी है वो असल में एक तरह से सरकार के दमनकारी रवैये और प्रवृत्ति के कारण ही अन्ना से जुड़ी है।

असल में आबादी का बड़ा तबका भ्रष्टाचार से आजिज आ चुका है। भ्रष्टाचार हमारी आदत, चरित्र और पहचान बनता जा रहा है। आज विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका में भ्रष्टाचार चरम पर है। किसी सषक्त मंच के अभाव में जनता अपना दुख-दर्दे और पीड़ा को जाहिर कर पाने में असमर्थ थी। अन्ना ने जन लोकपाल बिल के द्वारा आम आदमी की दुखती नस को दबा डाला। जनता को अन्ना के रूप में वो शख्स दिखा जो उन्हें भ्रष्टाचार के दुष्चक्र से निजात दिला सकता है। लोकपाल बिल की मसौदा कमेटी में सरकार ने सिविल सोसायटी के सदस्यों को भारी जनदबाव के कारण ही शामिल किया था। भ्रष्टाचार का बड़ा भुगतभोगी देश का मध्यम वर्ग है। अन्ना के अनशन में आज मध्यम वर्ग का बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना इस बात को दर्शाता है कि अन्ना ने असल में आम आदमी से जुड़े मुद्दे को उठाया है। लेकिन जनता के भूलने की बीमारी से भी इनकार नहीं किया जा सकता है। देश के हर कोने में अन्ना के समर्थन में रैलियां, धरना-प्रदर्शन और आंदोलन जारी हैं।

आज अन्ना को जिस तरह समाज के हर वर्ग का समर्थन हासिल हो रहा है वो किसी जमाने में गांधी, विनोबा भावे और जेपी को मिला था। लेकिन ये सच्चाई है कि जितने भी बड़े आंदोलन देश में हुये हैं उनके साथ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर राजनीतिक दलों का समर्थन और साथ रहा है। अन्ना के आंदोलन में विपक्षी दल वोट बैंक की राजनीति और यूपीए सरकार को कमजोर करने की भावना से समर्थन का नाटक कर रहे हैं। यहां यह समझना भी जरूरी है कि अन्ना की लड़ाई किसी विशेष राजनीतिक दल से नहीं भ्रष्टाचार से है। लेकिन ऊपरी तौर पर राजनीतिक दल और मीडिया द्वारा जो तस्वीर पेश की जा रही है उससे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि अन्ना की लड़ाई सीधे तौर पर कांग्रेस से है। तमाम राजनीतिक दलों ने सिविल सोसायटी के मसौदे से असहमति जतायी थी। ऐसे में जन लोकपाल बिल की लड़ाई को सही ट्रैक और दिशा में ले जाना अन्ना और उनकी टीम के लिए मशक्कत का काम होगा।

एक स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था में बोलने की आजादी का खास महत्व होता है। अहिंसक धरना, प्रदर्शन और अनशन लोकतंत्र के सड़े-गले हिस्सों की रिपेयरिंग का काम बखूबी करते हैं। ऐसे में अन्ना के अहिंसक अनशन को गैरकानूनी और अलोकतांत्रिक नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन अन्ना जिस मुद्दे को लेकर सरकार के सामने खड़े हैं उसकी खास जानकारी आंदोलनकारियों को भी नहीं है। मोटे तौर पर जनता यह जानती है कि भ्रष्टाचार पर नकेल कसने के लिए एक सख्त कानून बनवाने के लिए अन्ना अनशन कर रहे हैं। लेकिन असल में मुद्दा कितना गंभीर और पेचीदा है उसकी जानकारी गिने-चुनों को ही है। सिविल सोसायटी और सरकार के मध्य छह बिंदुओं पर गहरे मतभेद है। सरकार भी कह रही है कि वो एक मजबूत लोकपाल कानून के लिए प्रतिबद्व है, लेकिन सिविल सोसायटी को कानून का सरकारी ड्राफ्ट नामंजूर है। गौरतलब है कि लोकपाल कानून संसद में पेश हो चुका है, और यही वो गहरा पेच है जिसको सुलझाने के लिए लंबे और दृढ़ आंदोलन की जरूरत है। एक-दो दिन के हो-हल्ले और अनशन से सूरत बदलना आसान नहीं है। अन्ना और उनकी टीम के पास राजनैतिक आंदोलनों का अनुभव न के बराबर है ऐसे में देशभर से मिल रहे समर्थन और सर्मथकों की ऊर्जा और जोश को पाजिटिव तरीके से उपयोग कर पाना सबसे बड़ी चुनौती है क्योंकि भीड़ के पांव होते हैं दिमाग नहीं।

लेखक डा. आशीष वशिष्‍ठ स्‍वतंत्र पत्रकार तथा लखनऊ के निवासी हैं.

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