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राजनीति-सरकार

”वामपंथ को जीवन का स्‍वभाविक हिस्‍सा बनना पड़ेगा”

भारतीय सन्दर्भों में वामपंथ को समझना पडे़गा कि चूक कहाँ हुई है? उसने अवसरों का फायदा क्यों नही उठाया? आजादी के बाद भारतीय राजनीति में वामपंथ का उभार एक शक्ति, एक विकल्प के रूप में हुआ, जिसमें आगे चलकर ठहराव आ गया और अन्ततोगत्वा अब उसका जनाधार तुलनात्मक रूप से लगातार घट रहा है। केरल में 1957 में कम्युनिस्ट दुनिया में पहली बार चुनकर सत्ता में आए। यह वामपंथी आंदोलन के लिए नया अनुभव और भारतीय वामपंथ का दुनिया के कम्युनिस्ट इतिहास में बड़ा योगदान था। तत्पश्चात पश्चिमी बंगाल में कम्युनिस्ट सरकार का चुना जाना और लम्बे समय तक शासन करना भी एक बड़ी उपलब्धि थी, परन्तु भारतीय वामपंथ की यह उपलब्धियाँ देश की राजनीति में कोई विकल्प नहीं बन पाईं। हालाँकि उसने पूर्ण भूमि सुधार, कानून व्यवस्था को दुरुस्त करने और साम्प्रदायिक सद्भाव बनाए रखने जैसे अच्छे काम भी किए।

भारतीय सन्दर्भों में वामपंथ को समझना पडे़गा कि चूक कहाँ हुई है? उसने अवसरों का फायदा क्यों नही उठाया? आजादी के बाद भारतीय राजनीति में वामपंथ का उभार एक शक्ति, एक विकल्प के रूप में हुआ, जिसमें आगे चलकर ठहराव आ गया और अन्ततोगत्वा अब उसका जनाधार तुलनात्मक रूप से लगातार घट रहा है। केरल में 1957 में कम्युनिस्ट दुनिया में पहली बार चुनकर सत्ता में आए। यह वामपंथी आंदोलन के लिए नया अनुभव और भारतीय वामपंथ का दुनिया के कम्युनिस्ट इतिहास में बड़ा योगदान था। तत्पश्चात पश्चिमी बंगाल में कम्युनिस्ट सरकार का चुना जाना और लम्बे समय तक शासन करना भी एक बड़ी उपलब्धि थी, परन्तु भारतीय वामपंथ की यह उपलब्धियाँ देश की राजनीति में कोई विकल्प नहीं बन पाईं। हालाँकि उसने पूर्ण भूमि सुधार, कानून व्यवस्था को दुरुस्त करने और साम्प्रदायिक सद्भाव बनाए रखने जैसे अच्छे काम भी किए।

दरअसल देश में वामपंथ को माडल बनाने के मौके मिले जिसका कम्युनिस्ट फायदा नहीं उठा पाए। उन्हें समझना चाहिए था कि पूंजीवादी ढाँचे यानी पूँजीवादी संविधान के दायरे में रहते हुए वे क्या बेहतर कर सकते थे, जिससे वामपंथ को देश की राजनीति में एक विकल्प के तौर पर उभरने का मौका मिल पाता। इसके अलावा हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि वर्तमान भारतीय संविधान की बहुत सारी बातें वाम जनवादी संघर्षों का ही नतीजा है। मसलन भारतीय संविधान और गणराज्य का धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी स्वरूप जिसे आज दक्षिणपंथी शक्तियाँ और पूँजीवादी लाख कोशिशों के बाद भी बदलवाने में सक्षम नहीं हो सके हैं।

इसी संविधान के दायरे में रहते हुए वामपंथ उन राज्यों में जहाँ वह सत्ता में है, विकास का एक नया एवं वैकल्पिक माडल तैयार कर सकता था। उसके पास शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का एक सार्वजनिक तंत्र विकसित करने का अवसर हमेशा था, जिसका वामपंथ ने लाभ नहीं उठाया। वे सत्ताधारी राज्यों में सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों का एक बेहतरीन माडल बनाकर पेश कर सकते थे। जिसके तहत राजकीय क्षेत्र के आटोमोबाइल्स का विकास कर सकते थे और ऐसा संभव है, यह मारुति के रूप में हमारे सामने एक उदाहरण है। सार्वजनिक क्षेत्र की यातायात व्यवस्था का विकास किया जाना चाहिए था।

