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लोकपाल हो तो वैसा…

अमिताभ मेरी पत्नी नूतन दो-चार दिन पहले अमेरिका से आई है, जहां वह अमेरिकी सरकार और अमेरिकी संस्थाओं में ट्रांसपरेंसी (अर्थात पारदर्शिता) को नजदीक से देखने और समझने के लिए बनाए गए टूर का हिस्सा थी. लौटने के बाद मुझ में और उसमें लोकपाल बिल और लोकपाल संस्था को ले कर कई बार बहस और चर्चा होती रही है, जिस में हम दोनों को ही परस्पर एक सम्यक दृष्टिकोण बनाने में मदद मिली है. नूतन ने जो मुख्य बात वहाँ समझी वह यह कि अमेरिका के पूरी शासन-प्रशासन व्यवस्था (गवर्नेंस) में किसी भी एक संस्था का वर्चस्व नहीं है. बल्कि डेमोक्रेसी के मूलभूत सिद्धांत ‘सेपरेशन ऑफ पावर’ (सत्ता का अलगाव) पर ही पूरी अमेरिकी व्यवस्था आधारित दिखती है. यही कारण है कि वहाँ एक से एक वाचडॉग (नियंत्रण संस्थाएं) हैं जो अपनी-अपनी हैसियत और क्षमता के अनुसार बड़े करीब से समस्त अमेरिकी संस्थाओं पर निगाह रखती हैं.

अमिताभ मेरी पत्नी नूतन दो-चार दिन पहले अमेरिका से आई है, जहां वह अमेरिकी सरकार और अमेरिकी संस्थाओं में ट्रांसपरेंसी (अर्थात पारदर्शिता) को नजदीक से देखने और समझने के लिए बनाए गए टूर का हिस्सा थी. लौटने के बाद मुझ में और उसमें लोकपाल बिल और लोकपाल संस्था को ले कर कई बार बहस और चर्चा होती रही है, जिस में हम दोनों को ही परस्पर एक सम्यक दृष्टिकोण बनाने में मदद मिली है. नूतन ने जो मुख्य बात वहाँ समझी वह यह कि अमेरिका के पूरी शासन-प्रशासन व्यवस्था (गवर्नेंस) में किसी भी एक संस्था का वर्चस्व नहीं है. बल्कि डेमोक्रेसी के मूलभूत सिद्धांत ‘सेपरेशन ऑफ पावर’ (सत्ता का अलगाव) पर ही पूरी अमेरिकी व्यवस्था आधारित दिखती है. यही कारण है कि वहाँ एक से एक वाचडॉग (नियंत्रण संस्थाएं) हैं जो अपनी-अपनी हैसियत और क्षमता के अनुसार बड़े करीब से समस्त अमेरिकी संस्थाओं पर निगाह रखती हैं.

मीडिया पर नियंत्रण और निगाह रखने के लिए अलग संस्थाएं हैं, कोर्ट पर निगाह रखने के लिए अलग, स्थानीय स्वशासन के संस्थाओं पर दृष्टि रखने के लिए अलग, एटोर्नी पर निगाह रखने के लिए अलग. इस तरह अमेरिका में (और संभवतः सभी पश्चिमी देशों में) सत्ता का वास्तविक विकेन्द्रीकरण है. मैं समझता हूँ कि यह अमेरिका की व्यवस्था का सबसे बड़ा गुण और उसकी सबसे बड़ी ताकत है. मैं मानता हूँ कि ऐसा जहां भी होगा वहाँ की व्यवस्था निश्चित रूप से अच्छी होगी. साथ ही मैं पूरी तरह से यह मानता हूँ कि हम लोगों को भी इस तरह की व्यवस्था को अपनाना चाहिए.

पारदर्शिता किसी भी शासन व्यवस्था के लिए बहुत जरूरी है और अतिशय लाभप्रद भी. सीधी सी बात है, जहां भी खुलापन होगा वहाँ गड़बड़ी की उम्मीद और स्कोप स्वतः ही कम हो जाएगा. उदाहरण के लिए सूचना का अधिकार अधिनियम के आने के बाद से शासन और प्रशासन जिस तरह से खुला है वह काबिले-तारीफ़ है. अब उत्तरदायित्व और बाह्य नियंत्रण की भावनाएं पहले की तुलना में बहुत बलवती हुई हैं और इस कार्य में सूचना का अधिकार अधिनियम एक प्रमुख भूमिका निभा रहा है. उसके दुरुपयोग भी हो रहे हैं पर अच्छे उपयोग की तुलना में यह काफी कम ही माने जायेंगे.

अपने देश की वर्तमान व्यवस्था में न्यायिक प्रणाली के अंतर्गत एक बात जो खास कर के ध्यान देने योग्य है वह है अभियोजन पक्ष की स्वायतता. अमेरिका में तुलनात्मक रूप से अभियोजन पक्ष स्वतंत्र होता है. वहाँ के एटोर्नी भले ही सरकार का अंग होते हैं पर वे अपना दृष्टिकोण देने और अपनी बात प्रस्तुत करने के लिए काफी हद तक स्वतंत्र होते हैं. यह स्थिति हमारे देश में शायद उस हद तक नहीं है जहां अभियोजन पर सरकार का नियंत्रण अधिक है.

