कल रात का दिल्ली के रामलीला मैदान पर लोकवाणी का जिस क्रूरता से दमन करवाया गया, वह भारत के नागरिकों के ऊपर गुजारा गया दमन था. सरकार के नुमाइंदों ने जिस तरह से कानून को अपने बाप की दौलत समझ कर दुरूपयोग किया वह हमें मुग़ल कालीन आततायियों की याद दिलाते हैं. क्या लोकशाही का अर्थ और अंजाम यही आना था या आगे भी इसी तरह के सितम भारतीयों पर इटली की रानी के हुक्म से गुजारे जायेंगे. हे! महात्मा, अगर इसी तरह की आजादी के लिए आपने अंग्रेजों से लोहा लिया था तो आप जहां से भी इस घटना क्रम को देख सकते हैं तो अब सिर्फ आप पछता सकते हैं, क्योंकि आप तो इस देह में नहीं हैं. हे! बापू, क्या आपका अंहिसक सत्याग्रह का शस्त्र जिसे आपने भी समय-समय पर खूब आजमाया था, अब धार खो चुका है? क्या निर्दोष भारतीयों को अब अपनी जायज बात कहने का हक़ खत्म हो गया है?
हे! गांधी, तुमने जो सत्य का प्रयोग करना सिखाया वह इस युग में तुम्हारे नाम से सरकार चलाने वाले लोगों को रास नहीं आ रहा है, सवाल आपसे यही है कि क्या हम देशवासियों को अब असत्य का साथ देना होगा? हे! महामानव, तुमने अपरिग्रह का जो उपदेश दिया और आधी धोती में अपना जीवन गुजारा उसका तेरे ही देश में अब कोई महत्व नजर नहीं आता है. तेरे ही नाम पर लम्बे समय से शासन करने वाले चोर से भी गये-गुजरे नेता अब इस देश की प्रजा का धन छीन कर विलायत ले जा चुके हैं. तेरी निरीह संताने जब अपने धन की वापसी की मांग करती है तो उस पर डंडे बरसाए जाते हैं.
हे! महात्मा, तुने क्या सोच कर हमें स्वतंत्रता के लिए संघर्ष को तैयार किया? हे! मुनिवर उस संघर्ष के मंथन के बाद इस तरह का जहर निकलने वाला था तो तुमने इस दुस्साहस के लिए हमें प्रेरित क्यों किया? हे! राम को आदर्श मानने वाले बापू, आज तेरा रामराज्य के सपने का लीर-लीर तेरे ही नाम पर सरकार चलाने वाले हराम खोर नेता कर रहें हैं? जिस राम के राज में कुत्ते को भी न्याय नसीब था मगर अफ़सोस! तेरे राम राज्य में साधू-संत, प्रजा किसी को भी न्याय नसीब नहीं. हे! मोहन, तेरा यह डरावना रामराज्य हो सके जो वापिस लेकर हमें हमारी गुलामी बख्श दें.
हे! बुद्धि के स्वामी, तुने क्यों समर्थ रामदास के गुण गाये? तुने क्यों ब्राह्मण चाणक्य की वंदना की? तुने क्यों विवेकानंद के आदर्श अपनाए? क्या तुम नहीं जानते थे कि ये सब सन्यासी हैं? यदि जानते होते तो तेरे नाम पर सरकारी पद पर मिनिस्टर बने कपिल सिब्बल को यह सदबुद्धि क्यों नहीं दी, वह तो संन्यासी के गुणों को भी नहीं जानता? ऐ! कुबुद्धि से संपन सिब्बल!! तू यह भी नहीं जनता कि ये राम का देश है, यह कृष्ण का देश है, शिवाजी का देश है. इस देश के संन्यासी का जन्म खुद को मुक्त करने के लिए नहीं बल्कि परहित कि मंगल कामना के लिए होता है.
हे! बापू, तुम तो सर्व शक्तिमान आत्मा हो, तुम तो सर्व द्रष्टा हो, तुम इन आततायियों द्वारा किये जा रहे दमन को किस भय से सहन कर रहे हो. हे! गांधी, क्या तुम भी मोह के वशीभूत होकर धृतराष्ट्र कि तरह अंधे होने का नाटक कर रहे हो. हमने तो आपको सम द्रष्टा के रूप में पूजा है, हे! महानर, अब तो इस करुण पुकार को सुनो और इस क्रूर शासन से हमें मुक्ति दिलाओ. तुम्हारे रहम से भयंकर हो चुके भस्मासुर से हमें मुक्त करो. हमारी मेहनत की कमाई को हड़पने वाले विषैले सर्पों से हमारी रक्षा करो. हे! महात्मा, यदि आप स्वयं इस काम को करने में अक्षमता देख रहे हों तो हम सब बच्चों को आशीर्वाद दो कि हम कायरता का त्याग कर वीरता को धारण करें और इन दैत्यों का संहार कर सकें.
लेखक गंगा प्रसाद भूत्रा सूरत के निवासी हैं.