गौरतलब है कि पश्चिमी बंगाल की यातायात व्यवस्था का अधिकांश हिस्सा निजी हाथों में है। आज दिल्ली की मेट्रो जो देशभर में चर्चा का विषय है, उसकी जगह उससे कहीं बहुत पहले बनी कलकत्ता की मेट्रो को अधिक विकसित करके देशभर के सामने एक उदाहरण, एक माडल की तरह पेश किया जा सकता था। आज के बडे़-बड़े माल्स की जगह सुपर मार्केट्स का निर्माण किया जा सकता था, जो पहले कई जगह पर रहे भी हैं। वाम शासित राज्यों- खासतौर पर पश्चिमी बंगाल में बेहतर न्यूनतम वेतन देने और उसे ईमानदारी से लागू करवाने का विकल्प बनाकर देश के सामने एक प्रेरणाप्रद काम किया जा सकता था, जिसमें वामपंथ विफल रहा है। असल में एक वामपंथी सरकार को एक माडल की तरह होना चाहिए था। परन्तु अपनी कई विशेषताओं के बावजूद पश्चिमी बंगाल दूसरे राज्यों से ज्यादा पिछड़ा राज्य बनकर रह गया। जिस कारण भ्रष्टाचार संस्थागत रूप धारण कर गया और एक विशेष सुविधा प्राप्त शासकीय वर्ग पैदा हो गया, जिसने जनता को अन्ततोगत्वा अपना दुश्मन बना डाला। इससे यह भी सीख मिलती है कि एक सही वामपंथी मोर्चा और गलत वामपंथी मोर्चा चलाने में क्या फर्क होता है। वामपंथी मोर्चा केवल पार्टियों का नहीं आम तबको का, आम आदमी का मोर्चा होना चाहिए।

नई परिस्थितियों में काम करने के लिए और कामयाबी के लिए संसदीय व्यवस्था को मास्टर करना पडे़गा। जब तक वामपंथ इस व्यवस्था की खूबियों और खामियों को नही समझेगा तब तक इस व्यवस्था को अपने पक्ष, अपने फायदे में प्रयोग करने में नाकाम रहेगा। इसी संसदीय व्यवस्था के तहत ही दक्षिणपंथी शक्तियों को कमजोर किया जा सकता है, क्योंकि दक्षिणपंथ बुनियादी तौर पर लोकतंत्र और लोकतान्त्रिक संसदीय व्यवस्था के खिलाफ होता है। यही कारण है कि दक्षिणपंथ समय-समय पर लोकतंत्र व संसदीय व्यवस्था की धर्मनिरपेक्ष एवं जनवादी परम्पराओं और अवधारणाओ पर हमले करता है। यह वामपंथ की जिम्मेदारी है कि वह संसदीय व्यवस्था की खूबियों का इस्तेमाल करे और दक्षिणपंथ को कमजोर करते हुए जनता के पक्ष में काम करने के लिए इस व्यवस्था का उपयोग करे। उसकी कमियों को दूर करने के लिए संघर्ष भी करे।

वामपंथी जब संसदीय व्यवस्था में शामिल होते हैं तो उनके लिए सारे संदर्भ बदल जाते हैं और इन्हीं नए संदर्भों में वामपक्ष को समझना पडे़गा कि उन्हें इस व्यवस्था में काम कैसे करना पडे़गा। 1957 में संसदीय राजनीति में आने के साथ ही सत्ता में आया वामपंथ अभी भी संसदीय जनतंत्र को समझने में पिछड़ रहा है। गणतंत्र जनता का हथियार है और उसे जनता के अनुसार उसकी बेहतरी के लिए ही इस्‍तेमाल करना पडे़गा, क्योंकि जनता कोई काल्पनिक चीज नहीं है। इसके लिए वामपंथियों को अपना सांगठनिक ढाँचा भी बदलना पडे़गा और उसे खुला और जनवादी बनाना पडे़गा। कुछ भी छिपाकर आज के दौर में काम नहीं चलेगा, आज पूँजीवादी दल तक छिपा पाने में असमर्थ हैं। कुछ नेताओं और गुटों तक सांगठनिक सत्ता को नियन्त्रित एवं केंद्रित वाली कार्यप्रणाली को बदलना ही होगा। इसके अलावा भारत की बड़ी आबादी युवा है। अब सवाल यह है कि उस युवा वर्ग को वामपंथ क्या ऑफर करता है, उसे देने के लिए उसके पास क्या है। इन सवालों को हल किए बगैर वामपंथ आगे नहीं बढ़ सकता है। इसके अलावा भ्रष्टाचार भी आज एक बड़ा सवाल है कि क्या भ्रष्टाचार से मुक्त सरकार चलाई जा सकती है। सी. अच्युतामेनन की सरकार ने 1969 में यह करके दिखा दिया, जिससे सीख ली जा सकती है। इसके अलावा जनहित में भी कई काम अच्युतामेनन सरकार ने किए, जिनसे सीख ली जा सकती है। जैसे- पूर्ण भूमि सुधार, सबको शिक्षा की उपलब्धि और दलितों के लिए एक लाख आवास आदि।