इस रूप में मैं पूरी तरह मानता हूँ कि एक निष्पक्ष और अपेक्षाकृत स्वतंत्र अभियोजन की हमें बहुत जरूरत है जिस पर सरकार का नियंत्रण कम हो. साथ ही जैसे अमेरिका में अभियोजन के काम-काज पर दृष्टि रखने और उसकी निष्पक्ष समीक्षा करने के लिए भी कई सारी स्वतंत्र ईकाइयां होती हैं वैसी ही स्थिति हमारे यहाँ भी होने की जरूरत है. अब तीसरी बात यह कि क्या हमें लोकपाल की जरूरत है? मैंने पूर्व में यह कहा था कि इस देश को लोकपाल की कोई खास जरूरत नहीं महसूस हो रही, कम से कम उस रूप में तो कदापि नहीं और उस प्रकार के लोकपाल की बिलकुल नहीं, जिसकी परिकल्पना जन लोकपाल बिल में की गयी थी. मैं आज भी इस बात कर कायम हूँ. मैं यह बात निम्न तर्कों के आधार पर कहता हूँ-

एक- लोकपाल का काम कर रही तमाम संस्थाएं पहले से मौजूद हैं और एक नयी संस्था के आ जाने से कोई अचानक सुधार नहीं होने वाला.

दो- लोकपाल की जो परिकल्पना इस ड्राफ्ट में की गयी है, वह एक तरह के सुपरमैन की है जो ना सिर्फ अव्यावहारिक है बल्कि सैद्धांतिक रूप से भी दोषपूर्ण है, क्योंकि एक ही संस्था के पास जांच, विवेचन, अभियोजन, प्रशासनिक नियंत्रण और कतिपय न्यायिक अधिकार दे देने का मतलब एक नए दानव को पैदा करना है, जो अपनी मर्जी के मुताबिक़ जिसे चाहे लील ले और जिसे चाहे माफ कर दे.

तीन- किसी भी संस्था से जरूरत से अधिक उम्मीद नहीं करनी चाहिए क्योंकि लोकतंत्र में एक संस्था के वश में नहीं है कि वह सारे काम करे और सारा कुछ ठीक कर दे.

चार- लोकपाल और भ्रष्टाचार विरोध में कुछ साम्य तो है पर इन दोनों को एक मानना बहुत बड़ा भ्रम भी है और बहुत बड़ी भूल भी होगी. लोकपाल भ्रष्टाचार हटाने में एक सहायक हो सकता है, समूल अंत का कारक नहीं. इस प्रकार की धारणा पैदा करना खतरनाक है और दुर्भाग्यपूर्ण भी.

इस बातों के बाद मुझे यह लगता है कि एक संस्था के रूप में लोकपाल का होना कोई ऐसी बुरी बात भी नहीं है. ठीक है, जिस प्रकार से प्रदेशों में लोक आयुक्त हैं, उसी तरह से देश स्तर पर लोकपाल हो, जो विशेष तौर पर भ्रष्टाचार के मामलों से ताल्‍लुक रहे. उसके सारोकार, उसके कृत्य, उसके कार्य आदि परिभाषित किये जा सकते हैं और उसके अधीन कौन-कौन सी संवैधानिक और गैर-संवैधानिक संस्थाएं आएँगी यह भी सुनिश्चित किया जा सकता है. ऐसा हो जाए तो बेहतर भी रहेगा. वाचडॉग की परंपरा में उच्चस्तरीय भ्रष्टाचार के वाचडॉग के रूप में लोकपाल अपना महत्वपूर्ण योगदान निश्चित तौर पर दे सकेगा.

चेक एंड बैलेंस (परस्पर निगरानी) के सिद्धांतों के अनुरूप लोकपाल नामक यह स्वायत्त संस्था हमारे देश के लोकतंत्रात्मक प्रणाली को थोड़ी सी और मजबूती देने का काम अवश्य करेगी. लेकिन इसके साथ हमें यह बात लगातार याद रखनी होगी कि भ्रष्टाचार का महादानव एक तलवार से नहीं कटने वाला है, इसके लिए हमें लोकतंत्रात्मक व्यवस्था के अधीन समस्त संभव उपायों और तंत्रों का सहारा लेते हुए ही आगे बढ़ना होगा.
अमिताभ

लेखक अमिताभ ठाकुर आईपीएस अफसर हैं. यूपी के कई जिलों में पुलिस अधीक्षक रहे. दो वर्ष तक अवकाश लेकर एमबीए किया. इन दिनों मेरठ में आर्थिक अपराध अनुसंधान शाखा के प्रमुख के बतौर पदस्थ हैं. कई अखबारों, मैग्जीनों और पोर्टलों में विभिन्न विषयों पर लेखन.

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