वामपंथी लैटिन अमरीकी माडल : लैटिन अमरीका के वामपंथ की अपनी कुछ विशेषताएँ हैं। उन्होंने पार्टी, सरकार और जनवाद से जुड़ी हुई कुछ स्थापित परम्पराओं और अवधारणाओं को छोड़ा है। उन्होंने यह समझ लिया है कि नई परिस्थितियों में नए तबकों में कैसे काम किया जाना चाहिए। लैटिन अमरीका में एक तरह से वामपंथ का नवीनीकरण हुआ है, विशेषतया चुनावों के संदर्भ में उन्होंने शानदार कामयाबी हासिल की है। उन्होंने यह दिखा दिया है कि वर्तमान संसदीय ढाँचे को कैसे बेहतर ढंग से प्रयोग किया जाना चाहिए। इसीलिए कई वामपंथी नेता बार-बार चुनकर आ रहे हैं और उस पर कमाल यह कि लैटिन अमरीकी देशों की सेनाएँ भी उनका साथ दे रही हैं और जनता तो उनके साथ है ही। परम्परागत कम्युनिस्ट जहाँ-जहाँ वामपंथ के इस नवीनीकृत रूप के साथ हैं, वहाँ वे सत्ता में है और वामपंथ के भागीदार हैं, मगर कुछ जगहों में कम्युनिस्ट इनके साथ नही हैं तो वहीं वे हाशिए पर हैं।

इस वामपंथ की एक और विशेषता है कि इन बदलावों में युवा और महिलाओं की खास भागेदारी है और युवा और महिलाएँ अपने आप में कोई वर्ग नहीं हैं। पूरे लैटिन अमरीका के वामपंथी बदलाव में एक समान कारक भी है, ये आंदोलन मूल रुप से साम्राज्यवाद विरोधी हैं। लैटिन अमरीकी घटनाएँ पूंजीवाद की भीतरी संभावनाओं और इन संभावनाओं को कैसे इस्तेमाल किया जा सकता है, उसका नायाब उदाहरण हैं। ये वामपंथी आंदोलन पूँजीवाद को उखाड़ फेंकने का नारा नहीं दे रहे हैं, केवल साम्राज्यवाद विरोध का नारा दे रहे हैं। यहाँ वामपंथ समाज का स्वाभाविक हिस्सा बनकर उभरा है, जिसे लोग अपने जीवन का अंग मानते हैं, यह इस वामपंथ में एक ऐतिहासिक बदलाव है। इस प्रकार इस वामपंथ ने क्रान्ति की परम्परागत अवधारणा को बदल दिया है।

दक्षिण अफ्रीकी वामपंथ : दुनिया में वामपंथ के इन दो रूपों के अलावा वामपंथ का तीसरा प्रयोग दक्षिण अफ्रीका है। इस दक्षिण अफ्रीकी वामपंथ की जडें उसकी आजादी के राष्ट्रीय आंदोलन में हैं। दक्षिण अफ्रीकी वामपंथ के अभिन्न अंग कम्युनिस्ट पार्टी की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह कभी भी दक्षिणी अफ्रीकी राष्ट्रीय आंदोलन से अलग नहीं हुई और राष्ट्रीय आंदोलन में भागीदारी के प्रमुख हिस्से के तौर पर कम्युनिस्ट पार्टी हमेशा अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस का हिस्सा रही है। उसने आजादी के बाद कोई जल्दबाजी नहीं की और यही कारण है कि सरकार की नीतियों को दक्षिण अफ्रीकी कम्युनिस्ट पार्टी ने काफी हद तक प्रभावित किया है। यही कारण है कि उसने सरकार और देश में दक्षिणपंथ को आगे बढ़ने के लिए कोई जगह नहीं दी है। सरकार संचालन और देश के विकास की नीतियों को प्रभावित करने के बाद भी कम्युनिस्ट पार्टी दक्षिण अफ्रीका के राजनैतिक जीवन का स्वाभाविक अंग बनी रही। उसने कभी ऐसा महसूस नहीं होने दिया कि कुछ भी असामान्य हो रहा है। इसके अलावा दक्षिण अफ्रीकी कम्युनिस्ट पार्टी के अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस में बने रहने के कारण उसमें काफी लचीलापन और जनवादी व्यवहार विकसित हुआ है।

( अनिल राजिमवाले भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के शिक्षा विभाग से संबद्ध सुप्रसिद्ध मार्क्‍सवादी विद्वान बुद्धिजीवी हैं. उन्होंने समय-समय पर मार्क्‍सवादी दर्शन को नए वैज्ञानिक विकास से जोड़कर विकसित करने की कोशिश में अहम भूमिका अदा की है. इस लेख में दुनिया में उन्होंने कुछ वामपंथी माडलों, उनके बदलावों और परम्परागत वामपंथ की कमजोरियों पर अपने विचार व्यक्त किए हैं. उनसे बातचीत के आधार पर यह लेख महेश राठी ने लिखा है.)

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